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मेरे गुरुवर... आचार्य श्री विद्यासागर जी महाराज
  • पाठ ७ - विनयांजलि

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    जो कुछ भी गुरु की इच्छा है, उसके अतिरिक्त और मेरी इच्छा हो ही क्या सकती है? जो कुछ भी आप दिखाते हैं, मैं उसके सिवा क्या देखूँ? अगर आप वैसा रक्खें, वैसा हूँ और ऐसा रक्खें, ऐसा हूँ। जिस प्रकार आप मुझको रखना चाहते हैं, मैं वैसा ही हूँ। आप जिस ढंग में चाहे मुझे रंग दे। समर्पण की इन भावनाओं से पूरित होकर आचार्य श्री विद्यासागरजी ने समय-समय पर जिन भावों को अभिव्यक्त किया है, उनके उन भावों को मूलरूप में ही यहाँ इस पाठ का विषय बनाया गया है।

     

    प्रमानान्जली (67).jpg

     

    आचार्य महाराज अपने जीवन काल में आचार्य भी थे, उपाध्याय भी थे और साधु भी थे। अरिहंत की पकड़, सिद्धों की पकड़ से तो वह कभी दूर होते ही नहीं थे। ‘ऐसे उनको हम किसी भी रूप में देखते हैं, स्मरण करते हैं तो पंच परमेष्ठी का स्मरण हो आता है। उनके स्मरण से हमारे सब काम हो जाते हैं। हमारा पुण्य था कि हमें अनेक ग्रन्थों के रचयिता आचार्य श्री ज्ञानसागरजी जैसे आचार्य मिले हैं। हमारा सौभाग्य था कि हमें विश्व में मंगल प्रदान करने वाले गुरुदेव मिले हैं। ऐसे इष्ट देवता को मैं नमस्कार करता हूँ।

     

    गुरुओं के जीवन में, स्मरण में यदि हम समर्पित होते हैं तो अवश्य ही हमारा जन्म पावन बनता है। आप लोग तिथि विशेष पर उन्हें याद करते हैं। मैं प्रभु से प्रार्थना करता हूँ आप उन्हें जीवन भर हमेशा-हमेशा याद करते रहें। गुरुजी की यही भावना थी तुम बागवानी करते जाओ, हम समय समय पर अवश्य वर्षा करेंगे, ताकि पेड़-पौधे, बेल-बूटे बढ़ते जाएँ। वो गए हैं, ये मैं नहीं स्वीकारता। वे यहीं हैं, मैं तो यही स्वीकारता हूँ। ये काम (संघ संचालन आदि) सभी उन्हीं का है। सोई हुई चेतना में जल का सिंचन समय पर और अनुपात से होता है, तभी पेड़-पौधे पल्लवित व पुष्पित होते हैं। ये बड़ों का ही काम है। ये संस्कार उन्हीं के माध्यम से चल रहा है। हमारी बात जितनी वो जानते हैं, उतनी हम नहीं। सब वो ही जानते हैं। सब कुछ वो ही हैं। हमारे विषय में जो हम जानते हैं, वो भी वो जानते हैं। जो हम नहीं जानते, वो भी वो ही जानते हैं।

     

    मैं क्या जानता।

    क्या-क्या न जानता सो

    गुरुजी जानें।

     

    गुरु के प्रति कृतज्ञता

    बात भी उनकी, हाथ भी उनका - हमने गुरुजी से पूछा और...आगे...हम क्या करेंगे? समझ में नहीं आ रहा है, तो उन्होंने कहा था- ‘संघ को गुरुकुल बनाना।' गुरुकुल बना देना कहा। बना देना अर्थ यही है कि उनका हाथ हमेशा-हमेशा बना रहेगा। हमें क्या बनाना...नईं समझे...हमें ऐसा कह दिया। इसका अर्थ है। घबड़ाओ नहीं... गुरुकुल बन जाएगा। वो अब हम देख रहे हैं...। तो यह पक्का है कि गुरुओं के मुख से जो शब्द निकलते हैं, वह सार्थक होते हैं।

     

    ‘संघ को गुरुकुल बनाना...' यह वाक्य हमेशा गूंजता रहता है। गुरु से भी और प्रभु से भी हम प्रार्थना करते हैं कि यह वाक्य हमारे कानों में गूंजता रहे और हम दूसरों के कानों में गुंजाते रहें। शेष जीवन इस प्रकार चलता रहे। आप लोगों ने भी संकल्प लिये हैं। गुरुजी को याद करो और उसके अनुसार ही आगे के प्रत्येक क्षण में इस बात को याद रखते हुए आगे बढ़ो। जो भूला-भटका कोई आता है...देखो! पुरुषार्थ करके आता है। आप नहीं जा रहे हैं, वह स्वयं पुरुषार्थ करके आता है। कोई भी आता है...गुरुकुल बना देना। हठात् नहीं, बाध्य करके नहीं, समझा करके दे दो। उसका भाग्य होता है तभी तो आता है।

     

    जो पुण्य अर्जन करके आए हैं...उन्हें बिना कहे तो हम व्रत देते नहीं। दो-दो, तीन-तीन बार कहने के उपरांत हम हाँ इसलिए नहीं कहते कि कोई विफल नहीं होना चाहिए। अच्छे नम्बर में आ जाए, और वो...ऊपर से देखते रहें कि काम ठीक हो रहा है या नहीं। लाइट सामने से नहीं दिखती, आज सेटेलाइट से काम हो रहा है...। नईं समझे...वो ऊपर से (सब देख रहे हैं...) कहाँ-कहाँ पर, क्या-क्या है? सबको वो भेज रहे हैं, ऐसा लग रहा है। नहीं है, तो हरियाणा से भी आ जाएँ, उत्तरप्रदेश से भी आ जाएँ। राजस्थान, महाराष्ट्र तथा कर्नाटक से आ जाएँ, मध्यप्रदेश से भी आ जाएँ मध्यप्रदेश तो मध्य में है ही...नईं समझे...सब नदियाँ आ रही हैं। इसका अर्थ क्या है? हम तो यहाँ हैं... इसका अर्थ यही है कि ऊपर जैसे कोई चुंबकीय तत्त्व रखा हुआ है, जिस कारण सब आते जा रहे हैं। नईं समझे...अपने-अपने को थोड़ा व्यवस्थित काम करना। जो ये कुछ, सब कुछ है, वह सब आपका प्रसाद है। और गलती जो कुछ भी है, वो सब हमारी ही है। सच्ची बात है ये। वो तो वैसे हो नहीं सकते। हम छोटे हैं, अल्प बुद्धि वाले हैं। इसलिए अभिमान नहीं करो और दीन-हीन नहीं हो जाओ, ऐसा उन्होंने ही बताया है।

     

    कर्ता नहीं, आदेश पालनकर्ता हूँ - गुरु के वचन बहुत महत्त्वपूर्ण होते हैं। एक शब्द भी कह दें तो काम कर जाते हैं। समर्पित होकर बस उसी में खो जाना होता है। बस सब काम अपने आप हो जाता है। लेकिन पहले गुरु पर श्रद्धा होना चाहिए। कोई बिल्कुल पढ़ा-लिखा न हो, पर गुरु का वरदहस्त प्राप्त हो, तो सब कुछ अपने आप प्राप्त हो जाता है। मुझे तो ऐसे ही हुआ। सब कुछ गुरु के द्वारा ही मिला।' सल्लेखना के समय उन्होंने (गुरु ज्ञानसागरजी महाराज ने) दक्षिणा माँगी। मैं तैयार नहीं था, फिर भी करना पड़ा। कर्तव्य निभाया है, बाकी तो गुरु ने ही सब कुछ किया। मैंने कुछ नहीं किया। कर्तव्य निभाना बहुत सीधा-साधा होता है। गुरु ने कुछ भी नहीं कहा, सब होता गया। अभी भी गुरु ही कर रहे हैं। गुरुदेव ने कहा है- ‘जितना कहा है, उतना करना है।

     

    बनाता नहीं, परोसता हूँ - रसोई तैयार होती है तो रसोइया प्रातः छह बजे से बारह बजे तक रसोईघर के भीतर ही रहता है। परोसने वाले दो-तीन व्यक्तियों को रख दिया जाता है। वे परोसने का काम करते हैं, लेकिन जो बारह बजे तक बनाता रहा, उसकी ओर किसी की दृष्टि नहीं जाती। इसी प्रकार रसोइया तो गुरु महाराज ही हैं। उन्होंने सब कुछ तैयार करके मोक्षमार्ग की रसोई बनाकर उसे परोसने के लिए मेरे हाथों में सौंप दी। हमें परोसने का कार्य बस करना है। आप तो रसोइये को भूल जाते हैं और परोसने वाले को याद रखते हैं। आगे भी उन्हीं को सब कार्य करना है। हम तो परोसने वाले हैं।

     

    पथ भी उनका, पाथेय भी उनका - गंगा गंगोत्री से निकली। नीचे गिरती गई पर कहीं रुकी नहीं। जैसे-जैसे सहायक नदियाँ मिलती गईं, उसका प्रवाह बढ़ता गया। वैसे ही साधक जुड़ते गए मुझसे और मुझे बड़ा महासागर बना दिया। इसमें मेरा अपना कुछ नहीं है। आचार्य ज्ञानसागरजी के परोक्ष में जो वर्ष व्यतीत हुए हैं, वह सब उन्हीं का पथ है, पाथेय भी है और पद भी उन्हीं का है। हम तो अपने आप में कुछ भी नहीं हैं। गुरुदेव ही हमेशा पथप्रदर्शक बने रहे। गुरुवर की कृपा से अभी तक रुकना नहीं पड़ा, कोई दिक्कत भी नहीं आई।

     

    तार मैं, प्रवाह उनका - आचार्य महाराज ने हमें ऐसा करंट दिया कि हमारा अनादिकालीन अपसेट माइंड सेट हो गया। मुझे तो जो संकेत मिले हैं, सूत्र मिले हैं, उनकी साधना में लगा रहता हूँ । हमारी भावना तो हमारे गुरुदेव ही पूर्ण करेंगे। और हमारी भावना तो तभी पूर्ण हो चुकी, गुरुदेव ने जब मुझे स्वीकारा था, आशीर्वाद दिया था। बस...आप जो मिल गए। इस प्रकार विश्वास रूपी करंट उनसे जुड़ गया जो आज तक बंद नहीं हुआ। उसमें कोई कटौती भी नहीं। वह कभी गोल-गाल भी नहीं होता, न समाप्त होता है। ये रेंज ऐसी है कि इसका कोई ओर-छोर नहीं है। सब गुरु का प्रसाद है।

     

    वे सूत्रधार, हम पात्र - कब, कैसा, क्या, क्यों, कितना, करना कि नहीं करना - इस सबको बहुत अल्प, स्वल्प, तल्प से कोई विकल्प नहीं। गुरुदेव का हाथ ही पर्याप्त है। भाव पकड़ कर चलो। गुरुदेव सब कुछ संचालित कर रहे हैं। यहीं बैठकर सब कुछ उन्हीं का है। सूत्रधार पर्दे के भीतर रहता है, सामने अभिनय चलता है। पर्दे के पीछे से सूत्रधार की आवाज आती है। हम तो केवल बाहर से पात्रता को निभा रहे हैं। सूत्रधार हमेशा-हमेशा परोक्ष में रहकर सूत्र, प्रशिक्षण, प्रोत्साहन देते रहते हैं। इसी तरह अंदर से वह (गुरुजी) सब कुछ करा रहे हैं। मात्र पात्र (हमारी) की आवाज आप लोगों को आती रहती है। गुरुदेव की यह भावना थी कि कोई भी संयम की भावना से वंचित नहीं रहे। संकेत देना हमारा कार्य है। संकेत को सुनकर अमल में लेना पात्र का कार्य है।

     

    सब कुछ उन्हीं का - प्रभु से, गुरु से प्रार्थना है कि दिन दूनी-रात दस गुणी गुरु की भावना फलीभूत हो। वह मंत्र-तंत्र-यंत्र सब कुछ उन्हीं का है। हम तो मात्र माध्यम हैं। हमारी तो उन्हीं की एजेन्सी चल रही है। उनके चरणों में हमारे लिये बस स्थान मिलता रहे, यही भावना है। प्रत्यक्ष मिलेंगे तब और माँगेंगे। जितना मिला उसका उपयोग/प्रयोग करते जाइए, तभी आनन्द आएगा।

     

    उनके हम ऋणी हैं - जो एगं जाणदि, सो सव्वं जाणदि' अर्थात् जो एक को यानी आत्मा को जान लेता है, वह सारे जगत् को जान लेता है। धन्य हैं ऐसे गुरु, जिन्होंने हम जैसे रागी, द्वेषी, मोही, अज्ञानी और नादान के लिए भगवान् बनने का रास्ता प्रशस्त किया। आज कोई भी पिता अपने लड़के के लिए कुछ दे देता है, तो बदले में कुछ चाहता भी है। लेकिन गुरु की गरिमा देखो कि तीन लोक की निधि दे दी, और बदले में किसी चीज की आशा भी नहीं की। उनके हम ऋणी हैं।

     

    पूज्य आचार्य श्री ज्ञानसागरजी महाराज का उपकार मेरे ऊपर आचार्य कुन्दकुन्द देव के ही समान है। आचार्य महाराज के आशीर्वाद से, उन्हीं की साक्षात् प्रेरणा से, आज मैं आचार्य कुन्दकुन्द देव से साक्षात् बात कर पा रहा हूँ। पूज्य श्री अमृतचंद्रसूरि की आत्मख्याति जैसे जटिलतम साहित्य को देखने-समझने की क्षमता पा सका हूँ तो श्री जयसेन आचार्य महाराज के छिले हुए केले के समान सरलतम व्याख्यान के माध्यम से अध्यात्मरूपी भूख मिटा रहा हूँ और आत्मानुभूति को प्राप्त करने के लिए प्रयासरत रहता हूँ। किन्तु बड़े दुःख की बात है कि आप लोग अभी तक भूखे ही बैठे हुए हैं। उसे चख नहीं पाए। आत्मानुभूति शब्दों में कहने की वस्तु नहीं है, वह तो मात्र संवेदनीय है।

     

    गुरु से याचना

     

    दीप नहीं, द्वीप चाहिए - हे भगवन्! हे दीप स्तम्भ! आपसे मुझे अब दीप नहीं, द्वीप चाहिए, जिस पर मैं ठहर सकूँ। भवसागर में आते-आते, गोते खाते-खाते, तैरते-तैरते हाथ भर आए हैं। अब हाथों में, पैरों में बल नहीं रहा। शिथिलता आ गई है। “आचार्य ज्ञानसागरजी महाराज से मैं दीप नहीं चाहता, द्वीप चाहता हूँ,” अब हमें केवल द्वीप चाहिए यानी विराम चाहिए। जैसे उन्होंने किनारा पाया, उसी प्रकार हमें भी किनारा मिल जाए। हमें भी वह समाधि में लीन होने का सौभाग्य प्राप्त हो जाए। हमें पर नहीं, स्व चाहिए। स्व में जो लीन हो जाता है, पर के लिए वह आदर्श बन जाता है। स्व-पर कल्याणी दृष्टि चाहिए।

     

    ज्ञानसागरो जलधौ द्वीपः,

    स्वर्गमोक्षयोः पद्धतिदीपः..॥७॥

    धीवरोदय, चम्पूकाव्य

     

    गुरुवर आचार्य श्री ज्ञानसागरजी महाराज द्वीप के समान हैं तथा स्वर्ग और मोक्षमार्ग की पद्धति में दीपक की तरह प्रकाशित हैं....

     

    अपूर्ण जीवन पूर्ण बने - मरुभूमि के समान जीवन को भी हरा-भरा बनाने का श्रेय गुरुदेव को ही है। आप लोगों का गुरुदेव के समाधि दिवस पर गुरु की महिमा सुनते-सुनते मन भर आया है। कैसे कहूँ? अथाह सागर की थाह कौन पा सकता है। हम उनके कदमों पर चलते जाएँ, उनके सच्चे प्रतिनिधि बनें और उनकी निधि को देख-देख कर उनकी सन्निधि का अहसास करते रहें। यह अपूर्ण जीवन उनकी स्मृति से पूर्ण हो जाए।

     

    उनका योग हमेशा मिलता रहे - अपने सुख को गौण करके, अपने दुःख की परवाह न करते हुए दूसरों के दुःख को दूर करने में, दूसरों में सुख-शांति की प्रस्थापना करने में जिन्होंने अपने जीवन को समर्पित कर दिया, ऐसे महान् कर्तव्यनिष्ठ और ज्ञाननिष्ठ व्यक्तित्व के धारी गुरुदेव का योग हमें हमेशा मिलता रहे।

     

    प्रतिदिन आज्ञा में चलें - ऐसे उन गुरु महाराज के प्रति गुणगान गाएँ और एक दिन भी उनकी आज्ञा में न चलें, तो ठीक नहीं। किन्तु हम ३६४ दिन आज्ञा में चलें और एक दिन गुणगान गाएँ, तो ठीक है।

     

    हमें पार लगाएँ - गुरुदेव हमारे हृदय में रहकर हमें हमेशा उज्ज्वल बनाते जाएँगे। यही उनका आशीर्वाद हमारे साथ है। हम यही प्रार्थना करते हैं, भावना भाते हैं कि हे भगवन्! उस पवित्र पारसमणि के समान गुरुदेव का सान्निध्य हमारे जीवन को उज्ज्वल बनाए। कल्याणमय बनाए। उसमें निखार लाए। अभी हम मझधार में हैं, हमें पार लगाए।

     

    प्रमानान्जली (72).jpg

     

    एकत्व-विभक्त आत्मा बनूँ - हम तो विनती करना जानते हैं। गिनती करना नहीं जानते। गुरुदेव साइटिका (Saitica) रोग से पीड़ित थे, मगर आत्मा के प्रति आस्था प्रबल थी। वे चले गए। अब हमें उस क्षण की तलाश है जब हम एकत्व-विभक्त आत्मा हों। बस हमें अकेला बनना है।

     

    पल-पल याद करूँ - बत्तीस वर्ष बहुत बड़ा काल है। समझ में नहीं आता। इतना समय (काल) निकल गया। लगभग तीन दशक से भी अधिक हो गए, परन्तु उनके दिए सूत्र से ऐसा नहीं लगता कि इतना काल बीत गया। पर ये सैंतीस वर्ष अब सैंतीस दिन जैसे लगते हैं। अध्यात्म के साथ गुरु कृपा ही महान् मानी जाती है। आचार्य गुरुदेव को बार-बार प्रणाम। ऐसे महान् आचार्य को एक-एक पल याद करूँ, देखता रहूँ। आगे भी देखूँ।

     

    सदा गुरु सामीप्य रहे - मेरी भावना है कि मैं जो कुछ भी बनूँ, वह गुरु चरणों में चढ़े और वहीं जम जाऊँ। इसी भावना से एक दोहा लिखा था

     

    पंक नहीं पंकज बनूँ, मुक्ता बनूँ न सीप।

    दीप बनूँ जलता रहूँ, गुरु पद पद्म समीप॥

    सर्वोदय शतक,६

     

    प्रमानान्जली (73).jpgसमाधि सम्पन्न हो - शेष कार्य समाधि का जो बचा, आपके परोक्ष आदेश से सम्पन्न हो।

     

    उपसंहार

    ऐसी समयसार की अनुभूति करने वाले गुरुदेव के विषय में अधिक कुछ कहना नहीं है। केवल यही कहना है कि आपने इस नादान शिशु पर जो उपकार किया, वह केवल अनुभवगम्य है। उसको शब्दों में प्रकट करने में मैं असमर्थ हूँ। “आपका यह उपकार हमें तब तक याद रहेगा, जब तक मुक्ति की प्राप्ति न हो जाए।” तब तक हमें याद भर रहे, यही मैं प्रभु से प्रार्थना करता हूँ, क्योंकि इस संसारी प्राणी की, मोह की चपेट में आने से भूलने की आदत है। इसलिए यही एक बड़ा उपकार आपका हो कि स्मृति पटल आपकी याद के लिए सदा स्वच्छ बना रहे।

     

    इस दुनिया में दो बातें श्रेष्ठ हैं - एक गुरु और दूसरे प्रभु। गुरु हमारे लिए अदृश्य प्रभु तक पहुँचाने के लिए मार्ग दर्शाते हैं। गुरु के द्वारा दिए हुए सूत्र मन्त्र हैं। ये शास्त्र से भी ज्यादा आनन्द देने वाले हैं एवं छोटे रास्ते से मंजिल दिलाने वाले हैं। मुझे गुरु के वचन शास्त्र से भी ज्यादा याद आते हैं।

     

    ‘आचार्य श्री ज्ञानसागरजी महाराज ने मेरे ऊपर इतना उपकार किया

    जिसे मैं सिद्ध बनने के उपरांत भी नहीं भूल पाऊँगा।'

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