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  • धर्म संस्कृति 4 - संस्कृति प्रवाह

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    धर्म संस्कृति 4 - संस्कृति प्रवाह विषय पर संत शिरोमणि आचार्य विद्यासागर जी  के विचार

     

    1. कृति और कर्म की उतनी कीमत नहीं जितनी की संस्कृति की।
    2. संस्कृति की रक्षा और देश की उन्नति हमारी सुमति पर ही आधारित है।
    3. प्रकृति की रक्षा करने पर ही संस्कृति की रक्षा संभव है।
    4. भारतीय संस्कृति एवं मानवता को आज सिंहों से नहीं नरसिंहों से ज्यादा खतरा है।
    5. अर्थ के विकास में अनर्थ हो और सहयोग का भाव बनाये रखें यही तो हमारी संस्कृति है।
    6. अपनी संस्कृति की बातों का ध्यान रखो, हम जैन हैं अत: जैन होने के नाते अपनी प्रवृत्तियों को संयमित रखना चाहिए।
    7. ईमानदारी, न्यायनीति धर्म संस्कृति की रक्षा में अपने दायित्व को कभी नहीं भूलना चाहिए। उसे सही अर्थों में निभाना ही हमारा कर्तव्य है।
    8. जीवन की समृद्धि, कुल, वंश, धर्म, संस्कृति राष्ट्रीय परम्परा को सुरक्षित रखने पर ही हो सकती है।
    9. भारतीय संस्कृति ज्ञान को महत्व देकर, जिससे ज्ञान नियंत्रित होता है ऐसी आस्था को महत्व देती है।
    10. केवल आर्थिक दृष्टि ही भारतीय संस्कृति नहीं है बल्कि यहाँ परमार्थ का भी पुरुषार्थ होता है।
    11. पाश्चात्य के देश शब्दों को महत्व देते हैं जबकि भारत देश अनुभव को ही सर्वाधिक महत्वपूर्ण मानता है।
    12. कृति कभी कर्ता से बड़ी नहीं हो सकती किन्तु आज कर्ता मकड़ी की तरह अपने ही जाल में उलझ रहा है।
    13. जिस प्रकार नदी अपने अस्तित्व को खोकर ही समुद्र बनती है उसी प्रकार अपने क्षुद्र अस्तित्व को खोकर ही यह आत्मा परमात्मा बनती है।
    14. संस्कार के बिना संसार में कोई भी आत्मा पतित से पावन नहीं बन सकती।
    15. जैसे दुग्ध में से निकला हुआ शुद्ध तत्व घृत पुन: दुग्ध रूप परिवर्तित नहीं होता ठीक इसी प्रकार मुक्त होने के बाद यह आत्मा लौटकर पुनः संसार में नहीं आती।
    16. जैसे दधि मंथन के बिना नवनीत और घृत की उपलब्धि संभव नहीं, ठीक इसी तरह आत्ममंथन के बिना परमात्म पद की प्राप्ति नहीं।
    17. भगवान् का जन्म नहीं होता किन्तु जो भगवान् बनने वाले होते हैं उनका जन्म होता है।
    18. भगवान् जन्मते ही मुक्ति नहीं पाते किन्तु जन्म से ही मुक्ति पा लेते हैं।
    19. "कोई दुनिया के पीछे पड़े हैं किसी के पीछे दुनिया पड़ी है।" भगवान् कभी दुनिया के पीछे नहीं देखते, दुनिया भगवान् के पीछे देखती रहती है।
    20. जो व्यक्ति मरण से डरता है वह तीन काल में जी नहीं सकता, यह मरण ही हमारे लिये प्रकाश प्रदान करने वाला है और यह उद्भव हमें भव-भव तक भटकाने वाला है। आप जन्म की पूजा नहीं करिये, जन्म संसार का प्रतीक है।
    21. हमारी क्षणिक बाह्य भौतिक निधि को कोई भी ले सकता है नष्ट कर सकता है किन्तु भीतरी निधि को मिटाने वाला इस धरती पर कोई नहीं है। वह थी, है, और आगे भी रहेगी।
    22. राग और अविद्या इन दोनों कारणों से ही यह संसारी प्राणी अंधा बना हुआ है। अगर ये दोनों नहीं हैं तो वह शीघ्र ही अपना आत्म कल्याण कर सकता है।
    23. अग्नि की पिटाई तभी तक होती है जब तक वह लोहे की संगति करती है ठीक इसी प्रकार देह की संगति करने से आत्मा की पिटाई हो रही है और जब तक आत्मा देह की संगति करेगी तब तक उसकी पिटाई होती रहेगी।
    24. विश्व में ऐसा कोई भी प्राणी नहीं है जो मोह की चपेट में नहीं आया हो लेकिन जो इसकी रहस्यपूर्ण शक्ति को पहचान कर उस पर प्रहार करता है वही संसार से पार हो जाता है।
    25. पथ एक ही है, मार्ग एक ही है। जो सामने चलता है वह मुक्ति का पथ चाहता है और जो रिवर्स (उल्टा) में चलता है वह संसार का पथ चाहता है।
    26. आज जो यद्वा तद्वा व्यापार कर रहा है, घूसखोरी करके जो बड़ा बनने का प्रयास कर रहा है वह सन्मार्ग से पतित हो रहा है।
    27. जब तक भीतर आत्मा के परिणाम उज्ज्वल नहीं होंगे, हमारा आचार-विचार उज्ज्वल नहीं होगा तब तक हमारा सम्बन्ध महावीर भगवान् के साथ, आचार्य कुन्दकुन्द स्वामी, आचार्य समन्तभद्र आदि के साथ नहीं रहेगा।
    28. धार्मिक संस्कृति अभी वर्षों तक टिकेगी लेकिन वह अपने आप नहीं। उसे टिकने के लिये, स्थायी रूप प्रदान करने के लिये चारित्रनिष्ठ, न्याय का पक्ष लेने वाले विभीषण, हनुमान जैसे महान् पुरुषों की जरूरत है।
    29. दया प्रधान कृषि कर्म का रूप विकृत होता जा रहा है। आज अण्डों की खेती, मछलियों की खेती (फार्मिग) आरंभ हो रही है इसे भी कृषि का दर्जा दिया जा रहा है। कहाँ गई वह आदिनाथ, महावीर और राम की संस्कृति। यह सब आधुनिकता का प्रभाव है।
    30. आधुनिक उपकरणों से सजित बूचड़खाने खोले जा रहे हैं। जिनमें हजारों हजारों जानवरों का संहार किया जाता है। पर किसलिये ? केवल विदेशी मुद्रा पाने के लिये। इसी संहार से ही चहुँओर हिंसा, आतंकवाद, शोषण और जाने क्या-क्या हो रहा है फिर अकेले शान्ति शासन की योजना बनाने से क्या लाभ ?
    31. अहिंसा भारतीय संस्कृति का मूल आधार है, इसीलिये स्वतंत्र भारत की प्रत्येक मुद्रा पर सम्राट् अशोक का अहिंसक चिह्न अंकित है किन्तु आज उसी मुद्रा को पाने के लिये बूचड़खाने आदि तरह-तरह के हिंसक साधन अपनाये जा रहे, यह लज्जा की बात है।
    32. अरे जो ब्रह्म मुहूर्त में बाँग देकर सबको उठा देता है, सोते हुए इन्सान को जगा देता है उस जीवन प्रदान करने वाले प्राणी की हत्या, मानव के द्वारा किया गया यह अक्षम्य अपराध है।
    33. अहिंसा की पूजा हिंसा के द्वारा कभी नहीं हो सकती और ही मात्र भावों के करने से किन्तु अहिंसा की पूजा तो वास्तव में अहिंसा को जीवंत रूप देने से होती है।
    34. हिंसा से नहीं धरती पर शांति का साम्राज्य अहिंसा के बल पर ही होगा।
    35. राम, रहीम और महावीर के समय में जिस भारत भूमि पर दया बरसती थी, सभी जीवों को अभय था, उसी भारत भूमि पर आज अहिंसा खोजे-खोजे नहीं मिलती
    36. भारतीय सभ्यता मिटती-सी जा रही है फिर भी हम लोगों की मान्यता है कि सतयुग आयेगा, विश्व में शांति आयेगी और यदि हमारा आचरण शुद्ध नहीं है तो वह सतयुग, वह विश्व में शांति भूतो भविष्यति।।'
    37. आज देश में सबसे बड़ी समस्या भूख, प्यास की नहीं बल्कि भीतरी विचारों के परिमार्जन करने की है। इसी से विश्व में त्राहि-त्राहि हो रही है। यह समस्या धर्म और दया के अभाव से ही है। एक दूसरे की रक्षा के लिये कोई तैयार नहीं। जो रक्षा के लिये नियुक्त किये गये वही भक्षक बनते जा रहे हैं।
    38. आज का भारतीय नागरिक भोगों की ओर जा रहा है। भोग्य पदार्थों को जोड़ता हुआ वह योग को पाना चाह रहा है। किन्तु योग की प्राप्ति के लिये भोगों की तिलांजलि देनी होगी, उसे एकदम विक्षत करना होगा तभी उस योग का आनंद सकता है। हमें उपयोग को भोग के धरातल से योग के शिखर तक लाना होगा।
    39. यदि भारतीय संस्कृति से संस्कारित होकर विवाह संस्कार किया जाये तो दोनों पति-पत्नी कुछ ही दिनों में भोगों से विरत होकर घर से निकलने का प्रयास करेंगे ओर कुछ ही समय में वह दंपत्ति योगमार्ग पर आरूढ़ होकर अपने जीवन का निर्माण कर लेंगे
    40. विवाह का अर्थ भोग का समर्थन नहीं किन्तु भोग को सीमित करने की प्रक्रिया है। काम को जीतने का एक सीधा सरल तरीका है विवाह।
    41. जैन दर्शन में व्यक्तिगत स्वतंत्रता के साथ-साथ सामूहिक शांति का भी संदेश है।
    42. धार्मिक व्यक्तियों में संस्कृति के प्रति निष्ठा एवं राष्ट्रप्रेम स्वाभाविक होता है।
    43. भारतीय संस्कृति में अधिकार नहीं कर्तव्य को महत्व दिया जाता है। यहाँ कर्तव्य पालन करने वाले को अधिकार स्वत: मिल जाते हैं।
    44. भारत में तिथियों की नहीं अतिथियों की पूजा होती है। यह बात पृथक् है कि उन अतिथियों के सानिध्य से तिथियों में भी पूज्यता जाती है।
    45. यह भारतभूमि है, यहाँ पर त्यौहार हमेशा आते रहते हैं, उनमें हम पूजा-भक्ति करते हैं। भारतीय संस्कृति हमेशा पूजा करना सिखाती है।
    46. संस्कृति की अथ और इति संभव नहीं, वह तो निरन्तर प्रवाहमान है। सभ्यता और समाज में परिवर्तन आते रहते हैं यह बात पृथक् है।
    47. आचार विचार के रूप में आज जो भारतीय संस्कृति प्रवर्तित है उसका आधार श्रमण और वैदिक परम्परा ही है।
    48. श्रमण संस्कृति, श्रम-पुरुषार्थ, शमन, समता पर जोर देती है।
    49. विचारों में अनेकान्त और आचरण में अहिंसा तथा अपरिग्रह का सिद्धांत जैनधर्म का आधार स्तंभ है।
    50. वस्तु स्वतंत्र है उसका परिणमन स्वाधीन है, इस बात का दिव्य संदेश हमें तिर्थंकरों ने दिया है।
    51. धर्म, दर्शन, सिद्धान्त और अध्यात्म विद्या के उपदेष्टा के रूप में श्रमण संस्कृति में अहत् तीर्थकरों का प्रमुख स्थान है। इन्हीं प्रवर्तकों की परम्परा में आचार्यों की संतति प्रवाहित है जिसने भारतीय सुषुप्त चेतना को समय-समय पर जागृत किया है।
    52. अहिंसा, अपरिग्रह, इन्द्रियनिग्रह, त्याग और समाधि को साधना के काल में तिर्थंकरों ने जिस तरह से आचरित किया उसे केवलज्ञान पाने के बाद जनकल्याणार्थ उपदिष्ट भी किया। इसीलिये तिर्थंकर धर्म के उपदेष्टा और प्रतिष्ठाता कहे गये हैं।
    53. शुरूआत से ही संस्कृति प्रवाह के दो प्रमुख पक्ष रहे हैं। एक विचार और दूसरा आचार। जहाँ विचारों में तत्व का दर्शन होता है तो वहीं आचरण से तीर्थ का। दोनों के मेल से ही संस्कृति की धारा प्रवाहित है।
    54. जैन संस्कृति में प्रतिपाद्य प्रवृत्ति और निवृत्ति में अद्भुत सापेक्षता है। यहाँ पर प्रवृत्ति में निवृत्ति और निवृत्ति में प्रवृत्ति का उद्देश्य अवश्य ही निहित रहा है।
    55. इतिहास, तीर्थक्षेत्र, पुरावैभव, मूर्तियाँ, मन्दिर, पाण्डुलिपियाँ, शिल्पकला, शिलालेख आदि हमारी संस्कृति के ऐसे अवयव हैं जिनकी सुरक्षा पर ही हमारा सांकृतिक ढाँचा टिका हुआ है।
    56. आगम और आचार्य गुरुओं से ही हमारी परम्परा का अभी तक अस्तित्व रहा है। यदि यह होते तो परम्परा शब्द भले ही रह जाता पर किसी तरह की परम्परा रहती
    57. मैं जैन हूँ, मैं हिन्दू हूँ, मैं सिक्ख हूँ, मैं ईसाई और मैं मुसलिम हूँ। इस प्रकार की मान्यता हमारे समाजरूपी सागर को नष्ट कर देगी। इस प्रकार का बिखरा अस्तित्व हमें एक बूंद का रूप दे देगा। जिसके सूखने के लिये सूर्य की एक किरण ही पर्याप्त है।
    58. हमारे बीच आपस में मतभेद भले ही हो जाय पर मनभेद नहीं होना चाहिए।
    59. राजसिक और तामसिक वृत्ति का त्याग कर सात्विक जीवन चर्या अपनाने की शिक्षा हमें भारतीय संस्कृति देती है।
    60. भारतीय आचार संहिता कहती है कि जब तक संकल्प लिया जाय तब तक आचरण का कोई महत्व नहीं। प्रण-प्रतिज्ञा में बँधना और उसे प्राण रहते तक निभाना हमारी पुरानी परम्परा है।
    61. वचन कदाचित परिवर्तित हो जाते हैं किन्तु प्रण/संकल्प अपरिवर्तनीय ही होते हैं।
    62. जो व्यक्ति कर्तव्य के प्रति निष्ठावान होता है, प्रतिष्ठा उसके पीछे भागती है।
    63. वह संतान किस काम की जो माँ के द्वारा बताये हुए मार्ग पर विश्वास नहीं रखती। ऐसी सन्तान का विकास अभी और आगे जाकर कभी भी संभव नहीं है।
    64. मानव जीवन बहुत ही मूल्यवान है। यह बहुत ही प्रतीक्षा के बाद पुण्योदय से मिला है। इसे व्यर्थ ही इधर-उधर की बातों में मत गंवाओ। इससे भुति की नहीं मुक्ति की भूमिका का निर्माण कर निर्वाण को पाओ।
    65. उत्तर और दक्षिण भारत का समूचा इतिहास ही इस बात का साक्षी है कि जैनियों ने समय-समय पर भारतीय संस्कृति की सुरक्षा में बड़ा योगदान दिया है।


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    Padma raj Padma raj

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    समय-समय पर  साबित हो रहा है ।

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