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मेरे गुरुवर... आचार्य श्री विद्यासागर जी महाराज
  • व्रत के पूर्व दी शिक्षा

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    बात 1976 की है, कौन जानता था कि मेरी जन्मभूमि पटेरा नगर में जो छोटे-छोटे क्षुल्लकों के साथ आये हुये हैं, वे विश्व विख्यात दिगम्बराचार्य के रूप में उभरेंगे। तथा मेरे जीवन के निर्माता, मोक्षमार्ग को दिखाने वाले होंगे, लेकिन वह सब भविष्य की गोद में था। पटेरा नगर में ग्रीष्मकालीन वाचना का उन्होंने संकेत किया। छोटे-छोटे क्षुल्लक श्री नियमसागरजी, श्री योगसागर जी, श्री समयसागर जी, को (मेरे भविष्य के गुरु) अध्ययन कराते थे, तब उस वक्त मोक्षमार्ग समझ में आ गया था कि छोटी उम्र में ही यह वेश धारण किया जा सकता है। वर्षों की धारणा थी कि वृद्धावस्था में यह वेश धारण किया जाता है। देखते ही मन में पैदा हुई उलझने सुलझ गई।

     

    उसी वर्ष का प्रसंग है। रविवारीय प्रवचन हो रहा था। सभा में मैं बैठी प्रवचन सुन रही थी। प्रवचन आधा घण्टे तक सुना, कुछ भी समझ में नहीं आया। तभी एक आख्यान गुरुदेव के प्रवचन में आया- कप में पड़ी हुई मक्खी कप से बाहर निकलना चाहती है, लेकिन वह उसी में फडफड़ाती है, अन्त में उसी में मर जाती है। वैसे एक गृहस्थ जब गृहस्थी के जाल में फस जाता है, तो वह निकलना चाहता है, लेकिन निकल नहीं पाता। उसकी दशा उस मक्खी की तरह हो जाती है। ऐसा कोई व्यक्ति इस सभा में बैठा है, जो इस बात को स्वीकारता हो ? बस क्या था, भविष्य में बनने वाले गुरु की आवाज कानों में समा गई। मैं सभा को लाँघती हुई आचार्य श्री के निकट चली गई। मुझे देखते हुये उन्होंने प्रवचन को विराम दे दिया। मुझसे बोले- क्यों ? यहाँ कुछ कहने आई हो ? मैंने साहसपूर्वक कहा- मुझे बाल ब्रह्मचर्यव्रत चाहिये। बोले- व्रत लेकर क्या करोगी ? मैंने कहा- जैनधर्म का अध्ययन करके आर्यिका बनूँगी। अच्छा आर्यिका बनोगी। प्रवचनसभा के लोग वार्ता को सुन रहे थे। अन्त में गुरुदेव कहते हैं- मैं अपना प्रवचन पूरा कर लूँ। वे फिर प्रवचन करने लगे। मैं विशेष सहज-सरल प्रवृत्ति में उनको देख, समझ कर मोक्षमार्ग की सुखानुभूति करने लगी।

     

    प्रवचन पूर्ण हुआ। आचार्य श्री के पास पहुँच कर मैंने नमोऽस्तु किया। बोले- क्या पढ़ रही हो ? मैंने कहा- मेट्रिक की परीक्षा देनी है। किसकी बच्ची हो ? बड़कुल उदयचन्द्र जी की। माँ मामा जी के यहाँ गई हैं। इतनी बात करके मैं आ गई। घर में चौके की तैयारी थी। दूसरे दिन मैं पडगाहन करने खड़ी हुई। आचार्यश्री का मुझे पडगाहन करने का सौभाग्य मिल गया। मैं चौके में काँपती हुई, पीछे खड़ी हो गई। आचार्य श्री ने हल्का सा इशारा किया तो मैं आगे आ गई।

     

    द्रव्य की थाली की ओर इशारा किया, मैं समझ गई कि पूजन करने के लिए कहा जा रहा है। मैंने पूजन में कभी जल के स्थान पर चन्दन चढ़ाया तो कहीं अक्षत के स्थान पर पुष्प चढ़ाया। पर मन लगाकर पूजन करती रही। आचार्य श्री जी मन्द-मन्द मुस्कुराते रहे, कुछ कहा नहीं। आहार पूर्ण हुआ।

     

    मैंने कुर्सी रख दी। कहा- महाराज, बैठ जाइये। मुस्कुराने लगे। मेरे गृहस्थ जीवन के भतीजे से बोले- क्यों ? तुझे क्षुल्लक बनना है? तीन वर्ष में क्षुल्लक बना दूँगा। मैंने कहा- महाराज श्री जिसको न व्रत लेना, न क्षुल्लक बनना, उनको आप कह रहे हैं, और मेरी बात पर तो ध्यान ही नहीं दे रहे। सभी को इशारा करते हुये बोले- देखो यह क्या कह रही है। इतना कहकर मन्दिर की ओर चल पड़े। हम सभी उनके साथ चलने लगे। दो दिन बाद मैं पिताजी को आचार्य श्री के पास दर्शन कराने के लिए ले गयी। आचार्यश्री पटेरा मन्दिर के गर्भालय में विराजमान थे। मैंने नमोऽस्तु किया। फिर बतलाया- महाराज श्री, ये हैं हमारे पिताजी। यह अभी भी बैंगन खाते हैं।

     

    आचार्यश्री मेरी बात को सुनकर बोलते हैं- ये तुम्हारे पिताजी हैं, मुँह पर हाथ की आँगुली रखकर कहते हैं, ऐसा नहीं बोलना पड़ता है। और फिर मुस्कुराते हुए बोले- देखो बड़ों की शिकायत नहीं की जाती। यह प्रथम सबक मुझे उस समय मिला था। दूसरे दिन मैंने पुन: व्रत लेने सम्बन्धी बात की। आचार्य श्री कहते हैं- दृढ़ता रखो। अभी तुम छोटी हो। कुछ समयोपरान्त विहार हो गया।

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