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मेरे गुरुवर... आचार्य श्री विद्यासागर जी महाराज
  • पत्र क्रमांक - 165 अन्तरंग भक्ति की विजय हुई

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    पत्र क्रमांक-१६५

    २६-०३-२०१८ ज्ञानोदय तीर्थ, नारेली, अजमेर

     

    चित्र-विचित्र-अचित्र आत्मा के ज्ञायक गुरुवर परमपूज्य श्री ज्ञानसागर जी महाराज के पावन चरणों में त्रिकाल वन्दन करता हूँ... हे गुरुवर! जब आप नसीराबाद पहुँचे तो आपके लाड़ले शिष्य की ज्ञान पिपासा शान्त करने के लिए एक सच्चे गुरु की भांति आपने अस्वस्थता के चलते उनकी चिन्ता की और उनके लिए समाज को बोलकर विद्वान् वर्ग लगाए। इस तरह आप अपने लाड़ले शिष्य की चिंता करते और लाड़ले शिष्य अपने प्राणों से प्रिय गुरुदेव की चिन्ता करते। इस सम्बन्ध में नसीराबाद के भागचंद जी बिलाला ने बताया-

     

    आहार देना है तो रात्रिभोजन त्याग करो

    ‘नसीराबाद में आने के बाद संघ २-३ दिन दिगम्बर जैन बड़ा मन्दिर रुका रहा फिर ताराचंद जी सेठी की नसियाँ में प्रवास किया। प्रतिदिन मुनि श्री विद्यासागर जी महाराज के प्रवचन होते थे। कन्नड़ टोन में उनके प्रवचन बहुत अच्छे लगते थे। ग्रीष्मकाल में भी गुरु-शिष्य को सतत अध्ययन-अध्यापन करते हुए देखा। नसीराबाद के व्यापारिक स्कूल के अध्यापक श्रीमान् पण्डित कौशलकुमार जी नादला से मुनि श्री विद्यासागर जी हिन्दी साहित्य और हिन्दी व्याकरण पर चर्चा करते थे एवं श्रीमान् तुलसीराम जी प्राचार्य इसी स्कूल के थे उनसे संस्कृत के विषय में चर्चा करते थे और अंग्रेजी भाषा की चर्चा श्रीमान् रामस्वरूप जी बंसल से किया करते थे। इस प्रवास के दौरान आचार्य गुरुवर ज्ञानसागर जी महाराज का स्वास्थ्य खराब चलता रहा और प्रतिदिन मुनि श्री विद्यासागर जी महाराज उनकी सुबह-शाम वैयावृत्य करते थे। एक दिन मैं दर्शन करने गया तब मुनि श्री विद्यासागर जी महाराज वैयावृत्य कर रहे थे, मैं भी करने लगा। मेरी रुचि को देखकर मुनि विद्यासागर जी महाराज बोले- ‘गुरु महाराज काफी वृद्ध हो गए हैं और कमजोरी भी बढ़ती जा रही है तुम यदि चाहो तो आहार चर्या में एक बाजू से पकड़कर सहारा दे सकते हो और सुबह शौच के बाद तुम भी मेरे साथ गुरुजी की वैयावृत्य करने आ सकते हो। यह सुनकर मैं बड़ा आनंदित हुआ और सलाह स्वीकार कर ली। दूसरे दिन जैसे ही मैं गुरु महाराज के साथ आहार में जाने लगा तो आचार्य ज्ञानसागर जी महाराज बोले- भैया पहले ये तो बताओ रात्रिभोजन तो नहीं करते हो?' मैंने कहा-महाराज! अभी तक तो पढ़ाई करता था तो त्याग नहीं है। तो गुरु महाराज बोले-‘आहार देना हो या सेवा करना हो तो रात्रिभोजन त्याग करना होगा।' तो हमने तत्काल रात्रिभोजन का त्याग कर दिया और गुरु महाराज की वैयावृत्य में लग गया। मुनिवर विद्यासागर जी मुझे प्रोत्साहित करते स्नेह देते और कहीं भूल-चूक हो जाए तो बड़े ही वात्सल्य भाव से समझाते ऐसा नहीं ऐसा करो। वे सतत गुरुदेव के स्वास्थ को लेकर चिंतित रहते थे। उनकी सेवा का यह फल मिला, मेरा जीवन पूरी तरह धार्मिक और सुखी बन गया।

     

    श्रुतपंचमी पर्व

    महावीर जी अतिशय तीर्थक्षेत्र से ‘जैन गजट' ०६ जुलाई १९७२ की कटिंग प्राप्त हुई जिसमें चंपालाल जी जैन के समाचार इस प्रकार हैं| ‘‘नसीराबाद दिनांक १६-०६-१९७२ शुक्रवार को श्रुतपंचमी महोत्सव परमपूज्य प्रात:स्मरणीय चारित्र विभूषण ज्ञानमूर्ति वयोवृद्ध श्री १०८ ज्ञानसागर जी महाराज व उनके शिष्य बाल ब्रह्मचारी मुनि श्री १०८ विद्यासागर जी महाराज के सान्निध्य में विविध आयोजनों के साथ मनाया गया। मध्याह्न में सरस्वती पूजन के बाद प्रवचन हुए। मुनि श्री १०८ विद्यासागर जी महाराज का प्रभावशाली प्रवचन हुआ।

     

    अन्तरंग भक्ति की विजय हुई

    नसीराबाद के आपके अनन्य भक्त रतनलाल पाटनी के अनुसार-

    “जून माह के अन्त में रविवार का दिन था। अजमेर समाज के गणमान्य प्रतिष्ठित लोग पधारे और प्रवचन के पश्चात् श्रीफल चढ़ाकर अजमेर में चातुर्मास करने हेतु निवेदन किया। तब नसीराबाद समाज के प्रमुख लोगों ने भी खड़े होकर संघ से निवेदन किया कि चातुर्मास नसीराबाद में ही करें। हमारी समाज आपकी सेवाभक्ति में किसी भी प्रकार की कमी नहीं रखेगी। तब अजमेर के लोग बोले- क्या हम लोग कमी रखेंगे? आप लोगों ने ग्रीष्मकाल करा लिया। अब हम लोग अजमेर लेकर जायेंगे। वहाँ पर बड़ी समाज है ज्यादा लोगों को लाभ मिलता है। तब नसीराबाद समाज ने अपनी भक्ति-समर्पण दिखाते हुए आचार्य ज्ञानसागर जी महाराज से निवेदन किया कि महाराज ८० घर की समाज आपको वचन देती है। कि आपके संघ के संयम-तप-साधना और समाधि-साधना में हर सम्भव सहयोगी बनेगी। तब विद्यासागर जी महाराज को अजमेर समाज के लोगों ने मना लिया। मुनिवर बोले-‘गुरुजी को एकबार निवेदन करते हैं फिर गुरुजी जैसा कहेंगे हम वैसा ही करेंगे। तब विद्यासागर जी ने कक्ष में ज्ञानसागर जी महाराज से पूछा क्या करना है।' तब गुरुवर बोले-मेरी भावना तो नसीराबाद में ही साधना करने की है। यहाँ की जलवायु और वातावरण अनुकूल है। अतः मेरी सल्लेखना साधना करने के यहीं भाव हैं। तब मुनि श्री विद्यासागर जी गुरुवर ज्ञानसागर जी महाराज की बात से सहमत हो गए और अन्तरंग भक्ति की विजय हुई।

     

    १३ जुलाई को मुनि श्री विद्यासागर जी महाराज के केशलोंच (दीक्षोपरान्त सोलहवाँ केशलोंच) सानन्द सम्पन्न हुआ बिना महोत्सव के महोत्सव हो गया।

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    मुनि श्री विद्यासागर जी का दीक्षा दिवस महोत्सव

    आषाढ़ शुक्ला पंचमी १५ जुलाई दिन शनिवार को मुनिवर विद्यासागर जी महाराज का दीक्षादिवस मनाने के लिए तैयारियाँ की गयीं। चारों तरफ समाचार भेजे गए। काफी जनसमूह एकत्रित हुआ और दीक्षा दिवस मनाया गया। मुनिवर की पूजा हुई फिर मुनि श्री विद्यासागर जी महाराज का प्रवचन हुआ उसके बाद गुरुवर ज्ञानसागर जी महाराज ने भी संक्षिप्त आशीर्वचन दिये । महोत्सव में पधारे हुए लोगों को स्नेह भोज दिया गया।' इस तरह नसीराबाद के लोग आपकी और संघ की सेवा भक्ति आदि किसी में भी पीछे नहीं थे। हे तात! आपके समय के लोग बड़े भद्र, सरल, श्रद्धालु हुआ करते थे। जो आप जैसे गुरु-शिष्य की तप साधना देख अधिक से अधिक समागम चाहते थे। ऐसे गुरु-शिष्य को प्रणाम करता हूँ...

    आपका शिष्यानुशिष्य

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