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मेरे गुरुवर... आचार्य श्री विद्यासागर जी महाराज
  • पत्र क्रमांक - 168 - दिव्यचक्षु के धनी आचार्य ज्ञानसागर जी

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    पत्र क्रमांक-१६८

    २९-०३-२०१८ ज्ञानोदय तीर्थ, नारेली, अजमेर

    तपोमय दिव्यदृष्टि के धारक दादागुरु परमपूज्य आचार्य श्री ज्ञानसागर जी महाराज के पावन तपोमय चारित्र को प्रणाम करता हूँ... हे गुरुवर! नसीराबाद चातुर्मास के समय की एक घटना आपको बता रहा हूँ जो भागचंद जी बिलाला इंजीनियर नसीराबाद ने सुनाया-

     

    दिव्यचक्षु के धनी आचार्य ज्ञानसागर जी

    ‘‘एक दिन ज्ञानसागर जी महाराज का आहार चल रहा था। एक महिला बीच में चौके में प्रवेश करने लगी और वह चुपचाप अंदर आ गयी। आचार्य महाराज आहार लेते हुए रुक गए। हम लोगों ने तत्काल उस महिला को कहा-आप शुद्धि बोलो। उसने शुद्धि बोली पर गुरु महाराज सिर हिलाकर मना करते रहे। फिर उन्होंने बाहर जाने का इशारा किया तो हम सब ने बहुत प्रयास किया कि महाराज बड़ी भक्ति से आयी है एक ग्रास ले लो किन्तु उन्होंने नहीं लिया। आहार के पश्चात् नसियाँ पहुँचे तो हमने महाराज से पूछा-महाराज आपने उस महिला से आहार क्यों नहीं लिया? तो गुरु महाराज बोले-‘पता नहीं, उसके आते ही मुझे अच्छा नहीं लगा, मन नहीं माना इसलिए आहार नहीं लिया। बाद में पता किया तो वह महिला दुश्चरित्री थी। हमें बड़ा आश्चर्य हुआ गुरु महाराज उसे जानते नहीं, पहचानते नहीं फिर महाराज जी ने उसे कैसे समझ लिया कि वह ठीक नहीं है? तब गुरु महाराज को बताया। तो आचार्य महाराज बोले-‘जिसका चरित्र पवित्र होता है उसे सब दिख जाता है। तब गुरु महाराज पर मेरी भारी श्रद्धा हो गई।

     

    इस प्रकार हे गुरुवर! आपको पूर्व में ही व्यक्ति के व्यक्तित्व का अवभासन हो जाया करता था और उसी के अनुसार आप व्यक्ति पर विश्वास करते थे। यही कारण है कि मेरे गुरु आपके विश्वास पर खरे उतरे और आपने उन्हें अपनी ब्रह्मविद्या दी। आपके श्रीचरणों में...

     

    आपका

    शिष्यानुशिष्य


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