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मेरे गुरुवर... आचार्य श्री विद्यासागर जी महाराज
  • उचित संगीत

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    एक दो दिन के बाद मुझसे कहते– अजमेर वाली है, उसके कमरे में रहना, वे आचार्य ज्ञानसागर जी की शिष्या हैं। साझ के समय अजमेर वाली (कचनबाई) माँ से बोले- इसको अपने साथ रखना, इसका संरक्षण तुम्हें करना है। रत्तीबाई सतना वाली और कमलाबार्ड बामौरा वाली, जिनको आचार्यश्री ने सातवीं प्रतिमाधारी बनाया था। चौका लगाती थीं,उनसे कहा-उस बालिका को तुम दोनों को पढ़ाना है। अच्छे संस्कार डालना। कुछ दिनों बाद बड़कुल गुलाबचन्द्र जी से बोले- क्यों ? तुम कह रहे थे कि मेरी बच्ची और ये दोनों साथ पढ़ती थीं, घनिष्ठ दोस्ती रही है, मेरे पास लाना। मैं उससे कहूँगा कि लौकिक क्षेत्र में तुम दोनों साथ रहीं, पारमार्थिक क्षेत्र में भी अब उसका साथ निभाओ। बड़कुल गुलाबचन्द्र जी बोले- ठीक है महाराज। आखिर योग नहीं बना, बहुत समझाया। इस मार्ग पर चलने का उसने निषेध कर दिया। यह वाक्य रत्तीबाई सतना वाली ने सुना कि आचार्य श्री की भावना है कि इसके साथ कोई दूसरी बालिका हो।

     

    उन्होंने मंजु सतना वाली (वर्तमान में अनन्तमती जी) को समझाया। व्रत के बारे में उससे कहा, मैंने भी समझाया। समझकर वह आचार्यश्री के पास जाकर दो वर्ष का व्रत ले आई। यह कहकर कि मैं घर में रहूँगी। इससे आचार्यश्री की चिन्ता कम नहीं हुई। बार-बार कहतेदूसरा कोई साथी हो जाता तो अच्छा रहता। फिर कमलाबाई बामौरा वाली ने (मेरी पूर्व की भतीजी) सुमन को समझाया, व्रत लेने के बारे में कहा। उसका मन बन गया। आचार्यश्री से जीवन पर्यन्त का व्रत ले लिया। पिच्छिका परिवर्तन के समय पीछी भी ली। हम दो हो गये। आचार्यश्री एक दिन कहते हैं- इन दोनों को मैं तो साथ में नहीं रखेंगा।

     

    बीच में बड़कुल डालचन्द्र जी बोले- आचार्यश्री इन दोनों को डॉ. पन्नालाल साहित्याचार्य (सागर वाले पण्डितजी) के पास भेज देता हूँ। सागर में रहकर अध्ययन करेगी। आचार्य श्री ने कहा- ठीक है। अभी कुछ दिन मैं क्लास लूगा, इसलिए यहीं अध्ययन करेगीं। आचार्य श्री ने चौबीसठाणा, सर्वार्थसिद्धि आदि पढ़ाते थे। चौबीसठाणा पढ़ाने के बाद कहते थे कि जाओ, सभी क्षुल्लक और तुम लोग मिलकर चौबीसठाणा लगाना। लेकिन ध्यान रखना, इधर-उधर की बातें मत करना। गुरु आदेश से चौबीसठाणा व श्रेपन भाव आदि एक दूसरे से पूछते थे। अध्ययन करते थे और सामूहिक प्रतिक्रमण करते थे।

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