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मेरे गुरुवर... आचार्य श्री विद्यासागर जी महाराज
  • दर्शन पाहुड

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    (वसंततिलका छन्द)

    श्री वर्धमान वृषभादि जिनेश्वरों को, मैं वंदना कर सुजोड़ निजी करों को।

    संक्षेप से सहज दर्शन-मार्ग खोलू, खोलूँ जिनागम रहस्य निजात्म धोलें ॥१॥

     

    जो धर्म मूल वह दर्शन नाम पाया, ऐसा सुशिष्यजन को जिन ने बताया,

    सद्धर्म का श्रवण ध्यान लगा सुनो रे! वे वन्दनीय नहिं दर्शन-हीन कोरे ॥२॥

     

    वे भ्रष्ट हैं पुरुष दर्शन-भ्रष्ट जो हैं, निर्वाण प्राप्त करते न निजात्म को हैं।

    चारित्र भ्रष्ट पुनि चारित पा सिझेंगे, पै भ्रष्ट दर्शनतया न कभी सिझेंगे ॥३॥

     

    जाने अनेक विध आगम को तथापि, आराधना न वरती उनको कदापि।

    सम्यक्त्व-रत्न तज के पर में रमे हैं, वे बार-बार भवकानन में भ्रमे हैं ॥४॥

     

    वे कोटि वर्ष तक भी तपते रहेंगे, घोराति-घोर तप भी करते रहेंगे।

    ना बोधिलाभ उनको मिलता तथापि, सम्यक्त्व से रहित हैं मति मंद-पापी ॥५॥

     

    सम्यक्त्व ज्ञान बल दर्शन वीर्य से हैं, जो वर्धमान, गतमान सदा लसे हैं।

    कालुष्य-पूर्ण-कलिका मल पाप त्यागी, सर्वज्ञ शीघ्र बनते, मुनि-वीतरागी ॥६॥

     

    सम्यक्त्व का झर झरा झरना झरेगा, वो साधु का हृदय शीतल तो करेगा।

    तो नव्य कर्म मन आ न कभी लगेगा, औ पूर्व-लिप्त मन भी धुलता धुलेगा ॥७॥

     

    ये भ्रष्ट मात्र जिन दर्शन भ्रष्ट जो हैं, निम्नोक्त, निम्नतम-भ्रष्ट कनिष्ठ यों हैं।

    धिक्कार ज्ञान-व्रत-भ्रष्ट कुधी कहाते, वे तो स्वयं मिट रहे पर को मिटाते ॥८॥

     

    धारा स्वयं नियम संयम भोग-हारी, मूलोत्तरादि गुण ले तप योग-धारी।

    ऐसे सुधर्मरत को कुछ भ्रष्ट स्वैरी, दोषी सुसिद्ध करते मुनि-धर्म-वैरी ॥९॥

     

    हो मूल नष्ट जिसका, फल फूल दाता, फूले फले न फिर वो द्रुम सूख-जाता।

    त्यों मूल नष्ट जिन दर्शन भ्रष्ट देही, होता न मुक्त भव से न बने विदेही ॥१०॥

     

    ज्यों मूल के वश हि वृक्ष विशाल होता, शाखोपशाख परिवार अपार ढोता।

    त्यों मोक्षमार्ग जिनदर्शन मूल भाता, प्यारा जिनेश-मत है इस भाँति गाता ॥११॥

     

    जो भ्रष्ट दर्शन, सुदर्शनधारियों से, हैं चाहते पद प्रणाम व्रती-जनों से।

    लूले व मूक बनते परलोक में हैं, पाते न बोधि भ्रमते त्रयलोक में हैं ॥१२॥

     

    लो! जानबूझ यदि दर्शन भ्रष्ट को ही, लज्जा प्रलोभ भय से नमता सुयोगी।

    पाता न बोधि जिनलिंग सुधारता भी, जो पाप की विनय है करता वृथा ही ॥१३॥

     

    वाक्काय चित्त पर संयम पूर्ण ढोते, जो अंतरंग-बहिरंग निसंग होते।

    ले शुद्ध अन्न स्थित हो शुचि बोध धारें, सो जैन-दर्शन, सुएषण दोष टारे ॥१४॥

     

    सम्यक्त्व से प्रथम उत्तम बोध होता, सबोध से सब पदार्थ सुशोध होता।

    सत् शोध से पुनि हिताहित ज्ञान होता, सम्यक्त्व मोक्ष-पथ में वर-दान होता ॥१५॥

     

    ज्ञाता बने जब हिताहित के अमानी, मिथ्या कुशील तज शील सुधार ज्ञानी।

    स्वर्गीय वैभव विलास नितान्त पाते, औ अन्त में बन अनन्त, भवान्त जाते ॥१६॥

     

    पीयूष है विषय सौख्य विरेचना है, पीते सुशीघ्र मिटती चिर वेदना है।

    भाई जरा-मरण-रोग विनाशती है, संजीवनी सुखकरी जिनभारती है ॥१७॥

     

    है आद्य लिंग जिन-लिंग असंग भाता, दूजा सुक्षुल्लक व ऐलक का कहाता।

    है आर्यिका पद तृतीय जिनेश गाया, चौथा न लिंग जिनदर्शन में बताया ॥१८॥

     

    पंचास्तिकाय छह-द्रव्य पदार्थ-नौ हो, जीवादि-तत्त्व पुनि सात यथार्थ औ हो।

    श्रद्धान भव्य इन ऊपर है जमाता, मानो उसे तुम सुदृष्टि वही कहाता ॥१९॥

     

    तत्त्वार्थ में रुचि भली भव-सिन्धु सेतु, सम्यक्त्व मान उसको व्यवहार से तू।

    सम्यक्त्व निश्चयतया निज-आतमा ही, ऐसा जिनेश कहते शिवराह-राही ॥२०॥

     

    सोपान जो प्रथम शाश्वत मोक्ष का है, है सार रत्न-त्रय में गुण योग का है।

    सम्यक्त्व रत्न वह है जिनदेव गाते, धारो उसे हृदय में अविलंब तातें ॥२१॥

     

    जो भी बने प्रथम चारित धार लेना, श्रद्धान शेष व्रत पे फिर धार लेना।

    श्रद्धान ईदृश किया उस भव्य में है, सम्यक्त्व यों जिन कहें निज द्रव्य में है॥२२॥

     

    चारित्र ज्ञान सम-दर्शन-लीन, त्यागी, तल्लीन है नियम में तप में विरागी।

    साधू करें सुगुण-गान गुणी-जनों का, वे वन्द्य हैं कथन यों जगदीश्वरों का ॥२३॥

     

    निस्संग नग्न मुनि से चिढ़ता सदा है, मात्सर्य भाव उनसे रखता मुधा है।

    मिथ्यात्व-मंडित वही मतिमूढ़ मोही, स्वैरी रहा नियम संयम का विरोधी ॥२४॥

     

    शीलादि के सदन है मुनि के गुणों के, जो वन्द्य खेचर नरों असुरों सुरों के।

    ऐसे दिगम्बर जिन्हें लख गर्व धारें, सम्यक्त्व से स्खलित वे नर सर्व सारे ॥२५॥

     

    शास्त्रानुसार नहिं केवल वस्त्र त्यागी, वे वन्द्य हैं नहिं असंयत भी सरागी।

    दोनों समान इनमें कुछ भेद ना है, है एक भी नहिं यमी गुरुदेशना है ॥२६॥

     

    ये जात-पाँत कुल भी नहिं वन्द्य होते, ना वन्द्य भी तन रहा, गुण वन्द्य होते।

    कोई रहे श्रमण श्रावक निर्गुणी हैं, वे वन्दनीय नहिं हैं कहते गुणी हैं ॥२७॥

     

    जो धारते श्रमणता तपते तपस्वी, हैं शील ब्रह्मगुण से लसते यशस्वी।

    श्रद्धाभि-भूत वन में शुचि भाव द्वारा, वन्दै सुमुक्ति पथ को मुनि को सुचारा ॥२८॥

     

    कल्याण में जगत के रत सर्वदा हैं, हो के निमित्त हरते जग आपदा है।

    चौंतीस सातिशय चौसठ चामरों से, शोभे जिनेश नित वन्द्य नरामरों से ॥२९॥

     

    सम्यक्त्व ज्ञान तप और चरित्र प्यारे, ये हैं सभी गुण सुसंयम के पुकारें।

    चारों मिलें तब मिले वह मोक्ष प्यारा, ऐसा कहें कि जिनशासन है हमारा ॥३०॥

     

    है ज्ञान सार नर का जग में कहाता, सम्यक्त्व सार नर का सबमें सुहाता।

    सम्यक्त्व से चरित हो वह कार्यकारी, चारित्र से मुकति हो अनिवार्य प्यारी ॥३१॥

     

    आराधना चउ लिए जिन-लिंग धारें, सम्यक्त्व ज्ञान तप चारित पूर्ण पालें।

    संदेह क्या फिर भला मुनि सिद्ध होते, वे पाप पंक फलतः अविलम्ब धोते ॥३२॥

     

    सम्यक्त्व शुद्धतम पा समदृष्टि वाले, कल्याण पंच फलतः विरले संभाले।

    सम्यक्त्व दिव्य मणि है जग-पूज्य तातें, क्या मर्त्य क्या सुर सुसाधु उसे पुजाते ॥३३॥

     

    सम्यक्त्व का सुफल मानव जन्म पाता, पाता सुगोत्र कुल उत्तम सद्य पाता।

    सम्यक्त्व से मनुज हो यह क्या न पाता, है अंत में अमित अक्षय मोक्ष पाता ॥३४॥

     

    चौंतीस सातिशय से लगते विराट, धारें सुलक्षण जिनेश हजार आठ।

    स्वामी विहार करते जबलौं सही है, है स्थावरा शुचिमयी प्रतिमा वही है ॥३५॥

     

    योगी यथाविधि यथाबल कर्म सारे, काटे स्वकीय, तप बारह धर्म धारे।

    निर्वाण प्राप्त करते भव-पार जाते, आते न लौट भव में तन धार पाते ॥३६॥

     

    (दोहा)

     

    मुनिवर की वह नग्नता रत्नत्रय का धाम।

    दर्शन प्राभृत में सही पाता दर्शन नाम ॥१॥

    पूज्य दिगम्बर-पन अतः पूजत पाप पलाय।

    चरित ज्ञान दृग मिलत हैं दर्शन आप सुहाय ॥२॥


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