Jump to content
मेरे गुरुवर... आचार्य श्री विद्यासागर जी महाराज
  • छुवन.......!

       (0 reviews)

    प्रकृति-प्रमदा

    प्रेम वश

    पुरुष से लिपटी

    हरिताभ हँस पड़ी

    प्रणय-कली

    महकी गन्ध भरी

    खुल-खिल पड़ी

    रक्ताभ लस रही

    किन्तु !

     

    पुरुष सचेत है

    वह डूबा नहीं

    प्रकृति जिसमें डूबी है

    पुरुष की आँखों में

    हीराभ - मिश्रित

    नीलाभ बस रही |

     Share


    User Feedback

    Create an account or sign in to leave a review

    You need to be a member in order to leave a review

    Create an account

    Sign up for a new account in our community. It's easy!

    Register a new account

    Sign in

    Already have an account? Sign in here.

    Sign In Now

    There are no reviews to display.


×
×
  • Create New...