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मेरे गुरुवर... आचार्य श्री विद्यासागर जी महाराज
  • (वसन्ततिलका छन्द)

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    (मंगलाचरण)

    देवाधिदेव जिन नायक ने किया है, जो जीव का कथन द्रव्य अजीव का है।

    सौ-सौ सुरेन्द्र झुकते जिनके पदों में, वन्दू सदा विनत हो उनको अहो मैं ॥१॥

     

    भोक्ता स्वदेह परिमाण सुसिद्ध स्वामी, होता स्वभाव वश हो वह ऊर्ध्वगामी।

    कर्ता अमूर्त उपयोगमयी तथा है, सो जीव जीवभर की नव ये कथा है॥२॥

     

    उच्छ्वास स्वाँस बल इन्द्रिय आयु प्यारे, ये चार प्राण जग जीव त्रिकाल धारे।

    संगीत यों गुन-गुना व्यवहार गाता, पै जीव में नियम से चिति प्राण भाता ॥३॥

     

    ज्ञानोपयोग इक दर्शन नाम पाता, यों जीव का द्विविध है उपयोग भाता।

    चक्षु अचक्षु अवधी वर केवलादि, ये चार भेद उस दर्शन के अनादि ॥४॥

     

    मिथ्या, सही मति श्रुतावधि ज्ञान तीनों, कैवल्य ज्ञान मनपर्यय ज्ञान दोनों।

    यों ज्ञान अष्ट विध हैं गुरु हैं बताते, प्रत्यक्ष ज्ञान चहुँ चार परोक्ष भाते ॥५॥

     

    यों चार आठ विध दर्शन-ज्ञानवाला, सामान्य जीव परिलक्षण है निराला।

    ऐसा स्वगीत व्यवहार सुना रहा है, पै शुद्ध ‘ज्ञान दृग' निश्चय गा रहा है ॥६॥

     

    ये पंच पंच वसु दो रस वर्ण स्पर्श, गंधादि जीव गुण को करते न स्पर्श।

    सो जीव निश्चय-तया कि अमूर्त भाता, पै मूर्त बन्ध वश है व्यवहार गाता ॥७॥

     

    आत्मा विशुद्धनय से शुचि धर्म का है, औ व्यावहार वश पुद्गल कर्म का है।

    कर्ता अशुद्धनय से रति भाव का है, चैतन्य के विकृत भाव विभाव का है ॥८॥

     

    रे व्यावहार नय से विधि के फलों को, है भोगता सुख, दुखों जड़ पुद्गलों को।

    आत्मा विशुद्धनय से निज-चेतना को, पै भोगता तुम सुनो जिन-देशना को ॥९॥

     

    विस्तार संकुचन शक्ति-तया शरीरी, छोटा बड़ा तन प्रमाण दिखे विकारी।

    पै छोड़ के समुद्घात दशा हितैषी, है वस्तुतः; सकल जीव असंख्यदेशी ॥१०॥

     

    पृथ्वी जलानल समीर तथा लतायें, एकेन्द्रि जीव सब थावर ये कहायें।

    हैं धारते करण दो त्रय चार पंच, शंखादि जीव त्रस हैं सुख है न रंच ॥११॥

     

    संज्ञी कहाय समना अमना असंज्ञी, पंचेन्द्रि हो द्विविध शेष सभी असंज्ञी।

    एकेन्द्रि जीव सब बादर सूक्ष्म होते, पर्याप्त औ इतर ये दिन-रैन रोते ॥१२॥

     

    है मार्गणा व गुणथान तथा विकारी, होते चतुर्दश चतुर्दश कायधारी।

    गाता अशुद्धनय यों सुन भव्य! प्यारे, पै शुद्ध, शुद्धनय से, जग जीव सारे ॥१३॥

     

    उत्पाद ध्रौव्य व्यय लक्षण से लसे हैं, लोकाग्र में स्थित शिवालय में बसे हैं।

    वे सिद्ध न्यून कुछ अंतिम काय से हैं, निष्कर्म अक्षय सजे गुण आठ से हैं ॥१४॥

     

    आकाश पुद्गल व धर्म अधर्म काल, ये हैं अजीव सुन तू अयि भव्य बाल।

    रूपादि चार गुण पुद्गल में दिखाते, है मूर्त पुद्गल न, शेष अमूर्त भाते ॥१५॥

     

    संस्थान भेद तम स्थूलपना व छाया, औ सूक्ष्मता करम बंधन शब्द माया।

    उद्योत आतप यहाँ जग में दिखाते, पर्याय वे सकल पुद्गल के कहाते ॥१६॥

     

    धर्मास्तिकाय खुद ना चलता चलाता, पै प्राणि पुद्गल चले गति है दिलाता।

    मानो चले न यदि वे न उन्हें चलाता, ज्यों नीर मीन-गति में, गति दान-दाता ॥१७॥

     

    ज्यों जीव पुद्गल रुके स्थिति है दिलाता, होता अधर्म वह है स्थिति दान-दाता।

    मानों चले, नहिं रुके स्थिति दे न भाई, छाया यथा पथिक को स्थिति में सहाई ॥१८॥

     

    जीवादि द्रव्य दल को अवकाश देता, आकाश सो कह रहे जिन आत्म जेता।

    होता वही द्विविध लोक अलोक द्वारा, ऐसा सदा समझ तू जिन शास्त्र सारा ॥१९॥

     

    जीवादि द्रव्य छह ये मिलते जहाँ है, माना गया अमित लोक वही यहाँ है।

    आकाश केवल, अलोक वही कहाता, ऐसा वसन्ततिलका यह छन्द गाता ॥२०॥

     

    जीवादि द्रव्य परिवर्तन रूप न्यारा, औ पारिणाममय लक्षण आदि धारा।

    तू मान काल व्यवहार वही कहाता, पै वर्तनामय सुनिश्चिय काल भाता ॥२१॥

     

    जो एक-एक करके चिर से लसे हैं, जो लोक के प्रति प्रदेशन में बसे हैं।

    कालाणु हैं रतन राशि समान प्यारे, होते असंख्य कहते ऋषि संत सारे ॥२२॥

     

    हैं द्रव्य भेद छह जीव अजीव द्वारा, श्री वीर ने सदुपदेश दिया सुचारा।

    हैं अस्तिकाय इनमें बस पंच न्यारे, पै काल के बिना सुनो अयि भव्य प्यारे ॥२३॥

     

    जीवादि क्योंकि जब हैं इनको इसी से, श्री वीर ‘अस्ति' इस भाँति कहें सदी से।

    औ काय से सब सदैव बहुप्रदेशी, है ‘अस्तिकाय फलत:' समझो हितैषी ॥२४॥

     

    आकाश में अमित जीव व धर्म में हैं, होते असंख्य परदेश अधर्म में हैं।

    है मूर्त संख्य गतसंख्य अनन्त देशी, ना काल काय फलतः इक मात्र देशी ॥२५॥

     

    है मूर्त यद्यपि रहा अणु एक देशी, होता अनेक मिल के अणु नैक देशी।

    तो अस्तिकाय फलतः उपचार से है, सर्वज्ञ यों कह रहे व्यवहार से है॥२६॥

     

    जो पुद्गलाणु जड़ है अविभाज्य न्यारा, आकाश को कि जितना वह घेर डाला।

    माना गया वह प्रदेश यहाँ अकेला, सर्वाणु स्थान यदि ले वह दे सकेगा ॥२७॥

     

    जो पुण्य पाप विधि आस्रव बंध तत्त्व, औ निर्जरा सुखद संवर मोक्ष-तत्त्व।

    ये भी विशेष सब जीव अजीव के हैं, संक्षेप से गुरु उन्हें कह तो रहे हैं ॥२८॥

     

    तो! आत्म के उस निजी परिणाम से जो, हो कर्म आगमन हा! अविलम्ब से वो।

    है भाव आस्रव वही अरु कर्म आना, है द्रव्य आस्रव यही गुरु का बताना ॥२९॥

     

    मिथ्यात्व औ अविरती व प्रमाद-योग, क्रोधादि भावमय आस्रव दुःख योग।

    ये पाँच-पाँच दश पाँच त्रि चार होते, देही इन्हें धर सदैव अपार रोते ॥३०॥

     

    मोहादि कर्म-पन में ढल पुद्गलों का, आता समूह जड़ आतम में जड़ों का।

    हो द्रव्य आस्रव वही बहु-भेद वाला, ऐसा जिनेश कहते सुख वेद शाला ॥३१॥

     

    जो कर्म बन्ध जिस चेतन भाव से हो, है भाव बन्ध वह दूर स्वभाव से हो।

    दोनों मिले जब परस्पर कर्म आत्मा, सो द्रव्यबन्ध जिससे निज धर्म खात्मा ॥३२॥

     

    है बन्ध चार विध है प्रकृति प्रदेशा, औ आनुभाग थिति है कहते जिनेशा।

    ही योग से प्रकृति बंध प्रदेश होते, भाई कषाय वश शेष हमेश होते ॥३३॥

     

    है भाव आस्रव-निरोधन में सहाई, चैतन्य से उदित जो परिणाम भाई।

    सो भाव-संवर सुनिश्चय ने पुकारा, द्रव्यास्रवा रुकत संवर द्रव्य न्यारा ॥३४॥

     

    ये गुप्तियाँ समितियाँ व्रत साधनाएँ, सत्यादि धर्म दश द्वादश भावनाएँ।

    औ जीतना परिषहों सुचरित्र नाना, हैं भाव-संवर सभी गुरु का बताना ॥३५॥

     

    भोगा गया करम का झड़ना सुचारा, कालानुसार तप से निज भाव द्वारा।

    सो भाव, भावमय निश्चित निर्जरा है, औ कर्म का झरण द्रव्य सुनो जरा है॥

    सत् त्याग से विधि-झरे अविपाक सो है, छूटे विधी समय पे सविपाक सो है।

    यों निर्जरा यह नितान्त द्विधा-द्विधा है, प्राप्तव्य मार्ग अविपाक भली सुधा है॥३६॥

     

    जो आत्म भाव सब कर्म विनाश हेतु, सो भाव-मोक्ष सुन ले जिनदास रे तू।

    औ आत्म से पृथक हो जड़ कर्म सारे, सो द्रव्य-मोक्ष मिलता जिन धर्म धारे ॥३७॥

     

    देही शुभाशुभ विकार विभावधारी, है पुण्य-पापमय निश्चय से विकारी।

    होता शुभायु शुभगोत्र सुनाम साता, है पुण्य शेष बस! पाप किसे सुहाता ॥३८॥

     

    रे मोक्ष का सुखद कारण ही वही है, विज्ञान औ चरित दर्शन जो सही है।

    ऐसा कहे कि व्यवहार यथार्थ में तो, रत्नत्रयात्मक निजात्म निजार्थ में हो ॥३९॥

     

    रे! आत्म द्रव्य तज अन्य पदार्थ में वो, ज्ञानादि रत्नत्रय ही न यथार्थ में हो।

    आत्मा रहा इन त्रयात्मक ही स्वतः है, सो मोक्षकारण निजातम ही अतः है॥४०॥

     

    है आत्म रूप वह जीव अजीव श्रद्धा, सम्यक्त्व, किन्तु करता न अभव्य श्रद्धा।

    सम्यक्त्व होय तब ज्ञान सुचारु सच्चा, संमोह संशय विमुक्त सुहाय अच्छा ॥४१॥

     

    संमोह संभ्रम ससंशय हीन प्यारा, कल्यान खान वह ज्ञान प्रमाण प्याला।

    माना गया स्व पर भाव-प्रभाव दर्शी, साकार नैक विधि शाश्वत सौख्यस्पर्शी ॥४२॥

     

    साकार के बिन विशेष किये बिना ही, सामान्य द्रव्य भर का वह मात्र ग्राही।

    है भव्य मान वह दर्शन नाम पाता, ऐसा जिनागम यहाँ अविराम गाता ॥४३॥

     

    हो पूर्व दर्शन जिसे फिर ज्ञान होता, छद्मस्थ दो न युगपत् उपयोग ढोता।

    दो एक साथ उपयोग महाबली को, मेरा उन्हें नमन हो जिन केवली को ॥४४॥

     

    जो त्यागता अशुभ को शुभ को निभाना, मानो उसे हि व्यवहार चरित्रवाना।

    ये गुप्तियाँ समितियाँ व्रत आदि सारे, जाते अवश्य व्यवहार-तया पुकारे ॥४५॥

     

    जो बाह्य भीतर क्रिया भववर्धिनी है, ज्ञानी निरोध उनका करते गुणी हैं।

    वे ही यमी चरित निश्चय धार पाते, ऐसा जिनेश कहते भव-पार जाते ॥४६॥

     

    है मोक्षमार्ग द्वय को अनिवार्य पाता, सद्ध्यान लीन मुनि वो निजकार्य धाता।

    भाई अतः यतन से शुचि भाव से रे, अभ्यास ध्यान निज का कर चाव से रे ॥४७॥

     

    हो चित्त को अचल मेरु अहो बनाना, हो चाहते सहज ध्यान सदा लगाना।

    अच्छे बुरे सुखद दु:खद वस्तुओं में, ना मोह द्वेष रति राग करो जड़ों में ॥४८॥

     

    पैंतीस सोलह छ पाँच व चार दो एक, जो शब्द वाचक रहे परमेष्ठियों के।

    या अन्य भी पद मिले गुरु-देशना से, ध्यावो उन्हें तुम जपो शुचि चेतना से ॥४९॥

     

    जो घाति कर्म दल को जड़ से मिटाया, संपूर्ण ज्ञान सुख-दर्शन-वीर्य पाया।

    औ दिव्य देह स्थित है अरहन्त आत्मा, है ध्येय-ध्यान उसका कर अन्तरात्मा ॥५०॥

     

    द्रष्टा व ज्ञायक त्रिलोक अलोक के हैं, आसीन जो शिखर पे त्रयलोक के हैं।

    दुष्टाष्ट कर्म तन वर्जित ध्येय प्यारे, आकार से पुरुष सिद्ध सदैव ध्या! रे ॥५१॥

     

    आचार पंच तप चारित्र वीर्य प्यारा, औ ज्ञान दर्शन जिनागम ने पुकारा।

    आचार में रत स्वयं पर को कराता, आचार्यवर्य मुनि ध्येय वही कहाता ॥५२॥

     

    धर्मोपदेश समयोचित नित्य देते, ज्ञानादि रत्नत्रय में रस पूर्ण लेते।

    होते यतीश उवझाय प्रवीण तातें, हो आपके चरण में हम लीन जातें ॥५३॥

     

    सम्यक्त्व ज्ञान समवेत चरित्र होता, है मोक्षमार्ग वह है सुख को सँजोता।

    जो साधते सतत हैं उसको सुचारा, वे साधु हैं नमन हो उनको हमारा ॥५४॥

     

    कोई पदार्थ मन में सुविचारता है, हो वीतराग मुनि राग विसारता है।

    एकत्व को नियम से वह शीघ्र पाता, संसार में सुखद निश्चय ध्यान ध्याता ॥५५॥

     

    चिन्ता करो न कुछ भी मन से न डोलो, चेष्टा करो न तन से मुख को न खोलो।

    यों योग में गिरि बनो शुभ ध्यान होता, आत्मा निजात्म रत ही वरदान होता ॥५६॥

     

    सद्ज्ञान पा तप महाव्रत धार पाता, वो साधु ध्यान-रथ बैठ स्वधाम जाता।

    सध्यान पूर्ण सधने तुम तो इसी से, ज्ञानादि में निरत हो नित हो रुची से ॥५७॥

     

    मैं ‘नेमिचन्द्र' मुनि हूँ मति मन्दधी हूँ, है ‘द्रव्य संग्रह' लिखा लघु हूँ यमी हूँ।

    विज्ञान कोष गत-दोष सुसाधु नेता, शोधे इसे बस यही मन-अक्ष-जेता ॥५८॥

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