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मेरे गुरुवर... आचार्य श्री विद्यासागर जी महाराज
  • पत्र क्रमांक - ३१ गुरुकुल के समान शिक्षा व्यवस्था

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    १०-०१-२०१६

    अतिशय तीर्थक्षेत्र

    चंवलेश्वर पार्श्वनाथ (राजः)

     

    पर दु:ख कातर करुणासागर ज्ञान उजागर गुरुवर ज्ञानसागरजी महाराज के चरणों में कोटि-कोटि वन्दन…

    हे विद्यानिधीश! मैं विद्याधर की हर छोटी से छोटी जानकारी आपको देना चाहता हूँ, मानो मेरे अन्दर संकल्प-सा जाग उठा है। मैं उनकी हर एक प्रवृत्ति से आप को अनभिज्ञ नहीं रहने देना चाहता हूँ इसलिए प्राथमिक शिक्षा के बाद आगे की पढ़ाई के बारे में जैसा बड़े भाई महावीर जी ने बताया वैसा लिख रहा हूँ-

     

    गुरुकुल के समान शिक्षा व्यवस्था

    ‘‘छटवीं, सातवीं के छात्रों को रात्रि में विद्यालय में ही सोना पड़ता था। उस समय विद्यालय की यही व्यवस्था थी। हम लोग ओढ़ने-बिछाने के लिए चटाई, चादर घर से ही ले जाते थे रात्रि में पढ़ने के लिए लालटेन ले जाते थे क्योंकि लाइट नहीं थी, लाइट १९६६ में आई थी और वहीं कक्षा में सबके स्थान निश्चित रहते थे वहाँ रख लेते थे। शाम ५ बजे घर आकर भोजन करते फिर वापस ८ बजे विद्यालय पहुँच जाते थे। रात्रि ८ से १० बजे तक शिक्षक पढ़ाते थे तदोपरान्त शिक्षक घर चले जाते थे, किन्तु छात्र विद्यालय में ही सोते थे। सुबह चार बजे घण्टी बजती थी सभी छात्र उठकर मुँह-हाथ धोकर पढ़ाई करने बैठ जाते थे और ६ बजे अपने-अपने घर चले जाते थे। तैयार होकर नाश्ता आदि करके पुनः आठ बजे विद्यालय आना होता था। वह व्यवस्था मात्र दो कक्षाओं में ही थी।

     

    सातवीं कक्षा में बोर्ड परीक्षा होती थी। बोर्ड की परीक्षा देने के लिए समीप ही चिक्कौड़ी (तहसील) के कन्नड़ राजकीय विद्यालय जाना पड़ता था जो २१ कि.मी. दूर था और सदलगा के सातवीं कक्षा के विद्यार्थी मिलकर परीक्षा के लिए सात दिन तक वहीं रहते थे। ८वीं से ११वीं कक्षा तक माध्यमिक और १२वीं कक्षा हायर सेकेण्डरी मानी जाती थी। माध्यमिक कक्षा की पढ़ाई के लिए सदलगा से ५ कि.मी. की दूरी पर बेडकीहाल ग्राम के विद्यालय में साईकिल से जाते थे और साईकिल विद्याधर चलाता था, मैं आगे डंडे पर बैठता था। आठवीं कक्षा से एक विषय अंग्रेजी भाषा का भी शुरु होता था। विद्याधर ने नौवीं कक्षा तक पढ़ाई की फिर आगे पढ़ने से पिताजी को मना कर दिया। पिताजी ने पूछा क्यों नहीं पढ़ना, तो विद्याधर बोला-मुझे लौकिक नहीं अलौकिक पढ़ना है, स्कूल की पढ़ाई से आत्मा का कल्याण नहीं हो सकता। विद्याधर ने सन् १९५८ में दक्षिण भारत हिन्दी प्रचार सभा मद्रास की हिन्दी प्राथमिक परीक्षा भी प्राईवेट पास की थी।" विद्याधर ने आगे पढाई क्यों नहीं की और आत्मकल्याण की बात क्यों कही? इसके बारे में मैं आपको अगले पत्र में उस रहस्य का उद्घाटन करूँगा। नमोस्तु गुरुवर....

     

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    जिज्ञासु

    शिष्यानुशिष्य


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