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मेरे गुरुवर... आचार्य श्री विद्यासागर जी महाराज
  • 67. जन्मदाता : चोरों के

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    अरे संसार को नरक में पटकने वाले, पाप के माप दण्डों! ठहरो ठहरो मरो या हमारा समर्थन करो, किसी को उतारने वाले नहीं हो तुम, सुनते हों या नहीं अरे बहरो! सुनो ! सुनो !............. जरा सुनो !

     

    "अब धन-संग्रह नहीं,

    जन-संग्रह करों!

    और

    लोभ के वशीभूत हो

    अंधाधुन्ध संकलित का

    समुचित वितरण करो

    अन्यथा

    धनहीनों में

    चोरी के भाव जागते हैं, जागे हैं|" (पृ. 468)

     

    लोभ के कारण तुमने दिन-रात एक करके धन संग्रह किया है, उसका सही-सही पात्र अनुसार दान करो। अब धन का संग्रह नहीं किन्तु लोगों के मन को अपना बनाने का पुरुषार्थ करो क्योंकि मात्र धन जोड़ने से, समुचित वितरण न करने से धन-हीनों के मन में उस धन को चुराने के भाव पैदा होते हैं इसीलिए चोर इतने दोषी नहीं जितने की चोरों को पैदा करने वाले। चोरी मत करो, चोरी मत करो यह कहना मात्र ऊपरी नाटक है तुम्हारा, तुम स्वयं चोर हो और चोरों को जन्म देने वाले भी-

     

    "सज्जन अपने दोषों को

    कभी छुपाते नहीं,

    छुपाने का भाव भी नहीं लाते मन में

    प्रत्युत उद्घाटित करते हैं उन्हें।" (पृ. 468)

     

    जो सज्जन पुरुष होते हैं, वे कभी भी अपने दोषों -अवगुणों को छुपाते नहीं, न ही छुपाने का भाव रखते हैं, बल्कि उन्हें सबके सामने प्रकट करते हैं, जिससे वे दूर हो जाएँ।

     

    देखो रावण ने सीता का हरण किया था तब सीता ने रावण को ही दोषी नहीं माना बल्कि यह कहा कि - यदि मैं इतनी रूपवती न होती तो रावण के मन में हरण के दूषित भाव ही उत्पन्न नहीं होते। मेरे ही शुभाशुभ भावों से जो कर्म बंधा उसी का यह परिणाम कि ऐसा रूप-लावण्य मिला और मेरा हरण हुआ ऐसी स्थिति में मात्र रावण को ही अपराधी मानना अपने भविष्य को दुखी बनाना है।


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