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मेरे गुरुवर... आचार्य श्री विद्यासागर जी महाराज
  • परीषहजय शतक

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    (ज्ञानोदय छन्द)

     

    है जिनवर! तव चरण समागम, सुर-सुख शिव-सुख शान्त रहा,

    तव गुणगण का सतत स्मरण ही, परमागम निर्भ्रान्त रहा।

    विषय-रसिक हैं, कुधी रहे हैं, अनुपम-अधिगम नहीं मिले,

    विरहित रति से रहूँ इसी से, बोध-कला उर सही खिले॥१॥

     

    नभ में रवि-सम यतनशील हैं, यति-नायक सुखकारक हैं,

    ज्ञान-भाव से भरित-झील हैं, श्रुतिकारक-दुखहारक हैं।

    सकल विश्व को सकल ज्ञान से, जान रहै शिवशंकर हैं,

    गति-मति-रति से रहित रहे हैं, हम सब उनके किंकर हैं॥२॥

     

    दुख में, सुख में तथा अशुभ-शुभ में नियमित रखते समता,

    शुचितम चेतन को नमते हैं श्रमण, श्रमणता से ममता।

    यम-संयम-दम-शम भावों का लेता सविनय शरण अतः,

    विभाव-भावों दुर्भावों का क्षरण शीघ्र हो, मरण स्वतः॥३॥

     

    मृदुल विषयमय लता जलाती शीतलतम हिमपात वही,

    शान्त शारदा, शरण उसी की ले जीता दिन-रात सही।

    ‘शतक परीषह-जय' कहता बस मुनिजन, बुधजन मन हरसे,

    मूल सहित सब अघ संघर से ज्ञान-मेघ फिर झट बरसे॥४॥

     

     

    उदय असाता का जब होता, उलटी दिखती सुखदा है,

    प्रथम भूमिका में ही होती, क्षुधावेदना दुखदा है।

    समरस-रसिया ऋषि समता से, सब सहता, निज-ज्ञाता है,

    सब का सब यह विधि फल तो है ‘समयसार' सुन! गाता है॥५॥

     

    क्षुधा-परीषह सुधीजनों को देता सद्गति-सम्पद है,

    और मिटाता नियमरूप से दुस्सह विधिफल आपद है।

    कुधीजनों को किन्तु पटकता कुगतिकुण्ड में कष्ट रहा,

    विषय-रसिक हो दुखी जगत है सुखी जगत कह स्पष्ट रहा॥६॥

     

    कनक, कनकपाषाण नियम से, अनल योग से जिस विध है,

    क्षुधा-परीषह सहते बनते, शुचितम मुनिजन उस विध है।

    क्षुधा विजय सो काम विजेता मुनियों से भी वन्दित है,

    शिव-पथ पर पाथेय रहा है जिन-मत से अभिनन्दित है ॥७॥

     

    आगम के अनुकूल किया यदि, किसी साधु ने अनशन है,

    असमय में फिर अशन त्याज्य है, अशन-कथा तक अशरण है।

    वीतराग सर्वज्ञदेव ने, आगम में यों कथन किया,

    श्रवण किया कर सदा उसी का, मनन किया कर, मथन जिया॥८॥

     

    स्वर्णिम, सुरभित, सुभग, सौम्यतन, सुर-पुर में वर सुरसुख है,

    उन्हें शीघ्र से मिलता शुचितम, शाश्वत, भास्वत-शिवसुख है।

    वीतराग-विज्ञान सहित जो, क्षुधा-परीषह सहते हैं,

    दूर पाप से हुए आप हैं, बुधजन जग को कहते हैं ॥९॥

     

    पाप-ताप का कारण तन की, ममता का बस वमन किया,

    शमी-दमी, मतिमान मुनी ने, समता के प्रति नमन किया।

    विमल बोधमय, सुधा चाव से, तथा निरन्तर पीता है,

    उसे तृषा फिर नहीं सताती, सुखमय जीवन जीता है ॥१०॥

     

    कषाय रिपु का शमन किया है, सने स्व-रस में गुणी बने,

    नग्न नीत, भवभीत रीत हो अघ से, तप के धनी बने।

    मुक्ति-रमा आ जिनके सम्मुख, नाच नाचती मुदित हुई,

    मनो इसी से तृषा जल रहीं, ईर्ष्या करती कुपित हुई॥११॥

     

    निरालम्ब हो, स्वावलम्ब हो, जीवन जीते मुनिवर हैं,

    कभी तृषा या अन्य किसी वश, कुपित बनें ना, मतिवर हैं।

    श्वान भौंकते सौ-सौ मिलकर, पीछे-पीछे चलते हैं,

    विचलित कब हो गजदल आगे ललित चाल से चलते हैं॥१२॥

     

    व्यय-उद्भव-ध्रुव-लक्षण से जो, परिलक्षित है खरा रहा,

    चिन्मय गुण से रचा गया है, सम-रस से है भरा रहा।

    मनो कभी मुनि तृषित हुआ हो, निज में तब अवगाहित हो,

    जैसा सागर में शशि होता, निश्चित सुख से भावित हो॥१३॥

     

    रव-रव नरकों में वे नारक, तृषित हुए हैं, व्यथित हुए,

    सदय हृदय नहीं अदय बने हैं, प्राण कण्ठगत मथित हुए।

    उस जीवन से निज जीवन की, तुलना कर मुनि कहते हैं,

    वहाँ सिन्धु-सम दुःख रहा तो, यहाँ बिन्दु हम सहते हैं॥१४॥

     

    शीत-शील का अविरल-अविकल, बहता जब है अनिल महा,

    ऐसा अनुभव जन-जन करते, अमृत मूल्य का अनल रहा।

    पग से शिर तक कपड़ा पहना, कप-कप कपता जगत रहा,

    किन्तु दिगम्बर मुनिपद से नहिं, विचलित हो मुनि-जगत रहा ॥१५॥

     

    तरुण-अरुण की किरणावलि भी, मन्द पड़ी कुछ जान नहीं,

    शिशिर वात से ठिठुर शिथिल हो, भानु उगा पर, भान नहीं।

    तभी निशा वह बड़ी हुई है, लघुतम दिन भी बना तभी,

    पर परवश मुनि नहीं हुआ है, सो मम उर में ठना अभी ॥१६॥

     

    यम-दम-शम-सम से मुनि का मन, अचल हुआ है विमल रहा,

    महातेज हो धधक रहा है, जिसमें तप का अनल महा।

    बाधा क्या फिर बाह्य गात पे, होता हो हिमपात भले,

    जीवन जिनका सुखित हुआ हम, उन पद में प्रणिपात करें॥१७॥

     

    भय लगता है नभ में काले, जल वाले घन डोल रहे,

    बीच-बीच में बिजली तड़की, घुमड़-घुमड़ कर बोल रहे।

    वज्रपात से चूर हो रहै अचल, अचल भी चलित हुए,

    फिर भी निश्चल मुनि रहते हैं, शिव मिलता, सुख फलित हुए॥१८॥

     

    चण्ड रहा मार्तण्ड ग्रीष्म में, विषयी-जन को दुखद रहा,

    आत्मजयी ऋषिवशीजनों को, दुखद नहीं, शिव सुखद रहा।

    प्रखर, प्रखरतर किरण प्रभाकर, की रुचिकर ना कण-कण को,

    कोमल-कोमल कमलदलों को खुला खिलाती क्षण-क्षण को॥१९॥

     

    सरिता, सरवर सारे सूखे, सूरज शासन सक्त रहा,

    सरसिज, जलचर कहाँ रहे फिर?, जीवन साधन लुप्त रहा।

    इतनी गरमी घनी पड़ी पर, करते मुनि प्रतिकार नहीं,

    शान्ति सुधा का पान करें नित, तन के प्रति ममकार नहीं॥२०॥

     

    सुरमा, काजल, गंगा का जल, मलयाचल का चन्दन है,

    शरद चन्द्र की शीतल किरणें मणि माला, मनरंजन है।

    मन में लाते तक ना इनको, शान्त बनाने तन-मन को,

    मुनि कहलाते पून्य हमारे जिनवर कहते भविजन को ॥२१॥

     

    महाप्रतापी, भू-नभ तापी, अभिशापी रवि बना रहा,

    वन हारे, तरु सारे, खारे पत्र फूल के बिना अहा!

    किन्तु पराजित नहीं मुनीश्वर, जित-इन्द्रिय हो राजित हैं,

    हृदय-कमल पर उन्हें बिठाऊँ, त्रिभुवन से आराधित हैं ॥२२॥

     

    तन से, मन से और वचन से, उष्ण परीषह सहते हैं,

    निरीह तन से हो निज ध्याते, बहाव में ना बहते हैं।

    परम तत्त्व का बोध नियम से, पाते यति जयशील रहे,

    उनकी यशगाथा गाने में, निशिदिन यह मन लीन रहे ॥२३॥

     

    विषयों को तो त्याग-पत्र दे, व्रतधर शिवपथगामी हैं,

    मत्कुण मच्छर काट रहे अहि, दया-धर्म के स्वामी हैं।

    कभी किसी प्रतिकूल दशा में, मुनि-मानस नहिं कलुषित हो,

    शुचितम मानस सरवर-सा है, सदा निराकुल विलसित हो ॥२४॥

     

    चराचरों से मैत्री रखते, कभी किसी से वैर नहीं,

    निलय दया के बने हुए हैं, नियमित चलते स्वैर नहीं।

    तन से, मन से और वचन से, करें किसी को व्यथित नहीं,

    सुबुध जनों से पूजित होते, मान-गान से सहित सही॥२५॥

     

    मत्कुण आदिक रुधिर पी रहे, पी लेने दो, जीने दो,

    तव शुभ स्तुत की सुधा चाव से, मुझे पेट भर पीने दो।

    तीन लोक के पूज्य पितामह!, इससे मुझको व्यथा नहीं,

    यथार्थ चेतन पदार्थ मैं हूँ, तन से 'पर' मम कथा यही॥२६॥

     

    दंश मसक ये कीट पतंगे, पल भर भी तो सुखित नहीं,

    पाप पाक से पतित पले हैं, क्षुधा तृषा से दुखित यहीं।

    कब तो इनका भाग्य खुले, कब निशा टले, कब उषा मिले,

    सन्त सदा यों चिंतन करते, दिशा मिले, निज दशा मिले ॥२७॥

     

    निरा, निरापद, निजपद दाता, यही दिगम्बर पद साता,

    पाप-प्रदाता आपद-धाता, शेष सभी पद गुरु गाता।

    हुए दिगम्बर अम्बर तजकर, यही सोच कर मुनिवर हैं,

    शिवपथ पर अविरल चलते हैं, है जिनवर! तव अनुचर हैं ॥२८॥

     

    अपने ऊपर पूर्ण दया कर, विषय-वासना त्याग दिया,

    नग्न परीषह सहते तजकर वस्त्र, निजी में राग किया।

    अनुपम, अव्यय वैभव पाते, लौट नहीं भव में आते,

    वस्त्र, वासना जो ना तजते, भ्रमते भव-भव में तातैं ॥२९॥

     

    यहाँ अचेतन पुद्गल आदिक, निज-निज गुण के केतन हैं,

    आदि मध्य औ अन्त रहित हैं, ज्ञान-निलय हैं, चेतन हैं।

    यथार्थ में तो पदार्थ-दल से, भरा जगत् यह शाश्वत है,

    निरावरण है, निरा दिगम्बर, स्वयं आप 'बस' भास्वत हैं ॥३०॥

     

    बिना घृणा के नग्नरूप धन, मुनिवर प्रमुदित रहते हैं,

    भवदुखहारक, शिवसुखकारक, दुस्सह परिषह सहते हैं।

    लालन-पालन, लाड़-प्यार से, सुत का करती ज्यों जननी,

    कुलदीपक यदि बुझता है तो, रुदन मचाती है गुणिनी ॥३१॥

     

    इन्द्रिय जिनसे चंचल होती, उन विषयों से विरत हुए,

    इन्द्रियविजयी, विजितमना हैं, निशिदिन निज में निरत हुए

    अविरति रति से मौन हुए हैं, अरति परीषह जीत रहें,

    जिनवर वाणी करुणा कर-कर, कहती यों भवभीत रहें ॥३२॥

     

    सड़ा-गला शव मरा पड़ा जो, बिना गड़ा, अधगडा जला,

    भीड़ चील की चीर-चीरकर, जिसे खा रही हिला-हिला।

    दृश्य भयावह लखते-सुनते, गजारिगर्जन मरघट में,

    किन्तु ग्लानि-भय कभी न करते, रहते मुनिवर निज घट में ॥३३॥

     

    विषय-वासना जिनसे बढ़ती, उन शास्त्रों से दूर रहें,

    विराग बढ़ता जिनसे उनको, पढ़े साम्य से पूर रहें।

    विगत काल के भुक्त भोग को, कभी न मन में लाते हैं,

    प्राप्तकाल सब सुधी बिताते, निजी रमन में तातैं हैं ॥३४॥

     

    आगम के अनुकूल साधु हो, अरति परीषह सहते हैं,

    कलुषित मन की भाव-प्रणाली, मिटती गुरुवर कहते हैं।

    प्रतिफल मिलता दृढ़तम, शुचितम, दिव्यदृष्टि झट खुलती है,

    नियमरूप से शिवसुख मिलता, ज्योत्स्ना जगमग जलती है ॥३५॥

     

    विशाल विस्फारित मंजुलतम, चंचल लोचन वाली हो,

    कामदेव के मार्दव मानस, को भी लोभन वाली हो।

    मुख पर ले मुस्कान मन्दतम, गजसम गमनाशीला हो,

    उस प्रमदा के वश मुनि ना हो, अदभुत चिन्मय लीला हो ॥३६॥

     

    सदा मुक्त-उन्मुक्त विचरती, मत्त स्वैरिणी मोहित है,

    तभी कहाती प्रमदा जग में, बुधजन से अनुमोदित है।

    वन में, उपवन में, कानन में, स्मित वदना कुछ बोल रही,

    निर्विकार यति बने रहे वे, उनकी दृग अनमोल रही ॥३७॥

     

    लाल कमल की आभा-सी तन वाली हैं सुर वनिताएँ,

    नील कमल-सम विलसित जिनके, लोचन हैं सुख-सुविधाएँ।

    किन्तु स्वल्प भी विषय-वासना, जगा न सकती मुनि मन में,

    सुखदा, समता, सती, छबीली, क्योंकि निवसती है उनमें ॥३८॥

     

    शीलवती है, रूपवती है, दुर्लभतम है वरण किया,

    समता रमणी से निशिदिन जो, श्रमण बना है रमण किया।

    फिर किस विध वह नश्वर को जो भवदा दुखदा वनिता है,

    कभी भूलकर क्या चाहेगा? पूछ रही यह कविता है ॥३९॥

     

    कठिन कार्य है खरतर तपना, करने उन्नत तपगुण को,

    पूर्ण मिटाने भव के कारण, चंचल मन के अवगुण को।

    दया वधू को मात्र साथ ले, वाहन बिन मुनि पथ चलते,

    आगम को ही आँख बनायें, निर्मद जिनके विधि हिलते ॥४०॥

     

    सभी तरह के पाद त्राण तज, नग्न पाद से ही चलते,

    चलते-चलते थक जाते पर, निज पद में तत्पर रहते।

    कंकर, कंटक चुभते-चुभते, लहुलुहान पद लोहित हो,

    किन्तु यही आश्चर्य रहा है, मुनि का मन ना लोहित हो ॥४१॥

     

    कोमल-कोमल लाल-लालतर, युगल पादतल कमल बने,

    अविरल, अविकल चलते-चलते, सने रुधिर में तरल बने।

    मन में ला सुकुमार कथा को, अशुचि काय में मत रचना,

    मार मार कर महा बनो तुम, यह कहती रसमय रचना ॥४२॥

     

    बोधयान पर बैठ, कर रहे, यात्रा यतिवर यात्री हैं,

    त्याग चुके हैं, भूल चुके हैं, रथवाहन, करपात्री हैं।

    पथ पर चलते तन को केवल, देख रहे पथ दर्शाते,

    सदा रहें जयवन्त सन्त वे, नमूँ उन्हें मन हर्षाते ॥४३॥

     

    आत्मबोध से पूज्य साधु ने, चंचल मन को अचल किया,

    मोह लहर भी शान्त हुई है, मानस सरवर अमल जिया।

    बहुविध दृढ़तम आसन से ही, तन को संयत बना लिया,

    जीव दया का पालन फलतः, किस विध होता जना दिया ॥४४॥

     

    संयम बाधक चरित मोह को, पूर्ण मिटाने लक्ष बना,

    बिना आलसी बने निजी को, पूज्य बनाने दक्ष बना।

    सरिता, सागर, सरवर तट पर, दृढ़तम आसन लगा दिया,

    त्याग वासना, उपासनारत, 'ऋषि की जय' तम भगा दिया ॥४५॥

     

    आसन परिषह का यह निश्चित, अनुपम अदभुत सुफल रहा,

    हुए, हो रहे, होंगे जिनवर, इस बिन, सब तप विफल रहा।

    बुधजन, मुनिजन से पूजित जिन!, अहोरात तव मत गाता,

    अतः आज भी भविकजनों ने, धारा उसको नत माथा ॥४६॥

     

     

    भय लगता है यदि तुझको अब विषयी जन में प्रमुख हुआ,

    यह सुन ले तू चिर से शुचितम निज अनुभव से विमुख हुआ।

    दृढ़तम आसन लगा आप में होता अन्तर्धान वहीं,

    ऋषिवर भी आ उन चरणों में नमन करें गुणगान यही ॥४७॥

     

    श्रुतावलोकन आलोड़न से मुनि का मन जब थक जाता,

    खरतर द्वादशविध तप तपते साथी तन भी रुक जाता।

    आगम के अनुसार निशा में शयन करै श्रम दूर करे,

    फलतः हे जिन! तव सम अतिशय पावे सुख भरपूर खरे ॥४८॥

     

    भू पर अथवा कठिन शिला पर काष्ठ फलक पर या तृण पे,

    शयन रात में अधिक याम तक, दिन में नहिं, संयम तन पे।

    ब्रह्मचर्य व्रत सुदृढ़ बनाने यथाशक्ति यह व्रत धरना,

    जितनिद्रक हो हितचिन्तक हो अतिनिद्रा मुनि मत करना ॥४९॥

     

    मुनि पर यदि उपसर्ग कष्ट हो हृदय शून्य उन मानव से,

    धर्म-भाव से रहित, सहित हैं वैर-भाव से दानव से।

    किन्तु कभी वे निशि में उठकर गमन करें अन्यत्र नहीं,

    अहो अचल दृढ़ हृदय उन्हीं का दर्शन वह सर्वत्र नहीं ॥५०॥

     

    सप्तभयों से रहित हुआ है जितनिद्रक है श्रमण बना,

    शय्या परिषह वही जीतता दमनपना पा शमनपना।

    निद्राविजयी बनना यदि है इच्छित भोजन त्याग करो,

    इन्द्रियविजयी बनो प्रथम तुम रसतज निज में राग करो ॥५१॥

     

    यथासमय जो शयन परीषह तन रति तजकर सहता है,

    निद्रा को ही निद्रा आवे मुनि मन जागृत रहता है।

    समुचित है यह प्रमाद तज रवि उदयाचल पर उग आता,

    पता नहीं कब कहाँ भागकर उडुदल गुप लुपछुप जाता ॥५२॥

     

    असभ्य पापी निर्दय जन वे करते हों उपहास कभी,

    किन्तु न होता मुनि के मन की उज्वलता का नाश कभी।

    तुष्ट न होते समता-धारक सुधीजनों के वन्दन से,

    रुष्ट न होते शिष्ट साधुजन कुधीजनों के निन्दन से ॥५३॥

     

    क्रोध जनक हैं कठोर, कर्कश, कर्ण कटुक कुछ वचन मिले,

    विहार वेला में सुनने को अपने पथ पर श्रमण चले।

    सुनते भी पर बधिर हुए-से आनाकानी कर जाते,

    सहते हैं आक्रोश परीषह अबल, सबल होकर भाते ॥५४॥

     

    इन्द्रियगण से रहित रहा हूँ, मल से रस से रहित रहा,

    रहा इसी से पृथक् वचन से, चेतन बल से सहित रहा।

    निन्दन से फिर हानि नहीं है, विचार करता इस विध है,

    प्रहार करता जड़विधि पे मुनि, निहारता निज बहुविध है ॥५५॥

     

    सही मार्ग से भटक चुके हैं चलते-चलते त्रस्त हुए,

    भील, लुटेरों, मतिमन्दों से घिरे हुए दुखग्रस्त हुए।

    उनको न प्रतीकार तथापि करते यति जयवन्त रहे,

    समता के हैं धनी-गुणी हैं पापों से भयवन्त रहे ॥५६॥

     

    मोह-भाव से किया हुआ था, पाप पाक यह उदित हुआ,

    पर का यह अपराध नहीं है, उपादान खुद घटित हुआ।

    पर का इसमें हाथ रहा हो, निमित्त वह व्यवहार रहा,

    अविरति-हन्ता नियमनियन्ता, कहते जिनमतसार रहा ॥५७॥

     

    काया लाली रही उषा की, अशुचिराशि है लहर रही,

    भवदुखकारण, कारण भ्रम का, शरण नहीं है जहर रही।

    इसका यदि वध हो तो हो, पर इससे मेरा नाश कहाँ?

    बोध-धाम हूँ चरण सदन हूँ, दर्शन का अवकाश यहाँ ॥५८॥

     

    बहुविध विधि का संवर होने में हित निश्चित निहित रहा,

    पापास्रव में कारण होता शिवपथ में वह अहित रहा।

    अन्ध मन्दमति! वधक नहीं ये बाह्यरूप में साधक हैं,

    पाप पुण्य के भेद जानते कहते मुनिगण-चालक हैं ॥५९॥

     

    अशन वसतिकादिक की ऋषिगण नहीं याचना करते हैं,

    तथा कभी भी दीन-हीन बन नहीं पारणा करते हैं।

    निजाधीनता फलतः निश्चित लुटती है यह अनुभव है,

    पराधीनता किसे इष्ट है वही पराभव, भव-भव है ॥६०॥

     

    निज पद गौरव तज यदि यति हो मनो-याचना करते हैं,

    दर्पण सम उज्वल निज पद को पूर्ण कालिमा करते हैं।

    शुचितम शशि भी योग केतु का पाकर ही वह शाम बने,

    यही सोचकर साधु सदा ये निज में ही अविराम तने ॥६१॥

     

    बिना याचना, कर्म उदय से यह घटना निश्चित घटती,

    कभी सफलता, कभी विफलता भेद-भाव बिन बस बटती।

    इसीलिए मत याचक बनना भूल कभी बन भ्रान्त नहीं,

    याचक बनता नहीं जानता कर्मों का सिद्धान्त सही ॥६२॥

     

    यांचा परिषह विजयी वह मुनि-समाज में मुनिराज बने,

    स्वाभिमान से मंडित जिस विध हो वन में मृगराज तने।

    यांचा विरहित यदि ना बनता, जीवन का उपहास हुआ,

    विरत हुआ पर बुध कहते वह, गुरुता का सब नाश हुआ ॥६३॥

     

    अनियत विहार करता फिर भी, निर्बल सा ना दीन बने,

    तथा किया उपवास तथापि, परवश ना! स्वाधीन बने।

    भोजन पाने चर्या करता, पर भोजन यदि नहिं मिलता,

    विषाद करता नहिं पर, भोजन मिला हुआ-सा मुख खिलता ॥६४॥

     

    इष्ट मिष्ट रस-पूरित भोजन, मिलने पर हो मुदित नहीं,

    अनिष्ट नीरस मिलने पर भी, दुखित नहीं हो कुश्चित नहीं।

    सहित रहा संवेग भाव से, सर्व रस से विरत बना,

    चिंतन करता यह सब विधिफल, साधु गुणों से भरित बना ॥६५॥

     

    करते श्रुतमय सुधापान हैं, द्वादशविध तप अशन दमी,

    दमन कर रहे इन्द्रिय तन का, कषायदल का शमन शमी।

    केवल दिखते बाहर से ही, क्षीणकाय हो दुखित रहे,

    भीतर से संगीत सुन रहे, जीत निजी को सुखित रहे ॥६६॥

     

    जनन जरा औ मरण रोग से श्वास-श्वास पर डरता है,

    जिसके चरणों में आकर के नमन विज्ञ दल करता है।

    दुष्कृत फल है दुस्सह भी है महा भयानक रोग हुआ,

    प्रभु पदरत मुनि नहिं डरता है धरता शुचि उपयोग हुआ ॥६७॥

     

    सभी तरह के रोगों से जो मुक्त हुए हैं बता रहे,

    कर्मों के ये फल हैं सारे, खारे जग को सता रहे।

    रोगों का ही मन्दिर तन है अन्दर कितने पता नहीं,

    उदय रोग का, कर्म मिटाता ज्ञानी को कुछ व्यथा नहीं ॥६८॥

     

    सुगन्ध चन्दन तैलादिक से तन का कुछ संस्कार नहीं,

    वसनाभूषण आभरणों से किसी तरह श्रृंगार नहीं।

    फिर भी तन में रोग उगा हो पाप कर्म का उदय हुआ,

    उसे मिटाने प्रासुक औषध मुनि ले सकता सदय हुआ ॥६९॥

     

    रोग परीषह प्रसन्न मन से जो मुनि सहता ध्रुव ज्ञाता,

    सुचिरकाल तक सुरसुख पाता अमिट अमित फिर शिव पाता।

    अधिक कथन से नहीं प्रयोजन मरण भीति का नाश करो,

    सादर परिषह सदा सहो बस! निजी नीति में वास करो ॥७०॥

     

    तृण कंटक पद में वह पीड़ा सतत दे रहे दुखकर हैं,

    गति में अंतर तभी आ रहा रुक-रुक चलते मुनिवर हैं।

    उस दुस्सह वेदन को सहते-सहते रहते शान्त सदा,

    उसी भाँति मैं सहूँ परीषह शक्ति मिले, शिव शान्ति सुधा ॥७१॥

     

    खुले खिले हों डाल-डाल पर फूल यथा वे हँसते हैं,

    जिनकी पराग पीते अलि-दल चुम्बन लेते लसते हैं।

    विषम, विषमतर शूल तृणों से आहत हैं पर तत्पर हैं,

    निज कार्यों में बिना विफल हो कहते हमसे तन पर है ॥७२॥

     

    कठिन-कठिनतर शयनासन में कंटक पथ पर विचरण में,

    सुख ही सुख अवलोकित होता मुनियों के आचरणन में।

    भीतर से बाहर आने को शम सुख सागर मचल रहा,

    दुखित जगत को सुखित बनाने यतन चल रहा सकल रहा ॥७३॥

     

    कभी-कभी आकुलता यदि हो मन में तन में वेदन हो,

    प्रतिफल हो, फल कर्मचेतना चेतन में पर खेद न हो।

    बिना वेदना प्रथम दशा में कर्मों का वह क्षरण नहीं,

    समयसार का गीत रहा यह औ सब बाधक शरण नहीं ॥७४॥

     

    निज भावों से भावित भाता भासुर गुणगण शाला है,

    परिमल पावन पदार्थ प्यारा अनुभवता रस प्याला है।

    फिर यह तन तो स्वभाव से ही मल है मल से प्यार वृथा,

    मुनियों से जो वंदित है सुन! शुद्ध-वस्तु की सार कथा ॥७५॥

     

    स्वभाव से ही रहा घृणास्पद रहा अचेतन यह तन है,

    पल से मल से भरा हुआ है क्यों फिर इसमें चेतन है?

    तन से निशिदिन झरती रहती अशुचि, सुनो जिनश्रुति गाती,

    देह राग से श्रमणों की वह विराग छवि ही क्षति पाती ॥७६॥

     

    तपन-ताप से तप्त हुआ तन स्वेद कणों से रंजित हो,

    रज कण आकर चिपके फलतः स्नान बिना मल संचित हो।

    मल परिषह तब साधु सह रहा सुधा पान वे सतत करें,

    नीरस तरु सम तन है जिनका हम सब का सब दुरित हरें ॥७७॥

     

    कंचन काया बन सकती है ऋद्धि-सिद्धि से युक्त रहा,

    तन का मल मुनि नहीं हटाता मल से तन अतिलिप्त रहा।

    चेतन मैं हूँ, चेतन मैं हूँ यथार्थ मल तो मल में है,

    कहता जाता कमल कमल में कहने भर को जल में है ॥७८॥

     

    अविरत जन या व्रती पुरुष यदि अपने से विपरीत बने,

    आदर ना दे, करे अनादर यदि बनते अविनीत तने।

    किन्तु मुनीश्वर लोकेषण से दूर हुए भवभीत हुए,

    विकास विरहित ललाट उनका रहता वे जग मीत हुए ॥७९॥

     

    अमल, समल हैं सकल जीव ये ऊपर, भीतर से प्यारे,

    अगणित गुणगण से पूरित सब ‘समान’ शीतल शुचि सारे।

    मैं गुरु तू लघु फिर क्या बचता परिभव-परिषह बुध सहते,

    आर्य देव अनिवार्य यही तव मत गहते सुख से रहते ॥८०॥

     

    कभी प्रशंसा करे प्रशंसक विनय समादर यदि करते,

    नहीं मान-मद मन में लाते, मन को कलुषित नहिं करते।

    प्रत्युत अन्दर घुस कर बैठा मान-कर्म के क्षय करने,

    साधु निरंतर जागृत रहते निज को शुचि अतिशय करने ॥८१॥

     

    निरालसी यति समिति गुप्ति में जब हो रत मन शमन करें,

    गणधर आदिक महामना भी उनको मन से नमन करें।

    मानी मुनिजन नमनादिक यदि नहिं करते मत करने दो,

    अर्थ नहीं उसमें, जिन कहते यह परिषह अघ हरने दो ॥८२॥

     

    जिन श्रुत में हैं पूर्ण विशारद सम्मानित हैं बुधगण में,

    भाग्य मानकर सदा शारदा रहती जिनके आनन में।

    मानहीन हैं, स्वार्थहीन हैं दुखी जगत को अमृत पिला,

    परमत तारकदल में शीतलशशि हैं यश की अमिट शिला ॥८३॥

     

    अन्तराय का अन्त नहीं हो अतुल अमिट बल मुदित नहीं,

    जब तक तुममें अनन्त अक्षय पूर्ण ज्ञान हो उदित नहीं।

    ज्ञान क्षेत्र में तब तक निज को लघुतम ही स्वीकार करो,

    तन-मन-वच से ज्ञान-मान का प्रतिपल तुम धिक्कार करो ॥८४॥

     

    अवलोकन-अवलोडून करते जिनश्रुत के अनुवादक हैं,

    वादीजन को स्याद्दवाद  से जीते पथ प्रतिपादक हैं।

    ज्ञान परीषह सहते मुख से कभी न कहते हम ज्ञानी,

    ज्ञान कहाँ है तुममें इतना महा अधम हो अज्ञानी ॥८५॥

     

    नग्न भाव से ज्ञान परीषह जीत-जी रहे मतिवर हैं,

    तत्त्व ज्ञान से मत्त चित्त को किया नियंत्रित यतिवर हैं।

    प्रभु पद में रत हुए मुझे भी होने सन्मति दान करें,

    निलयगुणों के जय हो गुरु की मम गति का अवसान करें ॥८६॥

     

    सहो सदा अज्ञान परीषह नियोग है यह शिव मिलता,

    अल्पज्ञान पर्याप्त रहा यदि निज अनुभवता भव टलता।

    बहुत दिनों का पड़ा हुआ है सुमेरु सम तृण ढेर रहा,

    एक अनल की कणिका से बस! जल मिटता, क्षण देर रहा ॥८७॥

     

    सत्पथ चलता महाव्रती हो प्रचुर समय वह बीत गया,

    इन्द्रिय योगों को वश करके गाता आतम गीत जिया।

    किन्तु अभी तक जगी न मुझमें बोध भानु की किरण कहीं,

    यूँ न सोचता, मुनिवर तजता समता की वह शरण नहीं ॥८८॥

     

    महा मूढ़ है, साधु बना है, शुभकृत जीवन किया नहीं,

    भविकजनों को सदुपदेश दे उपकृत अब तक किया नहीं।

    महा मलिन मति चिर से तेरी ज्ञान-नीर से धुली नहीं,

    सहे वचन यूँ व्यर्थ साधुता अभी आँख तव खुली नहीं ॥८९॥

     

    बच करके अशुभोपयोग से जब शुभ शुचि उपयोग धरूँ,

    अक्षय सुख देने वाले मुनि-गुण-गण का उपभोग करूँ।

    किस विध फिर मैं हो सकता हूँ कुधी, कभी नहिं हो सकता,

    सहता यूँ अज्ञान परीषह मन का मल वह धो सकता ॥९०॥

     

    ज्ञानावरणादिक से चिर से भला-बोध बल मलिन वही,

    सहने से अज्ञान परीषह निश्चित होता विमल सही।

    उड़-उड़कर आ रज-कण चिपके धूमिल फलतः दर्पण हो,

    जल से शुचि हो जिनमत गाता इसे सदा नति अर्पण हो ॥९१॥

     

    चिर से दीक्षित हुआ अभी तक, ऋद्धि नहीं कुछ सिद्धि नहीं,

    तथा गुणों में ज्ञानादिक में लेश मात्र भी वृद्धि नहीं।

    ऐसा मन में विचार कर मुनि उदासता का दास नहीं,

    होकर परवश कभी त्यागता जिनमत का विश्वास नहीं ॥९२॥

     

    जिन शासन से शासित होकर व्रत पालू अविराम सही,

    किन्तु हुआ ना ख्यात जगत में यश फैला ना नाम कहीं।

    रहित रहा हो अतिशय गुण से जिन दर्शन यह लगता है,

    समदर्शन युत मुनि मन में ना ऐसा संशय जगता है ॥९३॥

     

    अल्प मात्र भी ऐहिक सुख औ इन्द्रिय सुख वह मिला नहीं,

    फिर, किस विध निर्वाण अमित सुख मुझे मिलेगा भला कहीं।

    मुनि हो ऐसा कहता नहिं जिन-मत का गौरव नहिं खोता,

    रहा अदर्शन यही परीषह-विजयी होता सुख-जोता॥९४॥

     

    जिन मत की उन्नति में जिनका जीवन तत्पर लसता है,

    उजल सलिल से भरा सरित-सा जिन में दर्शन हँसता है।

    रहा अदर्शन परिषहजय यह प्रमुख रहा मुनि यतियों का,

    उनके चरणों में नित नत हूँ विनशन हो चहुँगतियों का ॥९५॥

     

    पद-पूजन संपद संविद पा पद-पद होते सुखित नहीं,

    निन्दन, आपद, अपयश में फिर साधु कभी हो दुखित नहीं।

    दुस्सह सब परिषह सहने में सक्षम ऋषिवर धीर सभी,

    आत्म ध्यान के पात्र, ध्यान कर पाते हैं भव तीर तभी ॥९६॥

     

    दुष्कर तप से नहीं प्रयोजन संयम से यदि रहित रहा,

    परिषहजय बिन नहीं सफलता यद्यपि व्रत से सहित रहा।

    यम-दम-शम-सम सकल व्यर्थ हैं समदर्शन यदि ना होता,

    पाप पंक से लिपा कलंकित जीवन मौलिक नहिं, थोथा ॥९७॥

     

    शीत परीषह, उष्ण परीषह एक समय में कभी न हों,

    चर्य्या, शय्या तथा निषद्या एक साथ ये सभी न हों।

    ऐसा जिनवर का आगम है हम सबको यह बता रहा,

    अनुभव कहता, स्ववश परीषह सही सही, फिर व्यथा कहाँ ॥९८॥

     

    एक साथ उन्नीस परीषह मुनि जीवन में हो सकते,

    समता से यदि सहो साधु हो विधिमल पल में धो सकते।

    सन्त साधुओं तीर्थंकरों ने सहे परीषह सिद्ध हुए,

    सहूँ निरन्तर उन्नत तप हो समझूँ निज गुण शुद्ध हुए ॥९९॥

     

    पुण्य-पाक है सुरपद संपद सुख की मन में आस नहीं,

    आतम का नित अवलोकन हो दीर्घ काल से प्यास रही।

    तन से, मन से और वचन से तजूँ अविद्या हाला है,

    ‘ज्ञान-सिन्धु’ को मथकर पीऊँ समरस ‘विद्या’, प्याला है ॥१००॥

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