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मेरे गुरुवर... आचार्य श्री विद्यासागर जी महाराज
  • पाठ २ - दिव्य-भव्य व्यक्तित्व

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    सूर्य के समान दैदीप्यमान आचार्य श्री विद्यासागरजी महाराज के आरंभिक जीवन में ऐसी कौन-सी दिव्यता-भव्यता रही, जिस कारण वे माता-पिता की द्वितीय संतान ( जीवित संतानों की अपेक्षा) होकर अद्वितीयता का कीर्तिमान स्थापित करते हुए, श्रमण संस्कृति रूपी अंगूठी के जगमगाते नगीने बन गए। नगीने की चमक के समान उनके बचपन से लेकर ब्रह्मचर्य व्रत ग्रहण करने तक के दिव्य-भव्य कुछ प्रसंगों को प्रस्तुत पाठ में दर्शाया जा रहा है।

     

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    माँ की कोख बनी मंदिर - जैसे सूर्योदय होने के पूर्व लालिमा आ जाती है, ऐसे ही महापुरुषों के आने से पूर्व शुभ संकेत हो जाया करते हैं, क्योंकि ‘अचिन्त्यो हि महात्मनां प्रभावः’ अर्थात् महात्माओं का प्रभाव अचिन्त्य होता है। इसी तरह संत शिरोमणि आचार्य श्री विद्यासागरजी महाराज का जीव जब गर्भ में आया, तब उनके माता-पिता को भी स्वप्न के द्वारा शुभ संकेत हुए। माँ (अक्का) श्रीमंतीजी ने एक के बाद एक, तीन स्वप्न देखे। पहला- दूर से एक चक्र घूमता हुआ उनकी ओर आ रहा है और वह पास आकर उनके कक्ष में रुक गया। दूसरा- चक्र रुका ही था कि अगले ही पल बादलों के बीच से श्रीमंतीजी के भवन की ओर दो तीर्थंकर भगवान् चले आ रहे हैं। तीसरा- उनके पीछे दो चारण ऋद्धिधारी मुनिराज चले आ रहे हैं। और माँ श्रीमंतीजी उन दोनों मुनिराजों को नवधा भक्ति पूर्वक पड़गाहन कर आहार दे रही हैं।

     

    जब श्रीमंतीजी ने अपना स्वप्न मल्लप्पाजी को सुनाया, तब वे भी मन ही मन थिरक उठे। बोले कुछ नहीं, उन्हें भी अपना स्वप्न स्मरण हो आया, मैंने भी तो एक स्वप्न देखा था। मैं आम के वृक्ष के नीचे खड़ा हूँ। झाड़ियों से एक सिंह दहाड़कर दौड़ता हुआ आया और हमारे मुख में प्रवेश कर गया। मैं किंकर्तव्यविमूढ़ खड़ा रह गया। उन स्वप्नों को देखकर माँ श्रीमंतीजी तो अपने आप में खो-सी गई, और मल्लप्पाजी ने, न जाने कैसे-कैसे स्वप्न आते हैं, कह कर टाल दिया। पर जब उन्होंने अपने बालक विद्याधर को महाश्रमण आचार्य श्री विद्यासागरजी के रूप में पाया। तब स्पष्ट हुआ कि वे स्वप्न तो दिव्य-भव्य पुरुष रूपी बीज के वपन की पूर्व सूचनाएँ थीं।

     

    माता द्वारा देखे गए स्वप्नों की तीन संख्या सूचित कर रही थी, कि वह ‘रत्नत्रय' का धारी होगा। ‘चक्र' देखने से, वह धर्म तीर्थ का प्रवर्तन करने वाला होगा। और तीर्थंकर की मुद्रा देखने से, वह तीर्थंकर के मार्ग का अनुगामी होगा। एवं चारण ऋद्धिधारी मुनिराजों के आगमन को देखने से वह विशुद्ध चर्या का पालनकर्ता होगा। इसी प्रकार स्वप्न में पिता द्वारा मुख में सिंह का प्रवेश करते हुए देखना स्पष्ट संकेत कर रहा था कि उनके परिवार में आने वाला जीव आध्यात्मिक सिंह के रूप में सृष्टि पर विचरण करता हुआ, आप सभी पारिवारिक सदस्यों को आध्यात्मिकता में समाहित करने की सामर्थ्य वाला होगा। इस तरह बालक विद्याधर के गर्भ में आने से पूर्व माता-पिता ने शुभ सूचक स्वप्न देखे। आध्यात्मिक संत आचार्य श्री विद्यासागरजी जैसे पुण्य पुरुष के जीव को गर्भ में धारण कर माँ की कोख मंदिर बन गई।

     

    पूनम का जीवंत चाँद पा, खिल-खिला उठा घर-आँगन

     

    0047.jpgदिव्य पुरुष का जन्म - अष्टगे परिवार की जीवित संतानों की अपेक्षा पहली संतान (महावीर) के जन्म के समय माँ की स्थिति अत्यंत बिगड़ गई थी। उन्हें सँभालना मुश्किल हो गया था। इससे निर्णय लिया गया, कि इस बार संतान का जन्म अस्पताल में कराएँगे। दूध का जला हुआ व्यक्ति छाछ भी फूँक-फूँक कर पीता है। अतः अष्टगे परिवार की दूसरी संतान का जन्म सदलगा के पास चिक्कोड़ी ग्राम स्थित शासकिय चिकित्सालय में

    हुआ।

     

    चिकित्सालय के अधिकारी बच्चे की सुंदरता को देखकर बोले- ‘आपने कितनी सुंदर संतान को जन्म दिया है। यह द्वितीय होकर भी अद्वितीय है।' नर्स (परिचारिका) ने जब नवजात शिशु का वजन किया, तब बच्चे को ७ पौंड का पाया। वह बोली- “यह वजन तो निरोगता का लक्षण है। स्वस्थ होने का सूचक है। इसीलिए आपका बच्चा जीवन पर्यंत निरोग/स्वस्थ रहेगा।' किसे पता था, कि वह जीवन पर्यंत स्वस्थ अर्थात् अपने में स्थित (आत्मस्थ) रहने वाला होगा।

     

    नामकरण - सदलगा से ३० किलोमीटर की दूरी पर अक्किवाट (अकिवाट, कोल्हापुर, महाराष्ट्र) नामक एक ग्राम है। वहाँ पर प्रसिद्ध ऋद्धिधारी, चमत्कारी, भट्टारक मुनि श्री विद्यासागरजी की समाधि स्थली बनी हुई है। वर्तमान के कर्नाटक प्रांत में आपके विषय में प्रसिद्धि है कि उन्हें अपनी साधना के बल पर अनेक शक्तियाँ प्राप्त थीं। एक बार दिल्ली में मुगलशासक द्वारा जैन समाज पर बड़ा भारी धर्म संकट उपस्थित हो गया। यदि शासन के नियमों के अनुकूल पालन करते हैं, तो धर्म संकट उपस्थित होता है। यदि नहीं करते, तो शासन की आज्ञा के उल्लंघन का दण्ड भोगना पड़ेगा। ऐसे में जैन समाज ने शासन के नियमों के पालन करने के लिए शासन से कुछ दिनों की मोहलत प्राप्त की। समाज को ज्ञात हुआ कि अक्किवाट नामक ग्राम में विराजमान मुनि श्री विद्यासागरजी, उन्हें इस संकट से निकाल सकते हैं। दिल्ली से जैन समाज के लोग लगभग एक हजार किलोमीटर की दूरी एक माह में बैलगाड़ी से पूर्ण कर, अक्किवाट ग्राम पहुँचे।

     

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    उन्होंने अपनी सारी घटना अश्रुधारा बहाते हुए मुनिश्री को सुना दी। मुनिश्री मौन रहे। ऐसी स्थिति में कुछ लोगों ने श्रावकों के व्रत ग्रहण कर लिए, कुछ लोग दीक्षा माँगने लगे और कुछ लोग कहने लगे अब हम दिल्ली नहीं जाएँगे। यहीं नौकरी-चाकरी कर लेंगे। इस तरह सात दिन निकल गए, समाज चिंतित हो गई। श्रावकों ने अवरुद्ध कंठ से पुनः निवेदन किया। समय जा रहा है, मात्र दो ही दिन शेष हैं। इतना लंबा रास्ता है। कैसे होगा ? महाराजश्रीजी ने आशीर्वाद दिया और बोले- ‘सब अच्छा हो जाएगा।'

     

    दिल्ली जैन समाज के दुःखी एवं चिंतित साठ श्रावक रात्रि में चर्चा करते-करते कब सो गए, उन्हें पता ही नहीं चला। प्रातः आँख खुली, तो देखा कि वे मुनि श्री विद्यासागरजी सहित दिल्ली में किले के प्रांगण में हैं। उनके आश्चर्य एवं हर्ष का ठिकाना नहीं रहा। यह खबर सर्वत्र फैल गई। सारी दिल्ली उमड़ पड़ी। बादशाह भी भेंट लेकर आए। भेंट की थाली में मांस का टुकड़ा सुंदर वस्त्र से ढक कर लाए। उसे भेंट करते हुए मुनिश्री से पूछा- ‘इस थाल में क्या है?’ मुनिश्रीजी ने कहा-‘कमल के फूल।’ वे सब हँसने लगे, पर जब वस्त्र हटाया तब मांस के टुकड़े की जगह कमल के पुष्प देखकर बादशाह आश्चर्य में पड़ गए। इसी तरह एक बार उन्होंने अमावस्या के दिन को पूनम करके बतलाया था। इन चमत्कारों को देखकर बादशाह शर्मिंदा हुआ और मुनिश्री से क्षमा माँगी। यह भी किंवदंति है कि उन्होंने अपनी समाधि के स्थान का चयन करने के लिए नींबू मंत्रित करके फेंका था। वह अक्किवाट में जाकर गिरा था। वहाँ पर ही उनकी समाधि हुई। समाधि स्थली के विषय में मान्यता है, कि यहाँ पर मनोभावनाएँ पूर्ण होती हैं। आज भी प्रत्येक अमावस्या के दिन मेला भरता है।

     

    सच्चा धर्मी प्रभु पूजन से किसी प्रकार की आकांक्षा नहीं रखता। पर जब वह संकट में आता है, तब प्रभु एवं गुरु को ही पुकारता है। ऐसा ही हुआ माँ श्रीमंतीजी के साथ। उनके बड़े पुत्र महावीर दो वर्ष के होंगे। तब उनका स्वास्थ्य बिगड़ गया। बचने की आशा नहीं थी। ऐसे में श्रीमंतीजी ने मुनि श्री की समाधिस्थली पर प्रार्थना की और संकल्प किया कि वे प्रत्येक पाँच अमावस्या को पाँच नारियल चढ़ाएँगी और पूजन व शांति विधान करके गरीबों को भोजन कराएँगी। उनकी प्रार्थना पूर्ण हुई। महावीर ठीक हो गए। इन्हीं पाँच अमावस्या के दिनों में श्रीमंतीजी के गर्भ में दूसरी संतान आ गई। माता-पिता ने इस दूसरी संतान का नाम इन भट्टारक मुनि विद्यासागर की स्मृति में विद्याधर रखा।

     

    विद्याधर के अपर नाम - बचपन में विद्याधर पाँच-पाँच नामों के धारी थे। विद्याधर, पीलू, गिनी, तोता और मरी । दक्षिण प्रांत में छोटे बच्चों को लाड़ प्यार में पीलू कहा जाता है। माँ विद्याधर को पीलू कहकर बुलाती थीं। विद्याधर ने जब बोलना शुरू किया, तब अत्यंत मधुर, मिश्री जैसी मीठी आवाज सुनकर अड़ोस-पड़ोस के लोग उन्हें गिनी कहने लगे। कन्नड़ भाषा का गिनी, हिन्दी भाषा में तोता कहलाता है। जिससे उन्हें तोता कहकर भी बुलाया जाने लगा। उनकी गोल-मटोल सुंदर, आकर्षक कद-काठी को देखकर कोई उन्हें मरी कह देता। कन्नड़ में मरी का अर्थ छोटा होता है। इसी तरह तीर्थंकर वर्धमान स्वामी के जैसे ‘वर्तमान के वर्धमान’ (आचार्यश्रीजी) भी पाँच-पाँच नामों के धारी थे। और वर्तमान में वह गणनातीत नामों से ख्यात हो रहे हैं।

     

    जैसा चढ़ाया, वैसा पाया - जिसके प्रति हमारी जितनी श्रद्धा-भक्ति रहती है, उसके प्रति समर्पण की भावना भी उतनी ही होती है। और समर्पण में अर्पण करने की कोई सीमा नहीं होती। ऐसे भक्तिपूर्वक किए गए अर्पण से संचित पुण्य के द्वारा क्या प्राप्त नहीं होता। मल्लप्पाजी भी ऐसे ही समर्पित भक्तों में से थे। वे पाँच वर्ष तक संकल्प पूर्वक प्रत्येक अमावस्या के दिन २५ किलो मीटर की दूरी पर स्थित ‘स्तवनिधि' नामक क्षेत्र के दर्शन करने जाते थे, और पाँच श्रीफल चढ़ाकर अरहंत प्रभु के चरणों में अर्थ्य समर्पित करते थे। वे नियमित की जाने वाली पूजन में भी उत्तम से उत्तम द्रव्य चढ़ाते थे।

     

    देव-शास्त्र-गुरु की अनाकांक्षित भाव से की गई भक्ति से संचित पुण्य का फल है कि उनके आँगन में तीर्थंकर बालक जैसे विद्याधर बालक का जन्म हुआ। गाँव के लोग कहा करते थे-“अरे ! प्रभु के प्रति उनकी भक्ति निराली है। प्रभु चरणों में उत्तम अर्घ्य चढ़ाने के फलस्वरूप ही उन्हें उत्तम संतान की प्राप्ति हुई।”

     

    जो ध्याया, वो पाया -  पूजा के भाव, परिणामों की निर्मलता एवं शुभ क्रियाओं के प्रति उत्सुकता आदि आश्चर्यजनक परिणाम भगवान् की भक्ति देती है। तभी तो भावना भवनाशनी,'यहाँ तक कह दिया है। एक बार गाँव के अनेक लोगों ने माँ श्रीमंतीजी से पूछा कि सभी भाई-बहनों में विद्याधर इतने सुंदर कैसे हैं? तो माँ श्रीमंतीजी ने कहा- ‘जब बालक विद्याधर गर्भ में आए थे, तब मुझे भगवान् बाहुबली के दर्शन व पूजन की तीव्र इच्छा हुई थी। और पूजन भक्ति से जो पुण्य का संचय हुआ, उसके परिणाम स्वरूप सुंदर बालक उत्पन्न हुआ।

     

    सच्चे मन से हम जिनकी आराधना करते हैं, तब उनके पास जो होता है, वह हमें प्राप्त हो ही जाता है। भगवान् श्री बाहुबलीजी कामदेव, कठोर तपस्वी एवं अपने भाई और पिता से ही पहले लक्ष्य को प्राप्त करने वाले थे। माँ श्रीमंतीजी ने श्री बाहुबली स्वामी की आराधना से उनके समान सुंदर रूप वाला, दृढ़ साधक एवं पिता और भाइयों से पहले लक्ष्य को जानने वाला पुत्र प्राप्त किया।

     

    माँ की लोरी, त्वं शुद्धोऽसि..... - बालक विद्याधर का वह मनमोहक रूप माँ को उससे अलग होने का भाव नहीं करने देता है। घर के आँगन के पालने में लेटा-लेटा विद्याधर अपने पैर के अँगूठे को चूसते हुए किलकारियाँ ले रहा है। माँ कभी उसे उठाती, कभी झुलाती, कभी गाती और कभी झूम जाती। रूप-लावण्य के धनी अद्वितीय लाड़ले विद्याधर की किलकारियों पर, बलिहारी हो जाती माँ।

     

    उनके मधुर कंठ से स्वतः ही लोरी निकल पड़ती-

    ‘तू शुद्ध है,

    तू बुद्ध है,

    तू निर्विकल्प है,

    तू अविनाशी है,

    निर्विकारी है,

    तू अनंतगुणी विलासी है,

    झूलत चेतन में.....।

     

    माँ की इन अध्यात्म से परिपूर्ण लोरियों, भजनों ने विद्या के अंत में अध्यात्म का सागर भर दिया। आज वह विद्या के सागर बनकर सबको अध्यात्म का मधुर गान सुनाकर वैराग्य पथ पर अग्रसर कर रहे हैं।

     

    मुनि एवं पिच्छी देख होते आकर्षित - विद्याधर के जीव ने एक नहीं, कई जन्मों के पुण्य को संचित कर जन्म लिया होगा। तभी उनके बचपन की अठखेलियाँ सामान्य बच्चों से कुछ अलग ही थीं। जब विद्याधर गर्भ में आए, तब माँ को मुनि दर्शन की चाह बनी रहती थी। आस-पास कहीं साधु होते तो वे स्वयं को जाने से रोक नहीं पातीं। अबोध दशा में भी विद्याधर मुनियों को देख उनकी ओर आकर्षित होने लगे। बोलना सीखे ही थे, कि मुनियों को देख नमोऽस्तु-नमोऽस्तु बोलने लगे। उन्हें सिखाना नहीं पड़ा। मयूर पिच्छी से विशेष लगाव था। जहाँ बच्चे मयूर पंख या पिच्छी को देख डर जाते हैं, वहीं वह पिच्छी को देख, उसे सर पर लगाने का इशारा करते। उसे हाथ में लेने की कोशिश करते और वापस लेने पर रोने लग जाते थे। यदि कभी कोई मुनिराज पिच्छी दिखाकर पूछते कि पिच्छी चाहिए, तो अपने दोनों हाथों को ऐसी उत्सुकता से फैलाते मानो कह रहे हों, विलम्ब न करें।

     

    आज आचार्यश्रीजी को देखकर लगता है कि बचपन में मुनि एवं पिच्छी का वह आकर्षण, मोक्ष पथ के प्रति आकर्षण का ही द्योतक था। बचपन के शुभ लक्षण, लक्ष्य को पाने वाले विलक्षण व्यक्ति की ओर संकेत करते हैं।

     

    भगवान् जैसा सुंदर रूप - जहाँ पर पुण्य वास करता है वहाँ अनायास ही मनमोहकता आ जाती है। वह सबको प्रिय एवं सुंदर लगता है। जब विद्याधर ढाई वर्ष के थे, तब अपने माता-पिता के साथ गोम्मटेश यात्रा पर गए थे। उस समय यात्रियों में से किसी ने कहा- ‘तुम्हारा बेटा विद्याधर भगवान् जैसा मनोज्ञ एवं सुंदर दिखता है, उसे भगवान् के पास बैठा दो।’ इसी प्रकार आचार्य श्री देशभूषणजी महाराज द्वारा जब बालक विद्याधर का मुँजीबंधन संस्कार हो रहा था, तब आचार्य श्री अनंतकीर्ति महाराज से दीक्षित आर्यिका विमलमति माताजी ने कहा- ‘विद्याधर ! अब तुम सचमुच में भगवान् जैसे दिखने लगे हो। तुम अब घर जाओ।’ घर आकर विद्याधर माँ से बोले- ‘मुझे माताजी ने भगवान् कहा’, ऐसा बार-बार बोलकर वह खुश होते रहे। बचपन में लोगों के मुँह बोले भगवान् सचमुच में आचार्य भगवन् बन, उच्च सिंहासन पर आरूढ़ होकर, हमें बोधि और बोध प्रदान कर रहे हैं।

     

    पीलू की चेष्टा, अन्ना-अक्का चकित - एक बार मंदिरजी में वेदी के सामने माँ ने पीलू को गोद से उतार कर खड़ा कर दिया और स्वयं दर्शन-पूजन करने लगीं। पीलू ने अपनी तोते-सी मीठी आवाज में भगवान् को त्यै (जय) बोला, और खुश होकर धीरे-से वेदी पर चढ़ी बादाम को उठाकर अपनी शर्ट की जेब में रख लिया। सामने बैठे माता-पिता यह देखकर चकित रह गए कि पीलू ने बादाम जेब में रखी, मुख में नहीं। पीलू तो त्यै-त्यै (जय-जय) बोलने में मस्त रहे। इधर माँ ने नज़र बचाकर उसकी जेब से बादाम निकालकर वापस वेदी पर रख दी।

     

    बाल्यावस्था की अठखेलियाँ  

    विद्याधर जन्म से ही सबके दुलारे थे। अपनी बालक्रीड़ाओं से परिवार, पड़ोस और सबको मुग्ध कर लेते थे। जो भी देखता, उसका मन स्वतः उनको खिलाने का हो जाता और वह भी बिना रोए-गाए सबके पास चले जाते। सुन्दर रूप-रंग, सुडोल, सम कद-काठी एवं प्रशस्त प्रकृतियों से संयुक्त वह बालक अपनी बाल अठखेलियों से सबको आनंदित कर रहा था।

     

    कर्नाटक प्रांत में साहित्यिक कन्नड़ भाषा में माता-पिता को ‘ताई-तंदे' एवं बोलचाल की भाषा में औवा-अप्पा' बोलते हैं। पर मल्लप्पाजी एवं श्रीमंतीजी की संतान अपने माता-पिता को औवाअप्पा के स्थान पर अक्का-अन्ना बोलते थे। अक्का यानी बड़ी बहन या भाभी एवं अन्ना यानी घर का मुखिया या बड़ा भाई। चूँकि मल्लप्पाजी के छोटे भाई-बहन अपने बड़े भाई (मल्लप्पाजी) को एवं भाभी (श्रीमंतीजी) को अक्का-अन्ना बोलते थे, जिसे सुनकर उनकी संतान भी उन्हें अक्का-अन्ना बोलने लगी।

     

    0053 - Copy.jpgविद्याधर का विद्यालय प्रवेश - अन्नाजी (पिताजी) ने पाँच वर्ष की उम्र में विद्याधर का विद्यालय में दाखिला करा दिया। विद्यालय का नाम ‘कन्नड़ गन्डु मक्कड़ शालेय’ (कन्नड़ बालक प्राथमिक शाला), सदलगा था। वह घर से आधा किलो मीटर की दूरी पर था। प्रारंभ में अन्नाजी स्वयं स्कूल छोड़ने जाते थे। स्कूल के नाम से वह कभी रोते नहीं थे। उस समय स्कूल का समय दो भागों में निर्धारित था, प्रातः ७ से ११ बजे एवं दोपहर में भोजन के बाद २ से ५ बजे तक। विद्यार्थी बस्ते के स्थान पर एक बड़े से कपड़े में कॉपी किताबें लपेट कर ले जाते थे। बैठने के लिए अपनी टाटपट्टी भी साथ ले जाते थे। विद्यालय में सुबह सात बजे प्रार्थना होती थी। वह विद्यालय जहाँ विद्याधर का दाखिला हुआ शिक्षक द्वारा दिया गया पाठ प्रतिदिन सुना जाता था। एवं टोली बनाकर अपनी-अपनी कक्षा की सफ़ाई, गोबर से लिपाई आदि करनी होती थी।

     

    विद्यार्थियों को इन सभी कार्यों के तुरंत के तुरंत अंक दिए जाते थे। प्रत्येक विद्यार्थी ने दिनभर में कुल कितने अंक प्राप्त किए, घर जाते समय वह शिक्षक को लिखवाना होता था। कोई भी विद्यार्थी इसमें बेईमानी नहीं करता था। सप्ताह भर के अंकों के आधार पर प्रथम, द्वितीय व तृतीय स्थान दिया जाता था। प्रथम स्थान प्राप्त विद्यार्थी को अपनी कक्षा में हाज़िरी लगाने एवं आगे बैठने मिलता था। विद्याधर अपने किसी भी कार्य के प्रति आलस नहीं करते थे। जब कभी प्रार्थना में पहुँचने के लिए घर पर देर हो रही होती या माँ दूध दुह रही होती, तब वह बिना गर्म हुआ ही ताज़ा दूध पी लेते, पर प्रार्थना के समय स्कूल ज़रूर पहुँचते। इस पर भी यदि कभी उनका प्रथम स्थान नहीं लग पाता तो वह उदास हो जाते। माँ उन्हें समझाती कि आगे सावधानी रखोगे तो पुनः प्रथम स्थान लग जाएगा।

     

    0053.jpgछोटे से बड़ा बनाना सीखा -  विद्याधर ने एक दिन स्कूल में अ, आ बनाना सीखा। दिन भर में सीखकर अपनी स्लेट को एक (फ़ छोटा ‘अ’ से तथा दूसरी तरफ़ बड़े ‘आ' से भरकर घर गए। घर आने पर माँ ने पूछा- ‘आ गए बेटा! स्कूल से।' वद्याधर बोले- ‘हाँ..माँ.. आ गया।’ माँ बोली- ‘आज क्या सीखा ?’ विद्याधर ने स्लेट के दोनों और लिखे छोटा ‘अ’ एवं बडा ‘आ' को दिखाते हुए कहा- ‘देखो माँ! आज हमने छोटे से बड़ा बनाना सीखा। ‘अ’...आ...ऽऽ..।’ उसके भोलेपन को देख माँ ने उसे अपनी गोदी में उठा लिया एवं कहा- ‘सचमुच तू एक दिन छोटे से बड़ा बनेगा |

     

     

    विद्याधर के मोती से अक्षर - विद्याधर का लेखन अत्यंत सुंदर था। एक-एक अक्षर मोती की तरह गोल-मटोल, स्पष्ट एवं साफ़-सुथरे दिखते थे। कॉपी पर काटा-पीटी न के बराबर ही होती थी।

     

    मैं भी बड़ा हूँ, मुझे भी नेहरू कहो - लगभग आठ-दस वर्ष की उम्र में विद्याधर ने पड़ोस में टॅगी नेहरूजी की फोटो देखकर माँ से पूछा- ‘यह कौन हैं ?’ माँ ने कहा-‘बेटा! यह अपने देश के बहुत बड़े आदमी हैं, ‘पंडित जवाहरलाल नेहरू।’ यह सुनते ही विद्याधर बोले- ‘माँ! मैं भी बड़ा आदमी हूँ। मुझे भी नेहरू कहा करो।’ उस समय माँ को क्या पता था कि यह नन्हा-सा बालक एक दिन श्रमण परंपरा में वर्तमान युग का बड़ा श्रमण' बनेगा।

     

    कंचे पर कंचा जमाना - बचपन में विद्याधर कंचा का खेल खेला करते थे। खेल-खेल में वह कंचों पर हल्की – हल्की धूल डाल कर एक के ऊपर एक नौ कंचे तक जमा लेते थे। जैन शास्त्रों में प्रसंग आता है कि आचार्य भद्रबाहु स्वामीजी ने भी बचपन में एक के ऊपर एक चौदह कंचे जमाए थे। तभी वहाँ से आचार्य श्री गोवर्धनस्वामीजी निकले उन्होंने अपने निमित्त ज्ञान से अनुमान लगा लिया कि वे ग्यारह अंग एवं चौदह पूर्वो के धारी बनेंगे। और हुआ भी वही। वह अंतिम श्रुत केवली बने, तो क्या विद्याधरजी का यह खेल भी भविष्य में उनके ब्रह्मचर्य के नवकोटि गुप्तिधारी मुनि बनने की सूचना दे रहा था।

     

    प्रवचन सुन, वपन हुआ वैराग्य का नन्हा-सा वट-बीज - जब विद्याधर ९ वर्ष के थे, उस समय उन्हें परिवार के साथ ‘शेडवाल' (बेलगाम, कर्नाटक) ग्राम में चारित्र चक्रवर्ती आचार्य श्री शांतिसागरजी के दर्शन एवं प्रवचनों का सौभाग्य प्राप्त हुआ था। आचार्य श्री शांतिसागरजी महाराज ने श्रद्धा के द्वारा आत्मा कैसे उत्थान को प्राप्त होती है, इसे दो दृष्टांतों के माध्यम से समझाया। प्रथम दृष्टांत में उन्होंने एक ब्राह्मण एवं गड़रिया की कहानी सुनाई थी- एक ब्राह्मण पानी में डुबकी लगाकर जल-देवता की उपासना कर रहा था। यह देखकर बकरी चरा रहे एक गड़रिया ने भी मोक्ष प्राप्ति की भावना से जल में डुबकी लगा दी। और संकल्प कर लिया, कि जब तक जल-देवता दर्शन नहीं देंगे, तब तक बाहर नहीं आऊँगा। आखिरकार जलदेवता को प्रकट होकर उसे वरदान देना पड़ा। कथा तो कथा रूप में थी, जिसका सार था- जो जिसकी उपासना करता है, वह उसको प्राप्त कर सकता है। अपनी श्रद्धा दृढ़ होनी चाहिए। इसका प्रभाव गीली माटीसम विद्याधर के चित्त पर अमिट रूप से पड़ गया।

     

    दूसरा दृष्टांत देते हुए आचार्य श्री शांतिसागरजी महाराज ने कहा- दो भाई थे। दोनों व्यापार के लिए दूसरे गाँव गए। खूब धन कमाया। जब वापस लौट रहे थे, तब उनके मन में लालच आ गया। वे एक-दूसरे को मारने की योजना बनाने लगे। रास्ते में एक भाई ने दूसरे भाई से कहा- मैं भोजन लेकर आता हूँ।' जो भोजन लेने गया था, उसने तो बाजार में भोजन कर लिया और दूसरे भाई के भोजन में विष मिलाकर ले आया। जो भाई रास्ते में ठहरा था, उसके मन में भी आया कि भाई को धन में से एक पाई भी नहीं देना पड़े, इसलिए उसने भी उसे मारने के लिए बंदूक ले ली। जैसे ही भोजन लेकर भाई आया, तो उसने उसे गोली मार दी। और भाई जो भोजन लाया था, उसे खा लिया। विष वाला भोजन खाने से वह भी मर गया। दोनों भाईयों ने मरकर तीर्थराज श्री सम्मेद शिखरजी में बन्दर के रूप में जन्म लिया। संयोग से उनकी मृत्यु के समय किन्हीं मुनि महाराज ने उन्हें णमोकार मंत्र सुना दिया। जिससे उनका पूर्व का बैरभाव समाप्त हो गया। और वे दोनों स्वर्ग चले गए।

     

    0055.jpgइन उदाहरणों ने विद्याधर बालक की पूर्व से ही उपजाऊ आत्मभूमि में बीज वपन का कार्य किया। इस तरह विद्याधर के अंत में वपन हो जाता है वैराग्य का एक नन्हा-सा वट-बीज। आचार्यश्रीजी ने स्वयं आचार्य श्री शांतिसागरजी महाराज की स्तुति लिखते समय अपने इन भावों की अभिव्यक्ति की है

     

    थे शेडवाल गुरुजी एक बार आए,

    इत्थं अहो सकल मानव को सुनाए।

    भारी प्रभाव मुझपे तव भारती का,

    देखो पड़ा इसलिए मुनि हूँ अभी का।।३३।।

     

    भक्तामर स्तोत्र कंठस्थ करना - विद्याधर जब चौथी कक्षा में पढ़ते थे, तब ‘भक्तामर स्तोत्र' उन्होंने कंठस्थ कर लिया था। सदलगा में मेला लगने वाला था। अन्नाजी ने बच्चों को प्रलोभन दिया कि जो भी भक्तामरजी का एक एक श्लोक याद करके सुनाएगा, उसे एक श्लोक के दो या चार आने दिए जाएँगे। मेला देखने के लिए उसके पास पैसे इकट्टे हो जाएँगे। अन्नाजी स्वयं भक्तामरजी का उच्चारण करवाने लगे। अन्नाजी जितना उच्चारण करवाते, विद्याधर उतना अगले दिन याद करके सुना देते। देखते ही देखते विद्याधर को भक्तामर कंठस्थ हो गया। बचपन से सहनशील एक दिन खेल-खेल में विद्याधर ने एक ऊँचे स्थान से छलाँग लगा दी। इससे उनके पंजे में लोहे के टीन का एक टुकड़ा आर-पार हो गया। यह देखकर उनके साथी घबड़ा गए, पर ‘विद्याधर' नहीं घबड़ाए। उन्होंने उसे खींचकर निकालने की कोशिश की, पर वह नहीं निकला। घर जाकर माँ से बोले ‘माँ! यह देखो, कैसे नट-बोल्ट की तरह कस गया है।’ देखकर माँ विह्वल हो गई। किसी तरह उस लोहे के नुकीले व लम्बे टुकड़े को निकलवाया। बहुत खून बहा। दो वर्ष तक दर्द रहा। उस समय वह लँगड़ाते हुए चलते थे।

     

    0056.jpgचित्रों में चित्त की झलकियाँ - ऐसा कौन-सा गुण था, जो बालक विद्याधर में वास न करता हो। वे एक कुशल चित्रकार भी थे। ग्यारह-बारह वर्ष की उम्र में ही ये रेखा चित्र बनाने लगे थे। विशेषकर महापुरुषों के चित्र बनाने में उनकी रुचि थी। उन्होंने भगवान् महावीर स्वामी, भगवान् बाहुबली स्वामी, सरस्वती देवी, लक्ष्मी देवी, महात्मा गांधी, स्वामी विवेकानंद, सुभाषचंद्र बोस, झाँसी की रानी, हिरण्यकश्यप, महाराजा शिवाजी, सिपाही, किसान, घुड़सवार, एवं पशुपक्षियों आदि के लगभग ४० चित्र बनाए। चित्र बनाते समय वह राष्ट्रगीत या धार्मिक भजनगुन-गुनाते रहते थे। चित्र बनाने के बाद, उन्हें बड़े सँभालकर रखते थे। उनके द्वारा बनाए गए चित्र आज इस युग की एक महान् धरोहर हैं। शिल्पी का शिल्प उसकी अभिरुचि का परिचायक होता है। और बालक विद्याधर की अभिरुचि से स्पष्ट संकेत हो रहे थे कि वह कोई सामान्य बालक नहीं है। पर मातृत्व की छाँव तले प्रत्येक माँ को अपना बालक अलबेला नज़र आता है। सो उस समय यही समझ कर परिवार उनकी आनंददायी अठखेलियों का आनंद लेता रहा। आज समझ में आ रहा है कि उस ११/१२ वर्ष की इस छोटी सी उम्र में बनाए हुए चित्रों में महापुरुषों, नेताओं अथवा गरीब किसान को ही क्यों चुना गया। भाई, पिता, मित्र, माँ अथवा प्रकृति पर बिखरे अनंत प्रकल्पों में से किसी को भी चुना जा सकता था। चुनाव तो व्यक्तित्व की अभिव्यक्ति का सुलभ साधन है। इसलिए वह चित्र, चित्र न होकर विद्याधर के चित्त (मन) की झलकियाँ थीं।

     

    खुद से सीखी घुड़सवारी - कर्मों को काटने की सामर्थ्य लेकर जन्म लेने वाले बालक की प्रत्येक क्रिया आश्चर्य उत्पन्न करती है। विद्याधर भी ऐसे ही थे। किसी भी कार्य को करने से पूर्व उन्हें सिखाना नहीं पड़ता था। देख लिया और आ गया। घुड़सवारी करना भी उन्होंने देखकर ही सीखी थी। एक व्यक्ति उनके खेत पर घोड़ा लेकर आता था। वह व्यक्ति तो घोड़े के पैर को बाँध कर बिना लगाम के ही उसे खेत में छोड़कर काम पर लग जाता था। विद्याधर निर्भय होकर स्वयं से ही उस घोड़े पर बैठ जाते। घोड़ा भी विद्याधर को बैठाकर हिनहिनाता तक नहीं था, गिराना तो दूर की बात है। जब उन्हें बैठना आ गया, तब वह उस व्यक्ति से घोड़े के पैर खुलवाकर दौड़ाने लगे। घोड़े में लगाम नहीं लगी थी। अतः विद्याधर उसकी गर्दन के बालों के सहारे उसे दौड़ाते रहते थे। धीरे-धीरे उन्हें घुड़सवारी करना आने लगी। किसी से सीखनी नहीं पड़ी उस समय वह १३/१४ वर्ष के होंगे।

     

    खेल महारथी - विद्याधर की रुचि उस समय के प्रचलित प्रायः सभी खेलों में थी। गिल्ली-डण्डा, कंचा, सूरफलंग, वॉलीबॉल, खो-खो, कबड्डी, कैरम, शतरंज, बेडमिंटन आदि खेल खेला करते थे। जब वह आठ-नौं वर्ष के थे। तब वह ‘सूरफलंग' नामक खेल खेलते थे। इस खेल में सारे बच्चे पेड़ पर चढ़ जाते, मात्र एक बच्चा जमीन पर गोला बनाकर उसके बीचों-बीच एक लकड़ी गाड़ देता था। पेड़ से सारे बच्चे नीचे उतरते, उस लकड़ी को छूते, भागकर पुनः पेड़ पर चढ़ जाते। नीचे वाला बच्चा उनको पकड़ता, जो भी पकड़ा जाता, वह हार जाता। फिर उसे नीचे रहना पड़ता था। यह खेल विद्याधर सदलगा में गुफा के चारों ओर जहाँ वट वृक्ष लगे हैं, वहाँ खेलते थे। उनकी लटकती हुई जड़ों को पकड़कर उतरते-चढ़ते थे।

     

    जब थोड़े बड़े हुए, तो कैरम, शतरंज खेल खेलने लगे। शतरंज में तो जैसे उन्हें महारथ हासिल हो गई थी। यदि कभी कोई चाल हार जाए तो अकेले बैठकर उन चालों पर विचार करते, फिर दोबारा जीतकर ही मानते थे। बड़ों को भी हरा देते थे। एक बार ऐसा ही हुआ, एक व्यक्ति ने शतरंज के श्रेष्ठ खिलाड़ी लोकप्पाजी से कहा, विद्याधर भी शतरंज में श्रेष्ठ है। एक बार उनके साथ आप खेलें। यहाँ विद्याधर के मित्रों ने भी विद्याधर से कहा कि श्रेष्ठी लोकप्पाजी के साथ एक बार शतरंज खेलो। एक वृद्ध, तो दूसरा बालक। अतः दोनों जन संकोच कर रहे थे। पर सबके कहने पर दोनों तैयार हो जाते हैं।

     

    मित्रों ने कहा- ‘खेल देखने का हमें क्या मिलेगा।’ श्रेष्ठी लोकप्पाजी ने कहा- ‘जो जीतेगा वह सबको फल खिलाएगा।’ जब खेल प्रारंभ हुआ तो दूसरी पारी में ही श्रेष्ठी ने घोड़े का पाशा उठाकर यथास्थान रखा, तो तिरछी गति जानकर विद्याधर द्वारा राजा को बंदी बना लिया गया। विद्याधर जीत गए। मित्रों ने विद्याधर को कंधों पर बैठाकर घुमाया। विद्याधर ने श्रेष्ठी लोकप्पाजी के पैर छुए। उन्होंने विद्याधर को गले लगा लिया एवं सबको फल खिलाए। आज यही विद्याधर मोक्षमार्ग के खेल में कर्मों को मात दे रहे हैं। कर्मों को मात देने वाली त्याग-तपस्या रूप उनकी चाल अनोखी ही रहती है। फिर भी वह किसी भी प्रकार से अहंकार या दिखावा नहीं करते हैं।

     

    विद्याधर का मुँजीबंधन - दक्षिण भारत की परंपरा के अनुसार ८ वर्ष से लेकर विवाह के पूर्व तक की उम्र वाले बच्चों को एक विशेष संस्कार से संस्कारित किया जाता है। उसे ‘मुँजीबंधन’ कहते हैं। इस संस्कार में व्रत-नियम के प्रतीक के रूप में जनेऊ (यज्ञोपवीत) धारण कराया जाता है। इसकी विधि में बाल कटाते, चोटी रखते, सफेद धोती-दुपट्टा पहनते, विधि-विधान पूर्वक जनेऊ धारण करते, पाँच घरों से भिक्षाटन करके भुना हुआ धान्य लाते हैं। जो धान्य प्राप्त होता है। शाम को मात्र वही खाते हैं, इसके पूर्व दिन भर कुछ नहीं खाया जाता। यह परंपरा हिन्दू एवं जैन सभी में समान रूप से प्रचलित है। दक्षिण में मुँजीबंधन का विशेष महत्त्व है। इस संस्कार को करवाए बिना यदि किसी का मरण हो गया, तो फिर वहाँ की परंपरा के अनुसार उसकी शवयात्रा अर्थी रूप में न निकलकर झोली रूप में निकलती है।

     

    विद्याधर लगभग १२ वर्ष के होंगे। तब आचार्य श्री देशभूषणजी महाराज का प्रथम चातुर्मास सदलगा में हुआ था। विद्याधर अपनी सेवाभाविता एवं धार्मिक रुचि के कारण आचार्य श्री देशभूषणजी के विशेष स्नेह भाजन बन गए थे। समाज ने आचार्य महाराज के सान्निध्य में ‘मुँजीबंधन' कार्यक्रम को रखा। उत्साही विद्याधर भी तैयार हो गए। उन्होंने अन्नाजी से पूछा, पर अन्नाजी ने इन्हें मना कर दिया। विद्याधर दुःखी हो गए। कार्यक्रम का विशेष दिन होने से विद्याधर अन्नाजी द्वारा पूर्व से ही लाकर रखे हुए तीन लरों वाले सोने के जनेऊ को शौक रूप में धारण कर मंदिरजी में अनमने मन से पहुँच गए। वहाँ पर संचालक महोदय ने घोषणा की -‘जो भी बच्चे ‘मुँजीबंधन' करवाना चाहते हैं, वे सामने आकर अग्रिम पंक्ति में बैठ जाएँ।' अब तो विद्याधर स्वयं को नहीं रोक पाए। और आगे जाकर खड़े हो गए। आचार्य महाराज के लाड़ले विद्याधर, प्रथम पात्र के रूप में चुन लिए गए। और आचार्य महाराज ने अपने करकमलों से सम्यग्दर्शन, सम्यग्ज्ञान एवं सम्यक्चारित्र के प्रतीक के रूप में तीन लरों वाले सोने के जनेऊ से विद्याधर पर ‘मुँजीबंधन' संस्कार किया। यह देख अन्नाजी मन ही मन हँस दिए। वे बुदबुदाए, मैं तो जानता था, संस्कारों के इस कार्यक्रम में यह पीछे न रहेगा। विद्याधर के जीवन में आरंभ हो गई गुरु हस्तकमलों से संस्कार पाने की श्रृंखला।

     

    0059 - Copy.jpgमंदिरजी में ध्यान लगाना -  विद्याधर जब ९ वर्ष के थे, तभी से ध्यान करने लगे थे। वह अकेले कल-बसदि (छोटा जैन मंदिर) चले जाते थे। वहाँ जाकर प्रतिदिन शाम को | ध्यान किया करते थे। १४/१५ वर्ष की उम्र में वह दोड्डु-बसदि (बड़ा जैन पंचायती मंदिर) में जाकर ध्यान लगाने लगे थे। कभी-कभी तो वह अपने मित्र मारुति के साथ कल-बसदि के पीछे दो बजे रात तक ध्यानविद्याधर के बचपन की ध्यानस्थली, कल-बसदि (छोटा जैन मंदिर) के पीछे का भाग सामायिक करते रहते थे। कभी खड़े होकर, तो कभी बैठकर, मारुति को तो कभी-कभी उबासी (जंभाई) आने लग जाती थी। पर विद्याधर को कभी भी उबासी (जंभाई) नहीं आती थी अर्थात् आलस नहीं आता था।

     

    एक बार तो वह टीले वाले मंदिर (कल-बसदि) के पीछे दो बजे रात तक अकेले ही ध्यान करते रहे। फिर जब टेंट टॉकीज की फिल्म छूटी तब लोगों के पीछे-पीछे घर पहुँचे थे, क्योंकि रात में उन्हें कुत्तों के भौंकने से डर लगता था। घर का ताला लगाकर जाते थे। जब से ध्यान की साधना बढ़ने लगी, तब से घर पर ज्यादा बातचीत करना भी बंद कर दिया था।

     

    0059.jpgबावड़ी में ध्यान लगाना - आज से ६०/६५ वर्ष पूर्व सदलगावासियों को जल लाने नदी पर जाना पड़ता था। विद्याधर भी ९ वर्ष की उम्र से ही ताँबे का घड़ा लेकर नदी जाने लगे थे। और नदी में जहाँ पानी कम होता, वहाँ पर उसी घड़े को उल्टा करके तैरने की कोशिश भी करते थे। कुछ ही दिनों में वह स्वयं से ही तैरना सीख गए। लगभग ११ वर्ष की उम्र में तो वह ज्वार के डंठलों का बंडल अपनी पीठ पर बाँधकर घर के पास वाली बावड़ी में छलांग लगाने लगे थे। १२-१३ वर्ष की उम्र तक तैराकी में इतने निपुण हो गए कि बिना किसी भी सहारे के “ॐ नमः सिद्धेभ्यः” बोलते हुए बावड़ी में छलांग लगा देते थे। कुछ देर जल के अंदर रहकर फिर पानी के ऊपर आसमान की ओर मुख किए हुए, पद्मासन लगाए।

     

    बिल्कुल सीधे निश्चेष्ट ध्यान मुद्रा में दिखाई देते थे। शुरू-शुरू में वह पाँच-दस मिनट ही ऐसा करते थे। धीरे-धीरे अभ्यास इतना बढ़ गया कि आधा-आधा, पौन-पौन घंटे तक जलीय सतह पर ध्यान मग्न रहने लगे। इतने लम्बे समय तक सूखे पत्ते की भाँति जलीय सतह पर अकंप/स्थिर तैरता हुआ देखकर ग्रामवासियों को आश्चर्य के साथ-साथ भय भी होने लगता था। अतः वे जाकर माँ श्रीमंतीजी से कह देते। माँ को चिंता हो जाती। और अपने पीलू को बावड़ी पर बार-बार जाने से वे मना करतीं। तब वह माँ से बोलते- ‘माँ! मैं वहाँ तैरने नहीं, ध्यान लगाने जाता हूँ।' पर माँ को विश्वास नहीं होता। उस समय तक नहीं जानती थी माँ कि हमारे घर-आँगन में जन्मा यह बालक कोई साधारण पुरुष नहीं है।

     

    साधुसेवा में तत्पर - सदलगावासियों को दिगंबर साधु-संतों का समागम मिलता रहता था। आचार्य श्री देशभूषणजी महाराज ससंघ, आचार्य श्री अंनतकीर्तिजी महाराज ससंघ, मुनि श्री महाबलजी महाराज, मुनि श्री सुबलसागरजी महाराज, मुनि श्री पिहितास्रवजी महाराज, मुनि श्री पायसागरजी महाराज का ससंघ प्रवास सदलगा में होता रहा।

     

    विद्याधर साधु-संतों की सेवा, उनके आहार आदि की व्यवस्था में सदैव तत्पर रहते थे। माँ चौका लगातीं तो चौके में बावड़ी से पानी लाकर देते। माँ के साथ काम करवाते, पड़गाहन, पूजन एवं आहार आदि सभी कार्य बड़े ही सावधानी पूर्वक एवं उत्साह से करते थे। जब आचार्य श्री देशभूषण -जी महाराज का वर्षायोग सदलगा में प्रथम बार हुआ, तब विद्याधर की उम्र लगभग १२ वर्ष की होगी। इस वर्षायोग में वह प्रतिदिन आचार्यश्रीजी को आहार करवाने गए। संघ में किसी साधु के अस्वस्थ होने पर उनकी वैय्यावृत्ति के लिए आचार्यश्रीजी विद्याधर को बोलते थे। विद्याधर के ऊपर उनका विशेष वात्सल्य था। विद्याधर को वैराग्य मार्ग पर बढ़ने के लिए वह प्रोत्साहित करते थे। इसी चातुर्मास से ही विद्याधर ने प्रत्येक अष्टमी-चतुर्दशी का व्रत करना शुरू कर दिया था।

     

    सहस्रनाम कंठस्थ करना - जब विद्याधर सातवीं-आठवीं कक्षा में पढ़ते थे, तब अन्नाजी महावीर भैया एवं विद्याधर को सहस्रनाम पढाते थे। वह जितना पढ़ाते जाते, विद्याधर उतना कंठस्थ करते जाते थे। इस तरह बचपन में ही उन्होंने सहस्रनाम भी पढ़ लिया था।
     

    संवेदनशील विद्याधर - विद्याधर परिवार के प्रति बहुत ही संवेदनशील थे। घर में कोई भी बीमार हो जाए, विद्याधर दु:खी हो जाते और सबसे ज्यादा सेवा करते थे। एक बार छोटे भाई अनंतनाथ को तीन वर्ष की उम्र में ‘रीकेट्स' रोग हो गया। इस रोग से हाथ-पैर सूखते चले गए एवं पेट बड़ा हो गया। शरीर में हड्डी-हड्डी  दिखने लगीं। बहुत इलाज कराने के बावजूद भी बचने की कोई उम्मीद नज़र नहीं आ रही थी। शरीर विद्रूप दिखने लगा था। परिवार के सभी लोग दुःखी थे। विद्याधर उस समय लगभग १३ वर्ष के रहे होंगे। वह पूरे समय अनंतनाथ की सेवा में लगे रहते थे। तब बाहर खेलने भी नहीं जाते थे। बाद में दूर गाँव के एक वैद्यजी को लाकर दिखाया। उन्होंने औषधि के साथ अनंतनाथ को एक वर्ष तक प्रतिदिन सुबह से १२ बजे तक की धूप में बैठाने को कहा। इससे उनका रोग चला गया। पर चमड़ी काली पड़ गई। उसे देखकर विद्याधर अन्नाजी से बार-बार कहते, कि मेरा भाई कब ठीक होगा ? उसे अच्छे डॉक्टर को दिखाओ न! आज वही अनंतनाथ भैया मुनि श्री योगसागरजी के रूप में

    आचार्यसंघ की शोभा बने हुए हैं।

     

    लिया, लग्न तक का ब्रह्मचर्य व्रत - विद्याधर की बाल्योचित क्रीड़ाओं में वैराग्य की झलकें मिल जाती थीं। एक ओर गिल्लीडण्डा आदि खेल खेलते, वहीं दूसरी ओर खेल-खेल में बावड़ी में, मंदिरजी में ध्यान लगाते। मित्रों के साथ पंचकल्याणक देखने जाते। मित्र मेला में घूमते और विद्याधर सारे दिन पांडाल से बाहर नहीं निकलते। उन्हें देखने वाला भी थक जाए कि इतना छोटा बालक कैसा स्थिरचित्त होकर कब से बैठा है, पर विद्याधर नहीं थकते। नौ वर्ष में चारित्र चक्रवर्ती आचार्य श्री शांतिसागरजी के प्रवचन सुनकर जो वैराग्य का बीज वपन हुआ था, उसका अंकुरण चौदह वर्ष की उम्र में हो जाता है।

     

    सदलगा से लगभग सात किलो मीटर की दूरी पर चाँद शिरडवाड़ नामक ग्राम में क्षुल्लक श्री सूरिसिंहजी महाराज विराजमान थे। विद्याधर अपने मित्र मारुति के साथ क्षुल्लक महाराज के दर्शन करने दीपावली के दिन बुधवार, १९ अक्टूबर, १९६०, अनुराधा नक्षत्र में गए। और वहीं पर दोनों ने क्षुल्लकजी से लग्न तक के लिए ब्रह्मचर्य व्रत ग्रहण कर लिया था।

     

    किशोरावस्था में भव्य जीवन की आहटें

    शौकीन विद्याधर महापुरुषों के विषय में जानना - ‘जब विद्याधर १५ वर्ष के थे, तब वाचनालय में जाकर महापुरुषों की आत्मकथा (बायोग्राफ़ी) की पुस्तकें पढ़ते थे। वह शिवाजी, कित्तूरानी चिन्नम्मा (अंग्रेजों से लड़ने वाली), टीपू सुल्तान (मैसूर टाइगर), गांधीजी, रवीन्द्रनाथ टैगौर, विनोबा भावे, ईश्वरचंद्र विद्यासागर आदि की पुस्तकें पढ़कर उसमें से अच्छी-अच्छी बातें लिखकर लाते थे। आकर अपनी माँ एवं छोटे भाई-बहनों को सुनाते थे। इसके अतिरक्ति पट्टमहादेवी शांतला, दान चिंतमणि, भद्रबाहु चरित्र आदि पढ़कर घर पर उसकी कहानियाँ सुनाते थे। इन विषयों पर मित्रों से घंटों-घंटों चर्चा करते रहते थे। इस तरह आदर्श पुरुषों के आदर्शों को जीवन में उतारकर बन गए आज वे स्वयं एक आदर्श महापुरुष ।

     

    महापुरुषों के भाषण सुनना - महान् व्यक्तियों के भाषण सुनने में उनकी विशेष रुचि रहती थी। एक बार प्रधानमंत्री पण्डित जवाहरलाल नेहरूजी सांगली (महाराष्ट्र) शहर में आए थे। तब वह अपने बड़े भाई एवं मित्रों को लेकर भाषण सुनने गए थे। एक बार निपानी (बेलगाम, कर्नाटक) शहर में आचार्य विनोबा भावेजी आ रहे थे। विद्याधर की इच्छा उनके भाषण सुनने की थी, उन्होंने महावीर भैया से चलने को कहा, पर अन्नाजी ने दोनों को ही जाने से मना कर दिया। विद्याधर दु:खी हो गए। तब महावीर भैया ने पाँच रुपये देते हुए कहा, अपने मित्रों के साथ चले जाओ। विद्याधर ने जब मित्रों से कहा, तब वह बोले- ‘एक शर्त पर जाएँगे। तुम भाषण सुनना और हम लोग जैमिनी सर्कस देखेंगे।' विद्याधर तैयार हो गए। भाषण सुनकर बड़े प्रसन्न हुए। जो कुछ भी विनोबा भावेजी बोले थे, उसे आकर पूरा का पूरा महावीर भैया को सुनाया और सुनाते समय उनकी बातों का समर्थन भी करते जाते थे। विनोबाजी गरीबों के लिए कितना अच्छा कार्य कर रहे हैं। इससे देश का हित होगा और गरीबों को अभयदान मिलेगा।

     

    विनोबाजी के भाषण को सुनकर विद्याधर के परिणाम और भी उज्ज्वल हो गए थे। मित्रों से उनके बारे में प्रशंसा करते और कहते- “देखो! देश की सेवा एवं गरीबों की सेवा के लिए विनोबाजी ने सर्वस्व त्याग कर दिया। हमें भी ऐसा ही करना चाहिए। कभी-कभी महापुरुषों को याद करते हुए कहते - ‘देखो! उन्होंने कैसे पुरुषार्थ किए होंगे और अपने जीवन को कैसे सार्थक कर लिया। हमारे हाथ से ऐसा पुरुषार्थ होगा क्या ?' इस प्रकार के विचार वह अपने जीवन के बारे में किया करते थे।

     

    चलचित्र देखना - विद्याधर को ऐसे कार्य करना पसंद थे, जिससे उन्हें शिक्षा या प्रेरणा मिलती थी। कथाकहानियों के प्रति उनकी रुचि बचपन से थी। अन्नाजी बच्चों को धार्मिक कहानियाँ सुनाते रहते थे। एक बार तो विद्याधर अपने मित्रों के साथ साइकिल से २१ किलोमीटर दूर स्थित चिक्कोड़ी ग्राम फ़िल्म देखने गए थे। वहाँ पर पाण्डालनुमा प्रभात टॉकीज (थियेटर) आती थी। पहली बार- ‘झनन-झनन पायल बाजे' और दूसरी बार 'नागिन' फ़िल्म देखी थी, एवं एक बार मेला में ‘देवता' फ़िल्म देखी थी। उनकी गुणग्राही दृष्टि थी। जब स्वाध्याय कराते या मित्रों के साथ चर्चा करते उस समय फ़िल्म से मिली शिक्षा को उदाहरण बनाकर प्रस्तुत कर देते थे। उसे सुनकर मित्रों को आश्चर्य होता था।

     

    दुनिया के विषय में जानना - विद्याधर को रेडियो चलाने का बड़ा शौक था। उस समय रेडियो का प्रचलन नया-नया ही हुआ था। अन्नाजी खरीदकर लाए थे। उसमें वह मराठी समाचार एवं कहानी, संवाद सुना करते थे। आकाशवाणी, ऑल इण्डिया रेडियो तथा बी.बी.सी. लंदन स्टेशन के समाचार वे प्रायः सुनते थे। दुनिया के विषय में जानने की जिज्ञासा उन्हें बनी रहती थी।

     

    साहसिक कार्यों का अनुकरण करना - साहस से भरा जो भी काम होता उसे करने में विद्याधर को अच्छा लगता था। विद्याधर मित्रों के साथ सर्कस देखने जाते थे। वहाँ से आकर सर्कस के समान साइकिल चलाने की कोशिश करते थे, तो धीरे-धीरे संतुलन बन जाता था। एक बार जैसा सर्कस में देखा था, वैसे ही साइकिल चला रहे थे। संतुलन बिगड़ा और गिर गए। घुटने में अधिक चोट आ गई। पंद्रह दिन लग गए ठीक होने में।

     

    माँ का हाथ बँटाना - माँ के साथ रसोई में हाथ बँटाना उन्हें अच्छा लगता था। तीज-त्यौहार पर मिठाई-पकवान भी वह माँ के साथ बनवाते थे।

     

    0063.jpgमूंगफली खाना उन्हें पसंद था शिक्षा, हाई स्कूल तक - विद्याधर की कक्षा सातवीं तक की शिक्षा तो सदलगा ग्राम में हुई। छटवीं-सातवीं कक्षा के विद्यार्थियों की व्यवस्था पूर्व की कक्षा के विद्यार्थियों से पृथक् थी। विद्यार्थियों का रात्रि विश्राम स्कूल में ही होता था। सभी विद्यार्थी अपने-अपने घर से ओढ़ने बिछाने के लिए चद्दर, चटाई एवं पढ़ने के लिए लालटेन ले जाते थे। सबके स्थान नियत थे। सुबह चार बजे घंटी बजती थी। सभी छात्र उठकर मुँह-हाथ धोकर पढ़ने बैठ जाते थे। छः बजे अपने-अपने घर चले जाते थे। और आठ बजे तैयार होकर नाश्ता आदि करके वापस विद्यालय पहुँच जाते थे। लगभग ग्यारह बजे तक कक्षा चलती, फिर मध्याह्न का भोजन करने घर चले जाते थे। दो बजे पुनः स्कूल पहुँचते।फिर शाम पाँच बजे घर आकर भोजन वगैरह करके रात्रि आठ बजे पुनः स्कूल पहुँच जाते। रात्रि आठ से दस बजे तक शिक्षक पढाते थे। फिर शिक्षक घर चले जाते थे। और विद्यार्थी वहीं विद्यालय में ही शयन (सोते) करते थे। इस प्रकार गुरुकुल सदृशी व्यवस्था थी।

     

    सातवीं कक्षा में बोर्ड परीक्षा होती थी। बोर्ड परीक्षा के लिए सदलगा से २१ किलोमीटर की दूरी पर स्थित चिक्कोड़ी तहसील के कन्नड़ राजकीय विद्यालय जाना पड़ता था। और परीक्षा के लिए सात दिन तक विद्यार्थियों को वहीं ठहरना होता था।

     

    आठवीं और नवमी की शिक्षा सदलगा से ५ किलोमीटर की दूरी पर श्री लट्टे एजूकेशन सोसाइटी, बेड़कीहाळ के ‘बी.एस. हाईस्कूल में हुई। महावीर भैया, मारुति और विद्याधर ये साइकिल से बेड़कीहाळ जाते थे। महावीर भैया को साइकिल के आगे वाले डण्डे पर बैठाकर विद्याधर ले जाते थे। विद्याधर ने नवमी कक्षा तक ही पढ़ाई की। अन्नाजी के पूछने पर कि क्यों नहीं पढ़ना, तो विद्याधर बोले ‘मुझे लौकिक नहीं, अलौकिक पढ़ना है। स्कूल की पढ़ाई से आत्मा का कल्याण नहीं हो सकता।’ सन् १९५८ में विद्याधर ने ‘दक्षिण भारत हिंदी प्रचार सभा कर्नाटक शाखा कार्यालय के अंतर्गत ‘मद्रास’ की हिंदी प्राथमिक प्रायवेट परीक्षा भी पास की थी।

     

    तत्त्वार्थसूत्र कंठस्थ करना - एक दिन विद्याधर मित्रों के साथ गिल्ली-डंडा खेल रहे थे। गिल्ली अचानक से एक गुफा के सामने जा गिरी। गुफा में श्री महाबल नाम के मुनि महाराज विराजमान थे। विद्याधर गिल्ली उठाकर आने लगे। तब उनकी दृष्टि मुनि महाराज पर पड़ी। उसने महाराज को नमोऽस्तु किया। महाराज ने उन्हें अपने पास बुलाया, नाम पूछा। ‘विद्याधर’ ने जब अपना नाम बताया तो मुनिराज बोले- ‘कौन-कौन-सी विद्याएँ हैं, तुम्हारे पास ? कुछ धर्म का भी आता है ? या बस खेलते ही रहते हो ?' विद्या ने हाथ जोड़कर कहा- ‘जी, जी हाँ। भक्तामर आता है। महाराजजी ने कहा- ‘अच्छा, अब तत्त्वार्थसूत्र एवं सहस्त्रनाम कंठस्थ करके सुनाना।' विद्याधर ने स्वीकृति में सर हिला दिया। और चरण छूकर, गिल्ली उठाकर वापस आ गए।

     

    विद्याधर ने घर आकर अन्नाजी को यह घटना बताई। उन्होंने विद्याधर को उच्चारण करना सिखाया। विद्याधर ने सात-आठ दिन में श्री महाबल महाराज जी को ‘तत्त्वार्थसूत्र’ कंठस्थ करके सुना दिया। महाराजजी को बड़ा आश्चर्य हुआ। खुश हो विद्याधर के सिर पर पिच्छी रखकर बार-बार आशीर्वाद दिया, और विद्याधर के कंधे के ऊपर हाथ रखकर बोले- ‘तू अच्छा विद्वान् बनेगा। तू बड़ा बनेगा।’  विद्याधर को तत्त्वार्थसूत्र ऐसा कंठस्थ रहा कि जब वह आचार्य श्री ज्ञानसागरजी के चरणों में  पहुँचे, तब दशलक्षण पर्व के अवसर पर उन्होंने विद्याधर से ‘तत्त्वार्थसूत्र’ का पाठ करने को कहा। विद्याधर ने बिना पुस्तक उठाए, वहीं के वहीं बैठ कर पाठ बोलना शुरू कर दिया। आचार्य श्री ज्ञानसागरजी परेशान थे कि इसने पुस्तक नहीं उठाई, अब बीच में पुस्तक के लिए उठना पड़ेगा। पर विद्याधर ने जो मौखिक पाठ शुरू किया तो पूर्ण होने पर ही रुके। यह देख आचार्य श्री ज्ञानसागरजी का चित्त आह्लादित हो उठा।

     

    0065.jpg0065.jpgस्वाध्याय करना और कराना - दोड़-वसदि मंदिर में अन्ना साहब' नाम के पण्डितजी वृद्धों को रात्रि में स्वाध्याय कराते थे। वह विद्याधर को भी उसमें बैठा लेते थे। उनका ज्ञान अच्छा था। विद्याधर को अपनी जिज्ञासा का समाधान भी मिल जाता था। अन्नाजी विद्याधर की प्रतिभा एवं रुचि को देखकर, जब कभी बाहर जाते तो अपनी गद्दी पर विद्याधर को बैठा जाते और शास्त्र की अलमारी की चाबी भी उसे सौंप जाते थे। विद्याधर १४/१५ वर्ष की उम्र से ही स्वाध्याय कराने लगे थे। पहले वह चल रहे ग्रंथ‘भरतेश वैभव' एवं 'रत्नाकर शतक' को कन्नड़ में सभी को सुनाते थे। बाद में दस,ग्यारह बजे रात तक ‘मूलाचार' का स्वयं स्वाध्याय करते, फिर घर जाते थे। घर पर भी छोटे भाई-बहनों को धार्मिक विषय पढ़ाते थे।

     

    मधुर कंठी विद्याधर - विद्याधर का स्वर बहुत मधुर था। वह भगवान् के भजन, भक्तामरस्तोत्र, सहस्रनामस्तोत्र, रत्नाकरवर्णी का रत्नाकरशतक, एवं अपराजितेश्वरशतक बड़े ही मधुर-सुरीली आवाज़ में गाते थे। कल-बसदि (मंदिरजी) में भी वह भजन एवं स्तोत्र गायन करते थे, जिसकी प्रशंसा सभी करते थे। इस कारण माँ उन्हें अत्यधिक प्रेम किया करती थी। यह संस्कार उन्हें माँ से प्राप्त हुआ था। माँ को बचपन से ही सुरीली आवाज़ में भजन गाने का शौक था।"

     

    विद्याधर जब ब्रह्मचारी बन गए, तब भी वह मुनि श्री ज्ञानसागरजी महाराज के पास अपनी मीठी आवाज़ में भजन सुनाया करते थे। दादिया (अजमेर) राजस्थान, प्रवास के दौरान तो आहार के बाद वह रोज़ एक नया भजन गाते थे। श्रावकों के निवेदन पर मौन रह जाते, फिर मुनि श्री ज्ञानसागरजी की स्वीकृति पाकर भजन गाते थे। उनके भजन सुनने के लिए बालक, युवा व महिलाएँ सभी मंदिरजी में इकड़े हो जाते थे। उनके द्वारा सुनाए गए भजन में 'गुरुदर्शन महिमा' भजन की कुछ पंक्तियाँ इस प्रकार हैं।

     

    पावन हुए नयना दरश कर तोर।

    हियरारे हरसे ऐसे जैसे लखके चंद चकोर।।

    कुगुरु कुदेव ध्याके बहुत दुःख उठाया।

    छवि वीतराग ने तो शांत रस पिलाया।।

    शांत सुधारस प्याला लगाके एक ठौर।।

    मनुआ रे झूम उठा रे होकर आनंद विभोर।

    पावन हुए नयना दरश कर तोर।।

     

    वृद्ध साधुओं के केशलोंच करना - विद्याधर ने १६ वर्ष की उम्र में सन् १९६२ के लगभग सदलगा ग्राम में विराजमान वृद्ध मुनि श्री नेमिसागरजी के तीन-चार श्रावकों के साथ मिलकर बारी-बारी से प्रथम बार केशलोंच करने का सौभाग्य प्राप्त किया था। एक बार सन् १९६३ सदलगा में ही वृद्ध मुनि श्री महाबलजी के भी केशलोंच करने का उन्हें अवसर प्राप्त हुआ था। ये वही मुनि श्री महाबलजी महाराज थे, जिनकी प्रेरणा से विद्याधर ने बचपन में ‘तत्त्वार्थसूत्र' कंठस्थ किया था।

     

    सल्लेखना देखना एवं करवाना - मुनि श्री आदिसागरजी (भोजगाँव) एवं मुनि श्री मल्लिसागरजी की समाधि बेड़कीहाळ नामक गाँव में हुई थी। विद्याधर अपने मित्र मारुति के साथ इन दोनों ही समाधियों को देखने गए थे। जहाँ भी सल्लेखना होने की सुनते, वे वहीं पहुँच जाते थे। सदलगा से ६ किलोमीटर दूरी पर स्थित बोरगाँव में वृद्ध मुनि श्री नेमिसागरजी ने सल्लेखना ग्रहण की थी। इस सूचना को सुनकर विद्याधर, मारुति को लेकर बोरगाँव पहुँच गए। उस समय वे लगभग १५-१६ वर्ष के होंगे। २४ घंटे मुनि महाराज के पास रहते। उनके पैर सहलाते, मंत्र सुनाते । खूब मन लगाकर सेवा करते। अंतिम क्षण तक विद्याधर मंत्र सुनाते रहे। जब तक उनकी समाधि नहीं हो गई, तब तक लगभग सात दिन तक वहीं ठहरे रहे। सदलगा की उसी गुफा में जहाँ पर श्री महाबल मुनिराज ने उन्हें ‘तत्त्वार्थसूत्र' कंठस्थ करने की प्रेरणा दी थी, वहीं पर उन्हीं महाराज की सल्लेखना देखने का भी अवसर प्राप्त हुआ।

     

    0067.jpg

     

    मुनिश्री की समाधि देखकर विद्याधर का मन और भी विरक्त हो गया था। इसके बाद ही बोरगाँव ग्राम में मुनि श्री नेमिसागरजी की समाधि स्थली एवं श्री आदिनाथ मंदिरजी की वेदी विद्याधर, मारुति एवं जिनगौड़ा तीनों मित्रों ने मिलकर अंतिम निर्णय कर लिया था कि अब घर पर नहीं रहना है। आचार्य श्री देशभूषणजी महाराज के पास जाना है।

     

    'अनंत व्रत' से अनंतसुख की ओर - कर्नाटक में 'अनंतव्रत' करने की धार्मिक परंपरा है। वसीयत की भाँति अनंतकाल तक यह व्रत । पीढ़ी-दर-पीढ़ी परिवार में चलता जाता है। इस व्रत का कभी उद्यापन नहीं होता है। इस कारण इस व्रत को ‘अनंत व्रत' कहा जाता है। भाद्रपद शुक्ल त्रयोदशी दशलक्षण पर्व के जिन दिनों में ‘रत्नत्रय व्रत' रखा जाता, उन्हीं तीन दिनों में यह व्रत किया जाता है। अपनी शक्ति अनुसार उपवास या एकासन करते हैं। इस व्रत की पूजन-अनुष्ठान की विधि पाँच-छह घंटे में पण्डितजी द्वारा सम्पन्न कराई जाती है। यदि व्रत करने वाला व्यक्ति बीमार आदि हो जाए, तब परिवार के दूसरे सदस्य इस व्रत को रख लेते हैं। एक बार अन्नाजी का स्वास्थ्य खराब हो जाने पर विद्याधर ने इस व्रत को करने में उत्साह दिखाया। माँ का आशीर्वाद प्राप्त कर उन्होंने यह व्रत रखा। जब प्रथम दिन पूजन करके विद्याधर घर लौटे, तब महावीर भैया ने कहा- तुम थक गए होगे, कल से मैं चला जाऊँगा।' विद्याधर बोले-‘थकने की बात ही कहाँ ? वहाँ तो बहुत अच्छा लगता है। मैंने शुरू किया है, तो मैं ही पूर्ण करूंगा । इस तरह अनंत सुख की प्राप्ति की भावना से ‘अनंत व्रत' की कुल परंपरा का निर्वाह भी बड़े हर्ष एवं उत्साह से किया विद्याधरजी ने।

     

    0068.jpgसंस्कारी विद्याधर - पूर्व एवं इस जन्म के प्राप्त संस्कारों से भविष्य के महापुरुष के व्यक्तित्व का निर्माण एवं विकास हो रहा था। जीवन के विकास क्रम में विभिन्न प्रसंगों पर विद्याधर की सोच, उनकी क्रियाएँ, उनके संस्कारी एवं धार्मिक होने का प्रमाण पत्र होती थीं

    • परिवार का वातावरण मर्यादित एवं संयमित था। विद्याधर आदि सभी भाई-बहन एक बड़े कक्ष में सोते थे। जो चौथी-पाँचवी कक्षा में आ जाते थे, वे अलग कक्ष में सोने लगते थे। प्रातः उठकर सभी बच्चे माता पिता को प्रणाम करते थे। तीज, त्यौहार के दिनों में चरण स्पर्श करते थे।
    • घर पर बच्चों को सिखाया जाता कि वाक्य पूर्ण बोलना चाहिए। जैसे- जाता हैं, ऐसा नहीं बोलते, बल्कि ‘मैं जाता हूँ,' ऐसा बोलना चाहिए। अधूरा, अप्रिय, अर्थहीन एवं अस्पष्ट वाक्य नहीं बोलना चाहिए। संस्कारों का प्रभाव ही कहें, माता-पिता के चरण स्पर्श करते हुए विद्याधर कि आज विद्याधर बड़े से बड़े ग्रंथों के गूढार्थों को सहज ही स्पष्ट अर्थ करने में समर्थ हैं।
    • बचपन में घर पर सिखाया गया था कि यदि किसी को अपना पैर लग जाए, तो तुरंत पैर छू लेना, क्षमा याचना कर लेना। मृदु एवं विनम्र बनकर रहना। नीचे जमीन पर देखकर चलना ताकि जीव जन्तु न मरें एवं स्व व पर को ठोकर भी न लगे। यह बीज ऐसा विकसित हुआ कि आज उनकी दृष्टि सदा-सदा ही नीची रहती है।
    • एक दिन विद्याधर माँ से बोले- ‘माँ शिवकुमार के पिता ने कार खरीदी है। माँ ने  पूछा- “तो...ऽऽ'। विद्याधर बोले- ‘तो क्या माँ, उनसे कार लेकर हम लोग शिखरजी चलेंगे।

      सभी मित्र मिलकर जब मेला जाते तब विद्याधर सलाह देते, ‘देखो यदि भीड़ में खो जाएँ, तो चिन्ता नहीं करना। इस मंदिरजी के पास आकर खड़े हो जाना। जाते समय सब यहीं मिल जाएँगें ।' मेला में इकट्टे होने के लिए उन्होंने मंदिर को चुना। कोई होटल, दुकान या नाटकनौटंकी वाला स्थान भी तो चुन सकते थे।

    • विद्याधर ने लगभग १२ वर्ष की उम्र से दशलक्षण पर्व में एकाशन करना शुरू कर दिए थे। जब तक घर में रहे, तब तक तो किए ही, फिर आगे छोड़ने का प्रश्न ही नहीं रहा।

    • वह मेले से कभी ‘आचार्य श्री शांतिसागरजी' की फोटो लाते, कभी मांगूर (पंचकल्याणक) से शास्त्र खरीद कर ले आते, तो कभी सुंदर-सी 0069.jpgएक डिब्बी लाते और माँ से कहते-‘इसे रख लो, जब तीर्थ वंदना पर चलेंगे तो घी रखने के काम आएगी।' एक दिन तो ‘अरिहंत जिन' की मूर्ति खरीद कर ले आए, बोले- ‘लो माँ, मैं आपके लिए भगवान् लाया हूँ।मेलों-ठेलों में हजारों तरह की वस्तुएँ मिल रही होती हैं। पर विद्याधर का मन अपने स्वभाव के अनुरूप वस्तु का चुनाव कर लेता है। 

     

    सामुद्रिक चिह्न से चिह्नित, महापुरुषत्व - विद्याधर के अनेक मित्रों में से एक हैं, शिवकुमार। वह कक्षा एक से विद्याधर के मित्र थे। विद्याधर शिवकुमार के घर शतरंज या कैरम खेलने जाते थे। शिवकुमार प्रत्येक बार हार जाते थे। एक बार कैरम के खेल में जब वह हार गए, तब विद्याधर का हाथ पकड़कर उसे देखते हुए बोले- ‘ज़रा देखें तो हाथ में ऐसा क्या है, जो हर बार जीत जाता है। हँसी-हँसी में हाथ देखने लगे। शिवकुमार को हाथ की अनामिका में त्रिशूल के आकार का एक चिह्न नज़र आया। वह हिन्दू धर्मावलम्बी हैं। बोले- ‘इसके हाथ में तो भगवान् शिव के त्रिशूल का चिह्न है। तभी यह हमेशा जीतता ही जीतता है।' उन्होंने एक दिन विद्याधर की उस अँगुली में स्याही लगाकर सफेद कागज़ पर अंकित करके देखा। कागज़ पर भी वह चिह्न अंकित हो गया-एक, तीन पंखुड़ी वाले कमल के जैसा आकार, जिसे शिवकुमार त्रिशूल' का चिह्न कहते थे। फिर उन्होंने विद्याधर के घर पर भी सबको बताया। महावीर भैया आदि सभी ने भी कई बार कागज़ पर अंकित कराकर के देखा और आनंद लिया। इस चिह्न  को देखकर, और विद्याधर की गतिविधियों को देखकर शिवकुमार की धारणा बन गई थी कि यह कोई महान् आदमी बनेंगे। बात-बात में जब कभी वह कह भी देते थे। जब विद्याधर की दीक्षा का समाचार सदलगा में फैला । उसको सुनकर वह घर आए और मल्लप्पाजी के पास बैठकर रोने लगे। बोले- ‘मैं कहता था न कि वह महान् बनेगा। पर मैं तो सोचता था कि वह नेता बनेगा, गाँधीजी जैसा। यह तो संन्यासी बन गया। उन सबसे भी ऊँचा, बड़ा महान् नेता, मोक्षमार्ग का नेता । मुझे उनके साथ कैरम, शतरंज खेलने का सौभाग्य मिला।' 

     

    यौवन की दहलीज़ पर वैराग्य ने दी दस्तक सबका प्रिय विद्याधर

     

    सबका प्रिय विद्याधर - विद्याधर सबका प्रिय था। घर हो या बाहर, रिश्तेदार हो या शिक्षक, विद्वान् हो या सामान्य सबका चहेता। हम उम्र हो या बड़े सभी से मित्रता। मारुति जो उम्र में बड़े थे, वह उनके बाल सखा थे। इसके अलावा शिवकुमार, हालप्पनवर, जिनगौड़ा, अण्णासाब खोत, पुण्डलीक पूतनाड़े आदि भी उनके मित्र थे।

     

    व्यवस्थित कार्य शैली - विद्याधर की कार्यशैली शुरू से ही व्यवस्थित थी। घर पर बच्चों को बारी-बारी से सफ़ाई करनी होती थी। वह कभी-भी जी नहीं चुराते थे। आठ वर्ष की उम्र से ही वह अपने कार्य स्वयं करने लगे थे। जैसे अण्डरवियर-बनियान धोना, कपड़ों पर प्रेस करना आदि। अपनी सूत की चटाई जिस पर वह सोते थे, उस पर अपना नाम लिख रखा था। चादर पर भी अलग पहचान बनाकर रखी थी।

     

    आज्ञापालक विद्याधर - विद्याधर माता-पिता की आज्ञा को प्राय:कर टालते ही नहीं थे। एक बार अन्नाजी ने सभी बच्चों से कहा- ‘कोई भी पढ़ाई के  बीच से उठकर नहीं जाएगा।' थोड़े ही देर में बाहर सड़क पर बैंड-बाजे निकलने लगे। सभी बच्चे उठ-उठकर देखने चले गए। पर विद्याधर एकाग्र चित्त हो पढ़ाई में ही लगे रहे। माँ की आज्ञा तो वह कभी भी नहीं टालते थे। माँ के कहने पर ज्वार पिसाने जाना, साग-सब्ज़ी लाना, भैंसों के लिए नदी पर नहलाने ले जाना, उन्हें भूसा डालना, उनके स्थान की साफ़-सफ़ाई करना एवं उनको बाँधना-छोड़ना आदि सब काम करते थे।

     

    अहिंसा के लहलहाते सागर - विद्याधर केअंदर दया-करुणा का सागर बचपन से लहलहा रहा था। वह घर पर मच्छर भगाने के लिए धुआँ नहीं करने देते थे। खटमल मारने की दवा नहीं छिड़कने देते थे। कहते- ‘इससे हिंसा होगी, पाप लगेगा, वो भी तो जीना चाहते हैं।' घर के भाई-बहन यदि कहें कि वो भी तो अपने को काटते हैं, तब कहते- “हम लोग उससे मरेंगे नहीं।' इस तरह खेत में भी फ़सल की रक्षा के लिए पाउडर आदि का छिड़काव नहीं करने देते थे। वे कहते थे, ‘पाप लगता है, ऐसी खेती क्यों करना ? केवल गन्ना की खेती करना चाहिए।' एक बार अन्नाजी ने विद्याधर को खेत पर भेजा उस समय फ़सल में एक प्रकार का कीड़ा लग गया था। फ़सल की सुरक्षा के लिए किसानों को दवा डालकर उन्हें मारना पड़ता था। विद्याधर ने कीड़ों को मारने की बजाए, उन्हें मिट्टी में दबा दिया। उन पर धूल डाल दी। जिससे वे मरें नहीं। बाजू वाले किसान ने यह सब अन्नाजी को बता दिया। इसके बाद से अन्नाजी ने विद्याधर को खेत पर भेजना ही बंद कर दिया।

     

    दयालु विद्याधर - दया तो विद्याधर में कूट-कूट कर भरी थी। चाहे वो पशु हो अथवा मानव। एक बार किसान खेत में हल जोत रहे थे। दस-पंद्रह फीट भूमि जुतना शेष रह गई थी। एक बैल थक कर बैठ गया। किसान उसे मार कर उठाने लगे। विद्याधर का हृदय द्रवीभूत हो उठा वह बोले- ‘उसे मत मारो' वह थक गया है। और जुए से उस बैल को निकालकर उसके स्थान पर स्वयं लगकर खेत को जोत देते हैं। इसी तरह एक दिन महावीर भैया ने उन्हें खेत पर भेजा। वह थोड़ी देर बैठ कर वापस आ गए। शाम को महावीर भैया ने पूछा- ‘खेत पर गए थे, क्या देखा ?' बोले-‘मज़दूर काम कर रहे थे। उन्होंने पूछा‘कितने लोग थे ?' बोले- ‘१२ थे।' पुनः पूछा- ‘कितनी महिलाएँ, कितने पुरुष थे ?' तो बोले- ‘मुझे नहीं मालूम।' महावीर भैया ने कहा- ‘उनको अलग-अलग मज़दूरी देनी पड़ती है ना।' विद्याधर बोले‘काम तो सभी बराबर करते हैं, तो मज़दूरी भी सभी को बराबर देनी चाहिए।' इस पर महावीर भैया को गुस्सा आ गया । सो विद्याधर मौन होकर बाहर निकल गए। वह कभी जवाब नहीं देते थे।

     

    दुःखी जीवों को सदा बचाऊँगा - एक बार विद्याधर ने बचपन में घर के एक कोने में चूहे का एक बड़ा-सा बिल देखा। उसमें नवजात चूहे का बच्चा तड़प रहा था। उसके शरीर में लाल चीटियाँ काट रही थीं। देखते ही विद्याधर ने शिशु चूहे को अपने हाथों में उठा लिया और एक-एक करके चीटियों को फेंक से उड़ा दिया। वह शिशु चूहा बच गया। उसी समय माँ ने देखा और पूछा- ‘क्या कर रहे हो ?' विद्याधर ने माँ को सब बता दिया। तब माँ बोली- ‘यह ‘तिर्यंच गति' दुःख की गति है, इस प्रकार से तिर्यंच जीव संसार में सदा दुःख उठाते हैं। दुःखी जीवों पर दया करना अच्छी बात है, किन्तु शिक्षा भी लेना चाहिए तथा ऐसी गति में जाने से बचना चाहिए।' विद्याधर ने माँ से कहा- मैं सदा दुःखी जीवों को बचाऊँगा और ऐसे कोई कार्य नहीं करूँगा, जिससे तिर्यंच गति में जाना पड़े' तथा उस शिशु चूहे को ऊँचे स्थान पर रख दिया, जिससे अन्य जीव उसे पीड़ा न पहुँचा पाएँ।

     

    सांकेतिक अंतिम उपहार - यथा माँ तथा बेटा।‘माँ कम और मीठा बोलती एवं मधुर गाती थीं।' विद्याधर भी तो ऐसे ही थे। माँ के प्रति उनका विशेष लगाव था। एक बार सांगली गए, तो माँ के लिए छापेदार सफ़ेद साड़ी लाए और बोले- ‘देखो माँ! यह सफ़ेद साड़ी आपके लिए, मुनिराजों को आहार देने के लिए लाया हूँ। इन उपहारों के पीछे छुपे राज़ को न समझ पाई माँ और बेटा माँ की ममता को अपना संपूर्ण आदर-सम्मान, अनुराग एवं प्रेम सब कुछ उपहारों के माध्यम से समर्पित कर निकल जाता है, ऐसे पथ पर जहाँ से पुनः जन्म न हो। किसी दूसरी माँ को रुलाना न पड़े। विद्याधर का ‘सफ़ेद साड़ी' वाला यह अंतिम उपहार संकेत दे रहा था कि माँ पूर्ण धवल वस्त्र धारण कर आत्मा को धवल बना लो और माँ ने वही किया। उन्होंने भी आर्यिका के व्रत धारण कर लिए।

     

    पावन भई सदलगा भूमि - पवित्र पावन भूमियों से घिरी सदलगा भूमि उस समय पावन हो गई, जब स्वर्ग से च्युत होकर आचार्य श्री विद्यासागरजी के जीव ने माँ श्रीमंतीजी की कोख में जन्म लिया। जहाँ पर बचपन बीता। जहाँ की धूल में धूसरित होकर व्यक्तित्व के विकास का क्रम शुरू हुआ। उछलते-कूदते कदम, चहलकदमी करता मन, निर्णय करता हुआ जीवन, वैराग्य पथ पर रखने वाला त्याग रूप वह साहसी कदम। इन सबका साक्षी बनने का सौभाग्य पाया था सदलगा ग्राम ने। तभी तो आज वह भूमि विश्व में ‘कल्याणोदय तीर्थ' के रूप में जानी एवं पहचानी जा रही है।कर्नाटक प्रांत, जिला बेलगाम (वर्तमान में 'बेलगावी'), तहसील चिक्कोड़ी में स्थित ‘सदलगा एक छोटा-सा ग्राम है। महाराष्ट्र और कर्नाटक प्रांत की सीमा पर बसा हुआ है।‘दूधगंगा' नामक नदी के द्वारा दोनों प्रांतों का विभाजन हुआ है। यह नदी सदलगा ग्राम के मध्य से बहती है। सदलगा से १५ किलोमीटर की दूरी पर आचार्य श्री शांतिसागरजी महाराज की जन्म भूमि ‘भोज ग्राम' है, तथा १९ किलोमीटर की दूरी पर आचार्य श्री देशभूषणजी महाराज की जन्मस्थली ‘कोथली ग्राम' है, जो आज वह ‘शांतिगिरि' के नाम से प्रसिद्ध है। २५ किलोमीटर पर अतिशय क्षेत्र ‘स्तवनिधि' एवं ३० किलोमीटर पर अतिशय क्षेत्र ‘कुम्भोज बाहुबली' है। और ३० किलोमीटर की दूरी पर ‘अक्किवाट (अकिवाट) ग्राम है, जहाँ मुनि श्री विद्यासागरजी की समाधिस्थली बनी हुई है। लगभग किलोमीटर की दूरी पर ‘कुण्डल' तीर्थ क्षेत्र है। और २२५ किलोमीटर की दूरी पर मुनि श्री कुलभूषणजी, मुनि श्री देशभूषणजी महाराजों की निर्वाणस्थली ‘कुंथलगिरि' बनी हुई है। इस तरह यह ‘सदलगा' ग्राम पहले से ही पवित्र भूमियों से घिरा हुआ था। और आज वर्तमान के युग प्रवर्तक आचार्य को अपने गोद में धारण कर तीर्थस्थली' बन गया है।

     

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     0074.jpg0075.jpgउपसंहार

    अष्टगे' वंश के वंशज ने आज तीर्थंकरों के वंश को देदीप्यमान करने वाले पूर्वाचार्यों की परंपरा में श्रमणत्व को अंगीकार कर न केवल अपने को, अपितु सारे परिवार को धन्य कर दिया। सौभाग्यशाली हैं पिता श्री ‘मल्लप्पाजी, जिनके संरक्षण में पले-बड़े हुए उन्हीं के कुलदीपक कहे जाने वाले पुत्र, आज सम्यक्त्व रूपी पिता के संरक्षण में आचार्य श्री ज्ञानसागरजी महाराज के ‘विशाल गुरुकुल' का संचालन कर रहे हैं। क्या कहें- ‘माँ श्रीमंतीजी' के पुण्य की बलिहारी जो उनकी गोद में बालक्रीड़ा करने वाले आज क्षमारूपी माँ की छाँव में रहकर महान् परीषहजयी साधक बन गए हैं। भाई महावीर, गाँव की गलियों में हूँढ़ते हुए जिनका पीछा करते थे, वही आज उनके पीछे (पद चिह्नों पर) चलने के लिए आतुर हैं। खेल-खेल में भाई अनंतनाथ, शांतिनाथ और मित्र मारुति को पराजित करने वाले आज सत्यरूपी मित्र और गुणरूपी सहोदरों के साथ कर्मों को पराजित कर रहे हैं। धन्य है! बहन शांता-सुवर्णा की राखी, जो ऐसे हाथ पर बँधी कि वही हाथ आज अहिंसा रूपी बहन से दया की राखी बँधवाकर प्राणी मात्र को अभय दे रहे हैं। बचपन की पाठशाला में डाले गए संस्कारों के बीज चाहे वह परिवार द्वारा रोपित हुए हों अथवा आचार्य श्री ज्ञानसागरजी के विश्वविद्यालय द्वारा प्रत्यारोपित। उन बीजों के लिए विद्याधर रूपी भूमि ऐसी उपजाऊ रही कि प्रत्येक बीज लहलहाती फ़सल बन गई। इसका एक भी बीज (टर्रा/निष्फल) न रहा। और तैयार हो गया जिनशासन का आचार्य श्री विद्यासागरजी रूपी खेत, जिसे पाकर जैन संस्कृति गौरवान्वित हो रही है।

     

    मेरा परिचय वही दे सकता है जो मेरे भीतर डूब जाए,

    मैं जहाँ बैठा हूँ वहाँ तक पहुँच जाए,

    आपकी दृष्टि वहीं तक पहुँच पाती है जहाँ मैं नहीं हूँ।

    मेरा सही परिचय तो यही है कि मैं चैतन्य पुंज आत्मा हूँ।

     जो इस भौतिक शरीर में बैठा हूँ।

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