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    ज्ञान में 'विजन'

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    आज उच्च शिक्षा के क्षेत्र में हम दुनिया में बहुत पिछड़ गए हैं क्योंकि उन्नति के लिए शिक्षा में जिन नीतियों की जरूरत है हमने उन्हें गौण कर दिया है। भारत में पहले जो विश्वविद्यालय थे आज उनका नितांत अभाव हो गया है। आज अविभावकों को ये गलत धारणा हो गई है कि इतिहास पढ़ने से विकास नहीं होगा, लेकिन विद्वान् वर्ग का कहना है कि इतिहास पढ़ने से ही विद्यार्थी को सही ज्ञान मिलता है। संकेतों के पालन में केवल आँख और कान ही प्रभावी नहीं होते बल्कि विवेक भी महत्वपूर्ण होता है। परीक्षा के द्वारा ही मूल्यांकन नहीं होता, बल्कि गुणवत्ता के आधार पर भी मूल्यांकन होता है। आँखों से हर कार्य पूर्ण नहीं होता, बल्कि ज्ञान चक्षु भी जरूरी है। आज बच्चों की शिक्षा के साथ-साथ खानपान का भी बहुत महत्व है। शुद्ध आहार, शुद्ध पेय उनकी बुद्धि के विकास के लिए आवश्यक है। सत्य कभी-कभी कटु लगता है और सफेद झूठ हो सकता है तो भी सत्य तो बोलना परम आवश्यक है। आज मार्क (अंक) की तरफ ध्यान न दें बल्कि ज्ञान की तरफ ध्यान दें। पूरक परीक्षा ने विद्यार्थियों को कमजोर बना दिया है इसलिए पूरक की नीति बदलना चाहिए। आज किसी बात को जैसे से नहीं बल्कि जो है; वही सत्य है कहकर पुख्ता करना चाहिए।

     

    क्रमिक विकास की शिक्षा नीति चल रही है। लघु शोध प्रबंध का कार्य किया जा रहा है। लघु से गुरु बनने के लिए अपनी योग्यता और अनुभव को सुदृढ़ बनाना होगा। चिंता माथे पर रखोगे तो कैसर होगा और छाती पर रखोगे तो गर्व से छाती फूल जाएगी। आज पराश्रित शिक्षा हो गई है जो स्वाश्रित होना चाहिए। नव सृजन कर्ता बनाने की जरूरत है। श्रम रहित शिक्षा नहीं बल्कि श्रम सहित शिक्षा होनी चाहिए।

     

    नीति-न्याय का अभाव शिक्षा में नहीं होना चाहिए। जैसे परखी से गेंहू की जाँच सब तरफ से की जाती है वैसे ही शिक्षा में भी ज्ञान की परखी की जरूरत है, तभी भारत को शिक्षा के क्षेत्र में अग्रणी बनाया जा सकता है। शब्दों में ध्वनि हो सकती है, वजन हो सकता है, परन्तु 'विजन' तो ज्ञान में होना चाहिए। आधुनिक शिक्षा के साथ-साथ आत्म-तत्व को जानने की जो शिक्षा महापुरुषों ने दी है वो भी अनिवार्य होना चाहिए। भारतीय दर्शन को जानना भी नितांत आवश्यक होना चाहिए।

     

    जलप्रबंधन के मामले में भी भारत बहुत पिछड़ गया है। इस दिशा में भी ठोस कार्य होना चाहिए। पहले भारत से दूध, दही, घी का निर्यात होता था, आज क्या हो रहा है; ये सोचना जरूरी है। हमें उजाले का चिंतन करना है।

    -२ अक्टूबर २०१६, भोपाल

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    Guest

    रतन लाल

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    पहले भारत से दूध, दही, घी का निर्यात होता था, आज क्या हो रहा है; ये सोचना जरूरी है। हमें उजाले का चिंतन करना है।

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