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नव आचार्य श्री समय सागर जी को करें भावंजली अर्पित ×
मेरे गुरुवर... आचार्य श्री विद्यासागर जी महाराज
  • आशा

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    आशा विषय पर संत शिरोमणि आचार्य विद्यासागर जी  के विचार

     

    1. जैसे आकाश में एक तारा है वैसे ही "आशा" रूपी गर्त में सारा विश्व उस तारे के समान है।
    2. आशा रूपी गडुा कभी नहीं भरता।
    3. किसी भी चीज की आशा न रहे, इस प्रकार की सभ्यता आना बहुत कठिन (दुर्लभ) है।
    4. बार-बार उपदेश सुनने के बाद भी यदि आपको वैराग्य नहीं आता है तो समझना चाहिए कि आपके ऊपर आशा-तृष्णा रूपी देवी की कृपा है।
    5. आशाओं की पूर्ति के लिए घर बस जाता है और मकड़ी की तरह यह जीव फँस जाता है।
    6. आचार्य श्री ज्ञानसागरजी महाराज कहते थे जो गृहस्थी में फँस गया वह उस हाथी की तरह है, जो बलवान होकर भी कीचड़ में फँस जाता है।
    7. बारहसिंगा घास की आशा के कारण झाड़ियों में फँसता जाता है, वैसे ही यह प्राणी सुख की आशा में गृहस्थी में फँसता जाता है।
    8. आशा-तृष्णा पर नियंत्रण धन से नहीं बल्कि धर्म से ही किया जा सकता है।
    9. चाह के रहते हुए संतोष प्राप्त नहीं हो सकता।
    10. साधु संसार में रहकर भी चाह रहित हैं, वे संसार में जल से हरे-भरे तालाब की भाँति हैं, जिसमें चाह की दाह प्रवेश नहीं कर सकती। कुछ नहीं चाहिए बस यही मोक्षमार्ग है।
    11. संसार रूपी जंगल में चाह रूपी दाह से प्राणी जल रहा है।
    12. आवश्यकता कभी समस्या नहीं बनती बल्कि अनावश्यकता ही समस्या की जननी है।
    13. विषयों की आकांक्षा हो जाने से सम्यकदर्शन का एक पैर टूट जाता है।
    14. मोक्षमार्ग सम्बन्धी अभिलाषा बढ़ना चाहिए, न कि विषयों सम्बन्धी।

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