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मेरे गुरुवर... आचार्य श्री विद्यासागर जी महाराज
  • प्यास

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    पर-पर फूल रहा था

    बार-बार

    तन-रंजन में

    व्यस्त रहा था

    चिर से भूल रहा था

    लोकैषणा की प्यास, आस

    मेरे आस-पास ही  

    घूमती थी,

    जनरंजन में

    व्यस्त रहा था

    क्या तो

    इसका मूल रहा था

    कारण अकारण !

    मनरंजन में

    मस्त रहा था

     

    काल प्रतिकूल रहा था

    भ्रम-विभ्रम से

    भटकता-भटकता

    मोह प्रभंजन में

    त्रस्त रहा था,

    किन्तु आज

    शूल भी फूल रहा है

    सुगंधित महक रहा है

    नीराग-निरंजन में,

    चिर से पला

    कंदर्प-दर्प  

    ध्वस्त रहा है

    यह सब आपकी कृपा है

    हे प्रभो !

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