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    पावन प्रवचन 3 - न धर्मों धार्मिकैर्बिना ।

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    समन्तभद्राचार्य की दिव्य घोषणा है कि धर्मी के अभाव में धर्म नहीं रह सकता और धर्म के अभाव में धर्मी नहीं रह सकता। आचार्यों, सन्तों ने हमारे ऊपर कितनी बड़ी कृपा की है उस कृपा का जो भार है उसे हम किसी भी प्रकार से उतार नहीं सकते। उनका हमारे ऊपर इतना बड़ा ऋण है उसे हम एक ही शर्त पर चुका सकते हैं कि हम उनकी बात को मानें, उनकी संस्कृति, परम्परा को निभायें। अन्यथा हम हमेशा ऋणी बने रहेंगे और हमारा यह दयनीय जीवन फिर सुधर नहीं सकेगा।


    समन्तभद्राचार्य जी की दिव्य घोषणा है कि धमों के अभाव में धर्म नहीं रह सकता और धर्म के अभाव में धर्मी नहीं रह सकता 'न धर्मों धार्मिकैर्बिना। परस्परोपग्रहो जीवानां।' यह सूत्र गुरु और शिष्य के बीच कैसे घटित होगा? तो आचार्य कहते हैं कि आज का मोक्षमार्गी भी गुरु की आज्ञानुसार चल कर गुरु के ऊपर उपकार कर सकता है।


    सम्यकदर्शन खरीदा नहीं जा सकता, वह बाहर से नहीं अन्दर से आता है। आचार्यों के उपदेशों से ग्रहण किया जाता है। सम्यकदर्शन के चार अंग स्वोमुखी हैं और चार अंग परोमुखी हैं, पर की अपेक्षा रखते हैं।

    आचार्यों ने करुणाभाव के साथ हमारे ऊपर कितनी बड़ी कृपा की है। उस कृपा का जो भार है, उसे हम किसी भी प्रकार से उतार नहीं सकते, आचार्यों का हमारे ऊपर इतना बड़ा ऋण है, उसे हम सिर्फ एक ही शर्त पर चुका सकते हैं कि हम उनकी बात को मानें, उनकी संस्कृति, परम्परा को निभायें अन्यथा हम उनके ऋणी ही बने रहेंगे और हमारा यह दयनीय जीवन तीन काल में भी सुधर नहीं सकेगा।


    यदि आप लोग अपने पूर्वजों को संतुष्ट करना चाहते हो तो वे और कुछ नहीं चाहते हैं सिर्फ उनकी बात को मानकर, उनकी संस्कृति परम्परा को तुम्हें निभाना होगा। आज तक जिन्होंने उनकी परम्परा के माध्यम से मुक्ति का लाभ लिया है, उनका कहना यही है कि परम्परा छोड़ दोगे तो मुक्ति का मार्ग छूट जाएगा। जिस समय हम उस रास्ते से चलते हैं उस समय रास्ता हमारे साथ चलता है। समन्तभद्राचार्य जी की दिव्य घोषणा है कि धर्मों के अभाव में धर्म नहीं रह सकता और धर्म के अभाव में धर्मी नहीं रह सकता, न धर्मों धार्मिकैर्बिना। धर्म की सुरक्षा चाहते हो तो धर्मात्मा बनो। धर्म जड़ नहीं है जिसकी सुरक्षा की जा सके। धर्म कोई जाति सम्प्रदाय नहीं। धर्म को हम खरीद नहीं सकते,धर्म एक चैतन्य परिणति है जिसकी सुरक्षा हम उस चैतन्य परिणति के माध्यम से ही कर सकते हैं। इसके अलावा और कोई रास्ता नहीं है। कागजी घोड़े दौड़ा कर भले ही आप संतोष कर लें, कि हमने धर्म का बहुत प्रचार किया है।


    आचार्य उमास्वामी जी द्रव्यों के उपकारों के बारे में विश्लेषण करते हुए जीव द्रव्य का वर्णन करते हुए कहते हैं 'परस्परोपग्रहो जीवानां'जीव का जीव के ऊपर उपकार किस प्रकार है ? उपग्रह का अर्थ 'दुखावसानकरणम्' दु:ख का अवसान करना ही उपग्रह है। दुख और सुख का संवेदन करने वाला सिर्फ जीव द्रव्य ही है। अब उपकार किसके ऊपर करें तो, वे कहते हैं कि उस व्यक्ति के ऊपर उपकार करो जो आपत्तिग्रस्त है, जिसके ऊपर संकट आया है। उसको जिसे किसी वस्तु की आवश्यकता है, उसे वह वस्तु देकर उसके ऊपर उपकार कर सकते हैं। अनादिकाल से जो भयभीत है, जिसे मोक्ष का मार्ग नहीं मिल रहा है, जो आत्मा का उद्धार नहीं कर पा रहा है। बहुत प्रयास करके वह अपने आप यहाँ तक आया है, किसी का आलम्बन लेकर नहीं आया है, एकमात्र अपना ही आलम्बन लेकर, चौरासी लाख योनियों को लाँघकर, यहाँ तक आया है, लेकिन अब उसकी गाड़ी रुक रही है और जिस अपेक्षा से रुक रही है, उसका दुख दूर कर देना ही सच्चा उपकार कहलाता है। एक प्रकार से छोटों के ऊपर बड़ों का उपकार है, वह उतारने का एक साधन है "परस्परोपग्रहो जीवानां"। यह सूत्र आचार्य उमास्वामी जी का है, इसकी टीका आचार्य पूज्यपाद जी ने बड़ी उदारता के साथ की है। किस प्रकार जैनत्व की, अनेकान्त की सुरक्षा होती है, उस व्याख्या के माध्यम से हमें अनेकान्तात्मक जैन दर्शन का हृदय समझ में आ जाता है। 'ऐसा विश्व में कोई भी पंथ नहीं है, ऐसा कोई भी दर्शन नहीं है, जिसने इतनी महान् उदारता का आलम्बन लिया हो, इस सूत्र में उन्होंने यह कहा है कि एक तरफ भगवान् हैं और एक तरफ पतित प्राणी है लेकिन उस पतित प्राणी का भी उपकार भगवान् के ऊपर हो सकता है। मेरे विचार से अनेकान्त के लिए इससे आगे गुंजाइश नहीं है।' समकक्ष वाले तो आपस में लेन-देन कर सकते हैं, लेकिन यह ध्यान रखें कि विषम कक्ष वाले भी कर सकते हैं। पावनता का पूर्ण रूप से अनुभव करने वाले भगवान् होते हैं और पतित, जिसका जीवन अधूरा है वह भी उनके ऊपर उपकार कर सकता है, इसको कहते हैं भगवान् महावीर का दर्शन। जिसमें किसी प्रकार अभिमान के लिए गुंजाइश नहीं है। जिसमें प्रत्येक आत्मा के महान्--महानतम अस्तित्व का कथन है। कोई व्यक्ति उपकार करता है तो उसकी गर्दन ऊपर हो जाती है, वह फिर नीचे की ओर देखता ही नहीं है किन्तु भगवान् के ऊपर जो आज का मोक्षमार्गी है, वह भी उपकार कर सकता है और इस बात को भगवान् भी मंजूर कर रहे हैं। लेकिन आपको यह बात सुनने में बड़ी विचित्र लगती होगी। सेठ जी नौकर के ऊपर, मुनीम जी के ऊपर तो कुछ न कुछ उपकार कर सकते हैं लेकिन मुनीम जी का उपकार उन सेठ जी के ऊपर कैसे होगा? तो आचार्य कहते हैं कि वह उनका काम हिसाब-किताब सही करें यही मुनीम जी का सेठ जी के ऊपर उपकार है। और सेठ जी के द्वारा उसे वेतन प्राप्त हो रहा है इस प्रकार एक दूसरे के ऊपर उपकार कर सकते हैं।


    "परस्परोपग्रहो जीवानां" यह सूत्र गुरु और शिष्य के बीच में कैसे घटित होगा? तो आचार्य कहते हैं आज का मोक्षमार्गी भी गुरु के ऊपर उपकार कर सकता है क्योंकि उनकी आज्ञानुसार चलकर वह धर्म की प्रभावना करता है, इसी का नाम है ऋण से मुक्त होना। अन्यथा हम तब तक ऋणी बने रहेंगे जब तक कि आर्ष मार्ग को नहीं अपनायेंगे, तब तक हम मोक्षमार्ग के प्रचारक - प्रसारक नहीं कहला सकेगे। केवल बातों-बातों से काम नहीं चलने वाला। 'न धर्मों धार्मिकैबिना' धर्म का प्रचार धर्मात्मा के माध्यम से ही होता है, मात्र धर्म का नाम लेने से नहीं। धर्मात्मा जहाँ भी रहेगा वहाँ उसके माध्यम से अहिंसा धर्म की, सत्य धर्म की प्रभावना नियम से होगी इसमें कोई सन्देह नहीं है। इसे भले ही रागी द्वेषी न देखें पर भगवान् तो देख रहे हैं कि किसके द्वारा कितनी प्रभावना हुई है, शिष्य बिल्कुल ठीक-ठाक काम कर रहे हैं या नहीं।


    "परस्परोपग्रहो जीवानाम्" इस सूत्र का विश्लेषण मै इसलिए बताना चाहँगा कि निर्वाण महोत्सव के दौरान जैन-समाज में एक प्रतीक बना है। और उस समय उसका बहुत प्रचार-प्रसार किया गया था, उस प्रतीक के बीचों बीच में उन्होंने एक ऐसा हाथ दिखाया है कि जैसे बिल्कुल महावीर का हाथ उतार दिया हो, अभय का प्रतीक है वह हाथ, उस प्रतीक के नीचे लिखा है ‘परस्परोपग्रहो जीवानाम्', कि किसी को आप भयभीत नहीं करें अभय दान दें। यह ध्यान रखें तीन दानों के लिए तो पैसों की आवश्यकता पड़ती है पर अभय दान के लिए धन-पैसे की जरूरत नहीं है और न ही शरीर की आवश्यकता है, बस! उज्ज्वल मन की आवश्यकता है और वह मन कहीं से खरीदना नहीं है अपने पास ही है, चाहें तो हम अभय दान कर सकते हैं, मारने वाले अपने अपकारक प्राणी का भी भला करना, उसके उद्धार की बात सोचना अभय दान है।


    भगवान् महावीर स्वामी ने कहा है कि अभय दान के माध्यम से सबसे अधिक प्रभावना होती है। जिसके पास कुछ भी माया नहीं रहती, माया का अर्थ है अन्दर कुछ और बाहर कुछ और, तो जिसके मन में माया नहीं है वही व्यक्ति सबसे ज्यादा भगवान् महावीर स्वामी के मार्ग का प्रचारक है। आप अपनी दृष्टि में चोरी से बच रहे हैं, असत्य से बच सकते हैं, व्यभिचार से बच रहे हैं तो केवल बस इसी को धर्म समझने लगते हैं, कि हमने कभी झूठ नहीं बोला, कभी चोरी नहीं की, व्यभिचार नहीं किया पर मैं कहूँगा कि आपने सब कुछ किया है क्योंकि आपके पास परिग्रह है। इस परिग्रह के निमित्त से ही पाँचों पाप हुआ करते हैं और आप उसी को बढ़ाने में लगे हुए हैं। आप इतने पुण्यशाली नहीं हैं कि परिग्रह अपने आप आपके पास आ जाए। तीर्थकर, चक्रवर्ती, बलभद्र नारायण आदि जो महापुरुष लोग होते हैं, उन्हें नियोग से पुण्य का लाभ मिलता है, भोग की सामग्री मिलती है। किन्तु आप लोगों को पाप करके परिग्रह एकत्रित करना पड़ता है। जितना परिग्रह आपके पास है, समझो उतना ही पाप एकत्रित है, आरम्भ के बिना परिग्रह का संकलन नहीं होता ऐसी स्थिति में आप भले ही समझते होंगे कि हम बहुत धर्मात्मा बनते चले जा रहे हैं, किन्तु ऐसा नहीं है। दान देने वाला व्यक्ति भी तब तक धर्मात्मा नहीं कहला सकता जब तक वह सही रूप से दान नहीं देता।


    कोई चोर बीस हजार रुपया चुराकर दस हजार धर्म के कार्य दानादिक में दे देता है, तो क्या वह सही दानी है ? नहीं अब वह आधा डाकू रह गया, अभी तो वह पूरा डाकू था और आगे का संकल्प छोड़ा नहीं इसलिए वह पूरा डाकू ही बना रहा। क्योंकि आगे चोरी का संकल्प ज्यों का त्यों है। चोरी करके दान करना धर्म का दिखावटी पन है, प्रदर्शन है, आचार्य कहते हैं कि जो ज्यादा आरंभी, विलासी है वह व्यक्ति धार्मिक क्षेत्र में निम्न स्तर पर है। और वह व्यक्ति अगले जीवन में यहाँ तक नीचे जा सकता है कि अधोगति की ओर भी उतर सकता है, भले ही वह बाहर से धर्म कर रहा हो तो भी चला जाएगा। यदि उसकी पाप प्रवृत्ति हट गई तो वह समाज के लिए वरदान सिद्ध हो जाता है।


    'परस्परोपग्रहो जीवानां' का अर्थ यह हुआ कि हम दूसरे को तकलीफ दिये बिना, दूसरे की तकलीफ यथाशक्ति दूर करने का प्रयास करें। उसकी तकलीफ दूर करने में हमारे तन, मन, वचन तीनों लगें और इन पुण्यमयी शुभ भावों के माध्यम से हमें भी ऐसी प्रशस्त सामग्री मिल जाती है। बन्धुओ! कहाँ से तो हम आये हैं और पुण्य के उदय से हमें ये दुर्लभताएँ प्राप्त हुई हैं, ये दुर्लभताएँ भी क्षण-भंगुर हैं, कर्म के ऊपर आश्रित हैं। अत: प्राप्त हुई इन दुर्लभताओं का सदुपयोग करें।


    एक व्यक्ति के ऊपर बाँस गिर गया है, उसने गाली नहीं दी ध्यान रखना! और थोड़ा-सा कोई पीछे वाला यूं कर देता है तो आँखें लाल हो जाती हैं। ऊपर बाँस गिर गया तो भी उसकी आँखें लाल नहीं हुई और आँखें लाल किसके ऊपर करें, बाँस के ऊपर तो कर नहीं सकते। यदि इस प्रकार का तत्व ज्ञान आपको हो जाये कि हमारा तो कर्म का उदय है, ठीक है, अपने को क्या मतलब है। सामने वाला यदि लट्ट भी मार रहा हो तो उसके लिए भी रास्ता खुल जाएगा, वह कहेगा कि भैया! मैं तो मार रहा हूँ पर यह कुछ भी नहीं कह रहा है। अपने कर्म का उदय समझ रहा है। वास्तव में यह है धर्म का अनुशरण।


    अब जड़ को क्या कहें? उसी प्रकार जो मारने के लिए आता है, उसे जड़ समझो, वह तो अज्ञानी है, स्वरूप का बोध भी उसे नहीं है, धर्म का आचरण भी उसे मालूम नहीं है। कोई गाली दे रहा है देने दो, कोई मारने आया है आने दो वह मेरा कुछ भी नहीं बिगाड़ सकता। इस प्रकार का भाव धर्मात्मा के मन में जाग्रत होता है। सामने जो व्यक्ति आया है उसके प्रति वह धर्मात्मा सोचता है कि हे भगवन्! इसे सद्बुद्धि दो, ये भी केवलज्ञान को प्राप्त कर सके, सच्चे मार्ग पर आरूढ़ हो। बड़ी लम्बी-चौड़ी बातें हम करते चले जाते हैं किन्तु अहिंसा क्या है? सत्य क्या है ? हमारा धर्म क्या है? इतनी सी बातें आपके जीवन में क्या नहीं हो सकती? क्यों नहीं हो सकती, अवश्य हो सकती हैं।


    हम लोगों को आचार्य कई प्रकार से समझाते हैं, बोध देते हैं कि यह हमारी बात किसी भी प्रकार से मान लें, ये एक बार मंजूर हो जाए। इस प्रकार कहने का तात्पर्य यह है कि वे हमारा उत्थान चाहते हैं। माँ एक बार कहती है कि बेटा! मान ले मेरी बात को जब वह नहीं मानता है, तब वह माँ कहती है कि तू मानता नहीं है, जोर से कहती है फिर भी नहीं मानता है, आपको तो सब मालूम ही है।

     

    माँ यदि रोटी बना रही हो तो चूल्हे में से लाल-लाल अंगारा खींचना ही पड़ता है, तब वह मानता है, जब नहीं मानता है तब ही माँ को ऐसा करना पड़ता है। इस प्रकार आचार्य परमेष्ठी शब्दों के माध्यम से समझाते हैं, कभी प्रिय कभी अप्रिय, कभी भव्य कहते हैं तो कभी पागल कहते हैं कभी सुजान कहते हैं। सुजान कहने से तो आपका चेहरा फूल जाता है और मूर्ख कहने से आपको बुरा लगता है, आप कहते हैं कि देखो! हमें ये मूर्ख कह रहे हैं। आपको यह तो समझना चाहिए कि आचार्यों ने हमारे ऊपर कितना बड़ा उपकार किया है, अपना मौलिक समय निकाल कर बड़े-बड़े ग्रन्थों की रचना की। बन्धुओ! यदि आचार्यों ने ये ग्रन्थ लिखकर नहीं रखे होते तो पूर्व और पश्चिम दिशा तक याद नहीं रहती। माता-पिता कुछ क्षण के लिए ही काम आते हैं, किन्तु पवित्र जिनवाणी माता ये वीतरागी गुरु भव-भव से काम आ रहे हैं। महावीर स्वामी को मोक्ष गए करीब ढाई हजार वर्ष हो चुके हैं, उस समय के लिखे हुए ग्रन्थ हमें आज भी प्राप्त हो रहे हैं। युग के आदि से यह परम्परा चल रही है इस परम्परा के माध्यम से हमें जो कुछ लाभ मिला है, हमारा कर्तव्य है कि आगे के लिए इस मार्ग को संकीर्ण न बनाकर विस्तृत ही बनाए रखें तो यह कार्य बहुत महान् होगा, जिसके माध्यम से असंख्यात जीव अपना कल्याण करेंगे।


    काल का प्रभाव ऐसा बुरा पड़ता जा रहा है कि हम कुछ कह नहीं सकते, फिर भी धर्मात्मा से रहा नहीं जाता वह किसी भी प्रकार से उस मार्ग को जारी रखना चाहता है। वह अधर्मात्मा को ऊपर उठाने का प्रयास करता है। धर्मात्मा वह होता है जो सामने वाले अधर्मात्मा को अपने समान बनाता है। दाता भी ऐसा होना चाहिए जो सामने वाले को अपने समान देखे, अर्थात् तुम्हारे पास तो है ही नहीं, ले-ले यह मैं दे रहा हूँ, याद रख मैंने तेरे साथ उपकार किया है। बड़ा वह होता है जो छोटों को अपने समान बना लेता है, फिर छोटा यह न समझे कि आपने मुझे अपने समान तो बना लिया है, अब मैं आप से नीचे क्यों बैदूँ ? ऐसा समझना गलत है। उसका परम कर्तव्य है कि जो बड़ा है उसकी विनय करे किन्तु जो बड़ा है वह उससे विनय न चाहे, इसके माध्यम से प्रेम, वात्सल्य बढ़ता है। कई बातें हैं जिन्हें हम जीवन में उतारने का प्रयास नहीं कर रहे हैं। हम आगे इसको धारण कर लेंगे इस प्रकार की भावना ठीक नहीं है क्योंकि आगे क्या होने वाला है इसका कोई पता नहीं है, अत: इसी में हमारी भलाई है कि भगवान् ने जो मार्ग हमें बताया है, शीघ्र ही हम उसका अनुसरण कर लें। जब तक हमारी बुद्धि ठीक-ठीक काम कर रही है, तब तक हम धर्मधारण कर सकते हैं और अल्प समय में ऐसा यदि कार्य कर लेते हैं तो हमारी यह बुद्धिमानी मानी जायेगी।


    यदि हम विषयों में लीन होकर अपनी शारीरिक शक्ति, मानसिक शक्ति खो देंगे तो अन्त में धर्म का आधार नहीं ले सकेगे। जब से जीवन प्रारम्भ होता है तब से धर्म का पालन करना चाहिए, तब कहीं अंत में जाकर कुछ काम हो सकेगा। धर्म कोई हल्की-फुल्की चीज नहीं है जिसका पालन बुढ़ापे में हो सके। हम सभी संसारी लोगों की यह स्थिति हो रही है इसके उपरांत भी आचार्य देव करुणा करके कहते हैं कि बेटा! यह ठीक है अपनी बुद्धि के अनुसार तो तुमने ग्रहण कर लिया लेकिन थोड़ा विचार तो करो कि आगम में क्या लिखा है?


    आगम में सम्यकदर्शन के साथ-साथ आठ अंगों का निरूपण किया गया है, जिसमें चार अंग स्वाश्रित हैं और चार अंग पर की ओर दृष्टिपात करते हैं यानि पराश्रित हैं। नि:शंकित, नि:कांक्षित, निर्विचिकित्सा और अमूढ़दृष्टि, ये चार अपने लिए हैं, शेष चार भी अपने लिए ही हैं पर वे स्वोमुखी नहीं परोन्मुखी हैं। स्थितिकरण, उपगूहन वात्सल्य और प्रभावना, ये चारों अंग पर की अपेक्षा रखते हैं यानि इनका पालन सामने वाले साधमीं व्यक्ति के माध्यम से होता है। आचायों ने इन अंगों के माध्यम से धर्म के प्रचार-प्रसार की बात कही है। इन अंगों का पालन किसने कितना किया है? यह बात अलग है। हम लोगों की कुछ आदतें ऐसी हैं जिनके ऊपर हम विचार नहीं करते, जिस किसी के मुख से जो कुछ भी हम सुन लेते हैं, उसी को जिनवाणी का सच्चा स्वरूप समझ लेते हैं और समझ लेते हैं कि हमने धर्म श्रवण कर लिया। हमारे पास उपदेश और उपदेष्टा इन दोनों की परख होनी चाहिए। सच्चे देव कौन हैं ? शास्त्र और गुरु का स्वरूप क्या है ? धर्म का प्रचार-प्रसार करने वाला कैसा होना चाहिए? ध्यान रखना मात्र आप ही लोगों ने धर्म पालन करने का ठेका नहीं ले रखा है। असंज्ञी पंचेन्द्रिय भी धर्म श्रवण कर सकता है, जिसके पास मन नहीं है वह भी धर्म श्रवण करता है। श्रवण का अर्थ है कानों के माध्यम से सुन लेना और उसके लिए मन की कोई आवश्यकता नहीं है। यदि आप सम्यकदर्शन की सुरक्षा और धर्म का आलम्बन लेना चाहते हो तो धर्म श्रवण के उपरान्त मन के माध्यम से सुनें और समझें। यह संसारी प्राणी मन का प्रयोग किए बिना ही धर्म का श्रवण कर रहा है और जिसने ग्रहण के बिना मात्र श्रवण किया है तो पूरा का पूरा धर्म नहीं कमा रहा है लेकिन सुनना ही छोड़ दो, ऐसा मैं नहीं कह रहा हूँ। छोड़ें नहीं, जितना प्रयास किया उतना तो अच्छा ही है। सम्यकदर्शन किसी दुकान से नहीं खरीदा जा सकता,वह बाहर से नहीं आता किन्तु अन्दर से जागृत किया जाता है, आचार्यों के उपदेशों से ग्रहण किया जाता है। संत क्या कह रहे हैं, जब इसको समझोगे, तभी धर्म हासिल कर सकोगे नहीं तो नहीं।


    मैं सोचता हूँ बार-बार विचार करता हूँ कि आचार्यों ने धर्म को श्रवण करके धर्म ग्रहण करने की दुर्लभता बताई है। धर्म श्रवण करना अलग है और उसके ऊपर श्रद्धान करके तदनुकूल आचरण करना अलग है, यह संसारी प्राणी धर्म सुनता तो है लेकिन उसको मुख्य नहीं बनाता। तिलोयपण्णत्तिकार ने कहा है कि कुछ जीव समवसरण में जाकर भी धर्म श्रवण नहीं करते, यदि करते भी हैं तो मुख्य दृष्टि उनकी कुछ और ही रहती है। वहाँ पर बहुत प्रकार की नाट्यशालाएँ रहती हैं, अच्छे-अच्छे गार्डन रहते हैं, ठंडी-ठंडी हवा भी चलती है, इन्हीं इन्द्रिय विषय पोषक स्थानों पर जाकर कुछ जीव बैठ जाते हैं, वे समवसरण में प्रभु के पास तक जाते ही नहीं है। यहाँ पर भी धर्मशाला में से ही सुनलें आवाज तो आ रही है और मुँह से चाय भी पीते जाएँ, कान से तो सुनना है, क्या बात हो गई? अर्थ यह कि धर्म को हमने इतना सस्ता बना लिया है। कान अपना काम करें मुँह अपना काम करे भिन्नभिन्न तो है ही । लेकिन भैया! स्वाद लेने वाला तो एक ही है, जिस समय मुख से स्वाद लेगा उस समय वह अन्य इन्द्रियों से काम नहीं ले सकेगा। और धर्म श्रवण भी नहीं कर सकेगा। यह ध्यान रखो, आप यहाँ हैं और मन कहीं अन्यत्र हो तो वह मात्र श्रवण ही कहलायेगा, उसका ग्रहण नहीं हो सकेगा, इसलिए मनोयोग के साथ सुनना पड़ता है। धर्म ऊपर-ऊपर ही नहीं है वह तो आत्मा की अतल गहराई में छिपा हुआ है, जिसे खोजने के लिए, जिसे निकालने के लिए बहुत परिश्रम की आवश्यकता होती है। और गहराई में पहुँची हुई वस्तु को निकालने के लिए पानी में डूबना पड़ता है। डूबने के लिए तैरना सीखना अनिवार्य है फिर डूबना होता है, उसके लिए बहुत शक्ति, बहुत परिश्रम की आवश्यकता होती है। धर्म क्या है यह समझ में तो आ रहा है, लेकिन उसको ग्रहण करने में, खोजने में बहुत परिश्रम की आवश्यकता होती है।


    एक बार की बात है, जब मैं 9th क्लास में पढ़ता था। हाई स्कूल जाने के लिए तीन-चार मील जाना पड़ता था। दूसरे गाँव में वह स्कूल था। एक दिन की बात है, स्कूल लगने में सिर्फ पन्द्रह-बीस मिनट की देर थी, जल्दी ही स्कूल जाना चाहता था, लेकिन साइकिल में हवा नहीं थी। मैं साइकिल की दुकान पर पहुँचा और मैंने कहा कि भैया! थोड़ी साइकिल में हवा भरना है पंप लाओ, उनके पंप देने पर मैं साइकिल में हवा भरने लगा, दस-बीस बार पंप करने पर भी मैंने टायर दबाया तो हवा नहीं जा रही थी। मैंने सोचा कि क्या बात हो गई, कपड़े को लगाकर पुनः हवा भरने लगा लेकिन फिर वही बात हवा नहीं जा रही थी। वह दुकानदार मेरी स्थिति को देख रहा था, अपने आप यही कहेगा, मैं क्यों कहूँ? जब तीसरी बार देखा तो वही स्थिति, तो मैं इधर-उधर देखने लगा क्योंकि देर हो रही है और साइकिल में हवा नहीं हैं। तब दुकानदार बोला कि साइकिल पंचर तो नहीं है, मैंने कहा कि नहीं पंचर तो नहीं है। वह बोला, देखो तो सही, देखा तो पंचर नहीं मिला, जब पंचर नहीं है तो हवा क्यों नहीं जा रही है, तो उन्होंने कहा कि भैया! और कुछ नहीं है इसका वाल ट्यूब कटा है। जानते हो भैया वाल ट्यूब का अर्थ? वाल का अर्थ है छिद्र और उस छिद्र पर जब तक ट्यूब नहीं चढ़ाएंगे तब तक उसमें हवा नहीं भर सकते। टायर भी ठीक है हवा भरने वाला भी ठीक है, ट्यूब भी ठीक लेकिन मस्तिष्क ही ठीक नहीं है आपका बस! वाल ट्यूब खरीद लो। मैंने दस पैसे निकाल कर दे दिए और उन्होंने वाल ट्यूब दे दिया उसको लगाते ही, दस बार पंप से हवा पर्याप्त मात्रा में भर गई। हवा अंदर तो जाती लेकिन वाल ट्यूब कटी होने से वह पुन: बाहर आ जाती थी। उसी प्रकार आपके कानों में प्रवचन के शब्द अन्दर तो चले जाते हैं, किन्तु वाल ट्यूब नहीं होने के कारण बाहर आ जाते हैं बस, इतनी सी कमी है आपकी। मात्र दस पैसे खर्च करके एक वाल ट्यूब खरीद लो आपकी यात्रा बिल्कुल ठीक हो जायेगी।


    जैन धर्म की प्रभावना इसलिए नहीं हो पा रही है, कि जहाँ पर जो कुछ आवश्यक है, वह तो आपने किया, लेकिन एक वाल ट्यूब आप नहीं खरीद पा रहे हैं। धर्म के प्रचार के लिए लाखों रुपये खर्च करने की आवश्यकता नहीं है। सहिष्णुता, प्रेम, दया एक दूसरे के प्रति वात्सल्य उमड़ आना, "गुणिषु प्रमोदं" वाली बात आज यहाँ नहीं है, और वह इसलिए नहीं है कि धर्म का यथार्थ स्वरूप हमें अभी समझ में नहीं आया उसी का यह फल है कि हम अपने जीवन को विषयों में, कषायों में समर्पित कर रहे हैं और जीवन का लम्बा समय हम यों ही समाप्त कर रहे हैं। "गंगा नहाए गंगादास, जमुना नहाए जमुनादास" वाली कहावत आज यहाँ पर चरितार्थ हो रही है। मौलिक जीवन में क्या किया, क्या धर्म का प्रचार किया, कितनी सच्चाई से व्रतों को पाला? इसे देखो, जानो और फिर यथार्थता का अनुकरण करो।


    आचार्य कुन्दकुन्द ने मुख्य रूप से साधु वर्ग को संबोधित करने के लिए अनेक प्रकार के साहित्य का समार्जन किया और आचार्य समन्तभद्र ने श्रावकों को सुधारने का प्रयास किया। सर्वप्रथम श्रावकों के लिए डेढ़ सौ श्लोक प्रमाण 'स्नकरण्डक श्रावकाचार' नामक ग्रन्थ लिखा। संसार से भयभीत श्रावक कैसा आचरण करें? श्रावक का आचार, विचार और व्यवहार कैसा होना चाहिए उसका संक्षिप्त किन्तु सारगर्भित अच्छे ढंग से वर्णन किया है। श्रावकों के लिए हेय क्या है? उपादेय क्या है? इन सब बातों का ज्ञान इस छोटी सी पुस्तक से होता है। ध्यान रखें कुछ प्रसंगों में साधु से अच्छा श्रावकों को माना है।


    गृहस्थो मोक्षमार्गस्थो, निर्मोहो नैव मोहवान् ।

    अनगारो गृही श्रेयान्, निर्मोहो मोहिनो मुनेः ॥

    ३३॥ र.श्रा.

    मोही मुनि की अपेक्षा निर्मोही गृहस्थ अच्छा है, जिसने मोह को निकाल दिया है, मोह का वमन किया है, उदासीनता धारण की है वह गृहस्थ बहुत अच्छा है। लेकिन वह विषयी, कषायी मुनि गृहस्थ के समान जो परिग्रह लादता जा रहा है, वह मोक्षमार्गी नहीं है इतना कहने से गृहस्थ चार अंगुल ऊपर न चढ़े। यह लक्षण नहीं बाँधा है, यह अतिशयोक्ति भी नहीं हैं। जो विषयी, कषायी है, वह कैसा मुनि! यह कहा है। वह गृहस्थ अच्छा है उस मुनि से, अच्छा का अर्थ यह नहीं है कि वह घर पर बैठे-बैठे ही मुक्ति प्राप्त कर लेगा। यह तो गृहस्थ को आदर्श रख कर तुलना की है। इसके उपरान्त गृहस्थ को लथेड़ा है। उलझे हुए मुनियों के लिए सुलझे हुए गृहस्थों को आदर्श रूप में रखा है और उलझे हुए गृहस्थों के लिए सुलझे हुए पशुओं के उपदेश दिये हैं। स्वयंभूरमण द्वीप से स्वर्गों की पूर्ति हो जाती है, उन पंचम गुणस्थानवर्ती पशुओं के माध्यम से, यहाँ से तो बहुत कम जाते हैं। वहाँ से अगर मार्ग बंद हो जाए तो स्वर्ग खाली पड़ जाएगा।


    जिस प्रकार कोई सेठजी हैं और उनके मरने के बाद मान लो घर में कोई नहीं है वह दस खण्ड का मकान खाली रह जाता है, उसी प्रकार स्वर्ग के भवन खाली रह जाएँगे। आचार्य समन्तभद्र की दृष्टि में आपका जीवन पशुओं से भी गया बीता है। आपसे अच्छे तो पशु हैं।


    रामायण का उद्घाटक है जटायु पक्षी। वहीं से रामायण का प्रारम्भ होता है। सीता हरण के रहस्य को जानने वाला भी जटायु पक्षी था। रावण के विरोध में सर्वप्रथम आवाज उठाने वाला वह जटायु था, जिसके लिए राम का आशीर्वाद था। राम ने अपने पास उस जटायु पक्षी को रख रखा था। जो मांस भक्षी था। मांस भक्षी को देखकर आप दूर भाग जायेंगे लेकिन राम नहीं भागे थे। उस जटायु पक्षी ने चारण ऋद्धिधारी मुनि महाराज के चरणों के गंधोदक को सिर पर चढ़ाया था और अपने जीवन को कृत-कृत्य किया था। सम्यकदर्शन को धारण करके उसने व्रतों को भी धारण किया था। व्रती बनने के उपरान्त राम सीता ने अपने साथ रख कर उसका पालन पोषण किया था। सीता के ऊपर आई विपत्ति के समय उसने यथाशक्ति सीता की रक्षा की, और अन्त में अपने प्राणों को न्यौछावर कर दिया। इसको कहते हैं-परस्परोपग्रहो जीवानाम्। उसने कहा नहीं कि कम से कम मेरा नाम तो लिख दो, लिखने की कोई आवश्यकता नहीं है। वीतरागता की दृष्टि में अपने आप नाम आ जाता है। अच्छाई कहीं छुपती नहीं और बुराई भी कहीं छुपती नहीं है। संसारी प्राणी को अपने आपको जटायु पक्षी के जीवन से ऊपर उठाना चाहिए।


    अहिंसा धर्म का पक्ष लेकर जटायु पक्षी ने रावण के साथ युद्ध करना मंजूर किया था। अंत में वह भले ही रावण से हार गया था, क्योंकि हाथी के साथ मक्खी का झगड़ा नहीं होता, लेकिन हाथी के साथ लड़ने वाला भी कुछ दम रखता है इसको कहते हैं सत्य का पक्ष । असत्य की तरफ भले ही हाथी हो और सत्य की तरफ मच्छर हो, भले ही वह हार जाये, लेकिन लड़ने का प्रयास वह अवश्य करता है। धर्म का पक्ष लेना आवश्यक हैं, धन का पक्ष लेने से आज तक यह अनर्थ हुआ है। जो सत्य है वही हमारा है, जो हमारा है वही सत्य है, ऐसा नहीं। जिन्होंने आगम का अध्ययन किया है उनका कहना सही हो सकता है।' रवीन्द्रनाथ टैगोर कवित्व के क्षेत्र में अच्छे कवि हुए हैं, उन्होंने अपने कविता में लिखा है- सत्य भले ही शूली पर टंगा हो फिर भी वह सत्य ही रहेगा और असत्य भले ही सिंहासन पर बैठा हो फिर भी वह असत्य ही रहेगा। सत्य की तरफ मात्र एक व्यक्ति है, इसलिए वह असत्य की कोटि में-आ जाए, ऐसा नहीं है और असत्य की ओर बहुत भीड़ भी हो तो भी वह सत्य की कोटि में नहीं आ सकेगा। यह पंचम काल की बलिहारी है कि सत्य को शूली पर टंगता ही देखा जाएगा। मैं समझता हूँ कि वह उसके ऊपर उपसर्ग है, और सत्यवान् के ऊपर ही उपसर्ग होता है लेकिन उपसर्ग के होने पर भी वह असत्य को स्वीकार नहीं करेगा, सत्य का ही प्रतिपादन करेगा और सत्य क्या है ? असत्य क्या है ? इन सब बातों का रहस्य दुनियाँ को अपने आप ही मालूम पड़ जाता है। धर्म की सुरक्षा के लिए एक व्यक्ति भी पर्याप्त है और उसी के माध्यम से हमें धर्म का लाभ मिल सकता है। धर्म लाभ प्राप्त करने के लिए हम सभी को कमर कसनी होगी यदि आप लोग अधर्मात्मा भी बन जाएँ तो एक धर्मात्मा ही धर्म की सुरक्षा कर लेगा। यह बात ध्यान रखना! धर्म की सुरक्षा में पशुओं का भी योगदान है। श्रावकाचारों में श्रावकों को समझाने के लिए जितना आदर्श पशुओं का है, उतना किसी गृहस्थ का नहीं। मातंग का उदाहरण है,


    उसमें उसकी अहिंसा के प्रति विश्वास को परिलक्षित किया गया है। धर्म पवित्र है, अनादि अनिधन है। धर्म शरीर के पीछे नहीं, धर्म आत्मा के पीछे है। धर्म में आत्मा है, आत्मा में धर्म है। शरीर में आत्मा होते हुए भी शरीर को कभी भी धर्म नहीं माना है। यह शरीर धर्म का साधन तब बन सकता है, जब वह विषय-कषाय से ऊपर उठ जाता है, तो धर्म के साथ-साथ उसकी भी पूजा हो जाती है, रत्नत्रय धारण करने पर शरीर भी पवित्र हो जाता है।


    स्वभावतोऽशुचौ काये, रत्नत्रयपवित्रिते ।

    निर्जुगुप्सा गुणप्रीतिर्मता निर्विचिकित्सिता॥

    १३१॥र.श्रा.

    स्वभाव से तो यह काया अशुचिमय है। अपवित्र है। भले आप इसको लाइफबॉय लगाओ, पियर्स सोप लगाओ, तना, हमाम आदि तमाम साबुनें लगाओ लेकिन एक घन्टे के बाद यह अपना गुण धर्म बता देगा और आपका जीवन इसी में बीत गया है।


    देह परसते होय आपावन, निशदिन मल जारी

    (बारह भावना)

    देह तो अपावन है, यदि पावन बनाने का लक्ष्य है तो धर्म को धारण करना आवश्यक है। आज तक ऐसा कोई भी व्यक्ति नहीं हुआ जिसने धर्म को धारण किए बगैर शरीर को पवित्र बनाया हो। तपस्या के माध्यम से मुनि महाराज के शरीर पर जो मल एकत्रित हो जाता है, वह औषधि का काम कर जाता है। अन्दर तप की सुगंधी के कारण वह Divert हो जाता है। आप रात दिन सुगंधित पदार्थों को अपने शरीर पर लगाकर गंदा कर रहे हैं। शरीर के कुछ अवयवों से निरंतर मल झरता रहता है, मल का पिटारा यह घिनावना शरीर है। यदि आप शरीर के पीछे, रूप के पीछे मद करेंगे, कषाय करेंगे तो ध्यान रखना अनंत शरीर आपको और मिलते चले जायेंगे। कुल का अभिमान, जाति का अभिमान, वंश का अभिमान जो व्यक्ति करता है। वह सम्यकदर्शन को दूषित करता है।


    मद धारे तो येही दोष वसु, समकित को मल ठाने॥

    (छहढाला, तीसरी ढाल)

    छहढाला की इन पंक्तियों का पाठ आप रोजाना करते हैं। उसमें कहा है कि आठ मदों को धारण करने वाला, सम्यकदर्शन बढ़ा नहीं रहा, किन्तु घटा रहा है। यदि ये मद आ जाते हैं, तो सम्यकदर्शन साफ हो जाता है, मात्र ऊपर की क्रिया रह जाएगी, इसमें कोई संदेह नहीं है। आप लोग जब तक अपने धर्म को नहीं पहचानोगे, रत्नत्रय अंगीकार नहीं करेंगे तब तक मद ही करते रहेंगे। मदवान व्यक्ति उन्मत्त कहलाता है। वह निज के स्वरूप को नहीं पहचान सकेगा। मद हमारे लिए खतरनाक है व्रतों में दोष लगाने वाला यह मद नरक में भी ले जाता है। अत: अन्त में में यही कहना चाहूँगा कि आज आप लोग दस पैसे खर्च करके धर्म रूपी वाल ट्यूब खरीद लीजिए, तो बहुत अच्छा होगा। आपका समय हो रहा है, आप धर्म श्रवण कर रहे हैं, बहुत अच्छा है, अब अंदर उतर जाय तो ठीक है क्योंकि आपकी मोक्ष यात्रा, अंदर टिकने से ही होना संभव है। धर्म यदि अपने अंदर उतर जाए तभी कुछ काम हो सकता है, अन्यथा नहीं। इसलिए आठ मदों को छोड़ने का प्रयास आपको करना है। ध्यान रखें यदि सम्यकदर्शन निर्मल रहेगा तभी वह चारित्र के कार्य का निष्पादन करेगा। आप लोगों का महान् पुण्य का उदय है, जो इस प्रकार की दुर्लभ पर्याय प्राप्त हुई है, क्योंकि बारह भावना में मंगतराय जी कहते हैं


    नरकाया को सुरपति तरसे सो दुर्लभ प्राणी॥

    (बारह भावना)

    इस पंक्ति को जब भी मैं स्मरण करता हूँ तो मुझे विलोमता नजर आती है सुरकाया को नरपति तरसे, सो दुर्लभ प्राणी? आप लोग, सुरकाया को तरस रहे हैं, जो व्यक्ति शरीर को ही सब कुछ समझता है, वही इस प्रकार सोच सकता है। क्योंकि वह तो दिव्य शरीर है और यह सड़ा-गला शरीर है। जो धर्म से विमुख होकर कार्य करेगा वह यही चाहेगा, इसलिए इस पंक्ति को थोड़ी होशियारी के साथ पढ़ा करो। इस काया को मिलने के उपरान्त कितना जीवन निकल गया है आपको मालूम तक नहीं है, कम से कम नरकाया की सार्थकता को समझो। विषय भोग के लिए यह काया नहीं मिली है। जो प्रमाद को छोड़कर जिस समय जाग्रत हुआ है, उसी समय उसने नरकाया की सार्थकता समझ ली।


    जब राजा श्रेणिक मरणोन्मुख हो जाता है, तब उसको अपने किये हुए अनर्थ का फल ज्ञान होता है और रोंगटे खड़े हो जाते हैं, आँखों से अश्रुधारा बहने लगती है कि हे भगवन्! मैंने अनर्थ तो कर लिया है, अब कोई रास्ता है ही नहीं! भगवान् कहते हैं, बस प्रायश्चित कर ले, सब कुछ ठीक हो जाएगा। ३३ सागर की आयु प्रमाण सप्तम पृथ्वी का बंध किया था। और बाद में विशुद्ध परिणामों से वह कितना रह गया? मात्र ८४ हजार वर्ष। यह सब सम्यकदर्शन की महिमा है आप लोग मद नहीं करें, जो मद नहीं करता है, वही सच्चा धर्मात्मा माना गया है। 'न धर्मों धार्मिकैबिना' इस कारिका के तीन चरण और देखें तो मालूम चल जाएगा।


    स्मयेन योऽन्यानत्येति, धर्मस्थान् गर्विताशयः ।

    सोऽत्येति धर्ममात्मीयं, न धर्मो धार्मिकैर्विना ॥

    (रत्नकरण्डक श्रावकाचार)

    मद के वशीभूत होकर के दूसरे धर्मात्मा को जो नीचा दिखाना चाहता है, वह धर्मात्मा नहीं है। इसलिए आप कभी भी मद को नहीं करें, जिसमें अपना और पर का कल्याण निहित है।

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    रतन लाल

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       1 of 1 member found this review helpful 1 / 1 member

    यह ध्यान रखें तीन दानों के लिए तो पैसों की आवश्यकता पड़ती है पर अभय दान के लिए धन-पैसे की जरूरत नहीं है और न ही शरीर की आवश्यकता है, बस! उज्ज्वल मन की आवश्यकता है और वह मन कहीं से खरीदना नहीं है अपने पास ही है, चाहें तो हम अभय दान कर सकते हैं, मारने वाले अपने अपकारक प्राणी का भी भला करना, उसके उद्धार की बात सोचना अभय दान है।

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    Padma raj Padma raj

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    सबसे  उत्तम  दान  अभय  दान ही है । यही  दान  तो सभी जीव को  कर सकते हैं। जो  हमारे  आचार्य श्री विद्यासागर महाराज जी  गो रक्षा  पर  जोर दे रहे हैं।

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