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मेरे गुरुवर... आचार्य श्री विद्यासागर जी महाराज
  • माँ का उपकार

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    मेरी माँ ने एक दिन बतलाया था कि जब तुम मेरे गर्भ में थीं उस समय एक आर्यिका जी कुण्डलपुर आयी थीं संघ सहित। मैं उनसे इतनी प्रभावित हुई कि उनके साथ जाने को तैयार हो गई। मुझे मना करतीं कि साथ नहीं रखेंगी। घर के सदस्य भी स्वीकृति नहीं दे रहे थे। अन्त में निर्णय किया कि मैं सफेद साड़ी पहनूँगी। वह भी घर के लोगों ने मंजूर नहीं किया। लेकिन मेरे बार-बार कहने से सफेद साड़ी, जिसमें अन्य रंग को बिन्दी बनी थीं, मन्दिर के लिये पहनने को स्वीकृति मिल पायी। मैं वही साड़ी पहनकर मन्दिर जाती थी। मैंने संकल्प कर लिया था, कि चाहे बेटा हो, चाहे बेटी। उसको मैं मोक्षमार्ग पर लगाऊँगी। तुम हो गई। सो मैंने शुरू से संस्कार डाले व हमेशा धर्मध्यान में तुम्हें लगाया है।

     

    अब मैं स्वयं वह अनुभव करती हूँकि मैं जब चौथी पढ़ती थी तब की मुझे अच्छे से याद है। अगर कभी कुल्फी खरीद कर ले आती, जैसे ही खाने के लिये मुँह में देती, वे कहती- यह गन्दे पानी की बनी है। इस प्रकार कहकर ग्लानि पैदा कराकर हाथ से नीचे गिरवा देती थीं। कभी शकरकन्दशकला उबाले हुये लेकर आयी तो कहती थीं- उसी में मछली चुरती है, उसी में शकरकन्द। मैं तुरन्त ही फेंक देती। कोई भी सामग्री बाजार की बनी नहीं खाने देती थीं। हमेशा इसका ध्यान रखती थी।

     

    दशलक्षण पर्व में कहा करती थी- दो बार खाना, पानी जब कभी पीते रहना। अगर मैं ऐसा करती तो खुश होती थीं और पैसे आदि देकर मुझे इस ओर बढ़ाती थीं। दोनों टाइम मन्दिर का नियम दिया था। स्वाध्याय करवाती। कहती थी- मुझे सुनाओ। कुण्डलपुर भी जब कभी ले जाती। कुल मिलाकर माँ ने जो पूर्व में चाहा होगा वे संस्कार डाले। इसलिये मेरा जीवन वैरागी बन पाया। उन्होंने सदा आलु-प्याज, रात्रिभोजन, अभक्ष्य वस्तुओं का खाने का परहेज करवाया।

     

    जब मैं समझदार हो गई, छठवीं कक्षा पढने लगी, उस समय चातुर्मास करने पूज्य भूपेन्द्रसागर महाराज जी आये थे। उनसे मैंने कुछ नियम माँगा। उन्होंने मुझे बड़ा समाधिमरण और मंगतराय की बड़ी बारहभावना पढ़ने का नियम दिया और कहा- बेटा, इसको सुबह साँझ दोनों समय में से किसी एक टाइम अवश्य पढ़ना। जिससे तुम्हें याद हो जायेगी। मैंने नियम लिया एवं प्रतिदिन पढ़ने लगी। जिससे वैराग्य भरी पंक्तियाँ हमेशा मन में गूँजने लगीं। संसार की वस्तुयें असार नजर आने लगीं। दुनिया में जो भी आया वह एक दिन मर जायेगा। इसमें प्रत्येक सुबह से सांझ तक एक ही क्रियायें होती हैं। नया इसमें कुछ नहीं है। इस दुनिया में नया क्या होगा ? हमेशा विचार चलने लगे। स्कूल से लेकर जहाँ कहीं, जिस क्षेत्र में, मैंने कदम रखा, स्नेह-वात्सल्य भरपूर मिलता रहा। अनुभवी वृति लोग, मेरी पसंद रहे। क्योंकि मैंने एक नीति पढ़ी थी कि साठ वर्ष वाले की संगति करे उसके पास रहे, तो बीस वर्ष वाले का साठ वर्ष का अनुभव हो जायेगा। इस नीति ने मुझे हमेशा बड़े लोगों के पास रहने को मजबूर किया। जवानों की संगति मुझे रास नहीं आयी। स्कूल जाना, सबक करना, सुबह साँझ को श्रावकों का प्रतिक्रमण, आलोचना आदि पढ़ना स्वभाव बन गया था।

     

    कुछ समय बाद, मैंने बड़े बाबा के मन्दिर में एक कोने में बैठकर जिंदगी के बावत् कुछ शंका का समाधान चाहा। प्रथम प्रश्न- व्रतों में सबसे महान व्रत कौन सा है ? आवाज आयी ब्रह्मचर्यव्रत। यह किससे लेना होता है ? गुरु से। मेरे गुरु कौन बनेंगे ? समाधान अवश्य। लेकिन कुछ दिन बाद रहस्य खुल गया। मैं अपनी बड़ी दीदी के पास गई सिहोरा। गर्मी की छुट्टियों में, वहाँ एक पेम्पलेट टंगा था। जिसमें आचार्य विद्यासागर जी, आजू-बाजू में समयसागर, नियमसागर और योगसागर के चित्र बने हुये थे। मेरी दृष्टि छोटे-छोटे क्षुल्लक जी पर रुक गई। अरे ! इस मार्ग पर इतने छोटे भी इस वेश को धारण करते हैं। आचार्य श्री को देखा विश्वास हो गया। बस यही तुम्हारे गुरु बनेंगे। आवाज आयी समाधान मिल गया। मेरी माँ ने भी एक बार कहा था- जब तुम छोटे में कहीं खेल रही थीं, तब एक ज्योतिषी ने तुम्हारा हाथ देखकर कहा था कि यह बच्ची जो विश्वविख्यात गुरु होंगे, उनकी चेली बनेगी। मुझे ख्याल आ गया। सिहोरा नगर से मैं आने को अपनी बहिन से कहने लगी,कि मुझे अब नहीं रहना, मुझे तो पटेरा जाना है। बहुत दिन हो गये। मुझे आचार्य विद्यासागर जी के दर्शन करना, कैसे भी जिद करके वहाँ से आ गई। आते ही घर के लोगों ने भी सुनाया कि बहुत छोटे-छोटे महाराज हैं, वे बच्चों से आहार ले लेते हैं। सुनते ही आहार देने की भावना बन गई।

     

    मैं दूसरे दिन कुण्डलपुर गई, वहाँ मेरी माँ ने चौका लगाया। मुझे भी पड़गाहन करने के लिये खड़ा किया। माँ के चौके के बाजू में डॉ. शिखरचन्द हटा वाले भी पड़गाहन को खड़े हुये थे। आचार्य श्री जी शिखरचन्द्र जी के यहाँ अपनी विधि सम्पन्न करते हैं। मैं बड़ी आस लेकर खड़ी थी, कि पड़गाहन करूंगी और आहार भी दूँगी। वह न हो सका। मैं बहुत दु:खी हो गई। माँ ने कहा- बेटा, रोओ नहीं, हटा वाले डॉ. सा. के चौके में आहार दिलवा दूँगी। मैंने रोना बन्द कर दिया। चौका कुछ ऐसा था कि हमारे और उनके चौके में जाने का पीछे का दरवाजा एक ही था। (आपको ख्याल करा दूँ, कुण्डलपुर क्षेत्र के बड़े गेट के बाजू में छत 16-17 नम्बर सीढियाँ चढ़कर जाते थे।) वहाँ आचार्य श्री जी का आहार शुरू हो गया। मुझे आहार देने का प्रथम अवसर था। अत: मैं शुद्धि आदि को बहुत अच्छे तरीके से सीखकर आचार्यश्री जी के जहाँ आहार हो रहे थे, वहाँ जाकर खड़ी हो गयी। आचार्य श्री ने आष्टाह्विक पर्व में नियम लिया होगा, कि जिस चौके में पड़गाहन होगा, उसी चौके के सदस्यों से आहार लेंगे। उन्होंने मुझे दूसरे चौके का समझकर निषेध के लिए सिर हिला दिया। मैं जिस भाव से आयी थी, वह जब पूरा नहीं हो सकता तो चौके से निकल कर एक जगह बैठकर फूट-फूट कर तेजी से रोने लगी। मुझे रोते हुये देखकर मेरी माँ बोली- क्यों रो रही हो ? मैंने कहा- मुझे आहार देना थे। महाराज जी ने लेने से मना कर दिया। मेरा रोना देखकर माँ भी बहुत दु:खी हो गयी। उसने मेरी रोती आँखों पर जल डाला और पूरा मुँह धोया। मेरा हाथ पकड़ा कहने लगी- चलो मैं शिखरचन्द्र हटा वालों से कह देती हूँ, वे महाराज श्री से कह देंगे कि इस बेटी की आहार देने की भावना है। महाराज मान जायेंगे। फिर तुम आहार दे देना। चलो। मैं आहार देने के लिये पुन: चली गई। पहले से रोना तो भरा ही था। आचार्य श्री के पास मुझे उसी सूरत में खड़ा कर दिया। डॉ. सा. ने आचार्य श्री से कहा- ये बच्ची बड़े भाव लेकर आयी, इससे आहार ले लीजिये। आचार्य श्री जी ने सुनकर स्वीकारोक्ति दी। मैंने शुद्धि बोली, हिचकियों से अधिक गला भर गया। इस प्रकार की हिचकी लेते हुये शुद्धि को सुनकर आचार्य श्री अन्तराय करके बैठ गये। मैं सोचने लगी क्या हो गया ? मेरा दिमाग घूम गया। कुल्ला करके आचार्य श्री मन्दिर पहुँच गये। यहाँ हल्ला हो गया कि एक बच्ची जो आहार नहीं देना चाहती थी, उसकी माँ ने जबरदस्ती दिलाने की कोशिश की तो वह रोने लगी। जिससे आचार्यश्री को अन्तराय आ गया। यह झूठी अपवाह सारे क्षेत्र में पहुँच गई। मैं इस प्रकार सुनने के बाबजूद कुछ नहीं बोली। रोती हुई एक कमरे में जाकर एक कोने में सांझ तक बैठी रही। माँ के बार-बार कहने पर कि चलो भोजन कर लो। मैं इतनी दु:खी हो रही थी कि अन्तराय हुआ मेरे कारण। उसका दु:ख, दूसरा झूठी अपवाह फैल गई। यह जिंदगी का प्रथम उपवास था। मैंने उस दिन कुछ भी नहीं खाया-पिया। उपवास के विषय में मेरी धारणा थी कि अगर मैं एक दिन नहीं खाऊँगी तो मर जाऊँगी। लेकिन यह धारणा उस दिन से समाप्त हो गयी। दूसरे दिन मैंने अपनी माँ से कहा कि जब तक मैं बड़े महाराज को आहार नहीं ढूँगी तब तक कुछ भी नहीं खाऊँगी। मेरी माँ को इस बात की चिन्ता हो गई। वह फिर मुझे ऐसे चौके में ले गई जहाँ बड़े महाराज के आने की संभावना थी। पहले से मुझे चौके में खड़ा कर दिया। बड़े महाराज आ गये। कुण्डलपुर में रहने वाले त्यागी श्री भगवानदास जी लाहरी, बाबा जी ने मेरी भावना देखी कि बच्ची का नियम है कि भोजन तभी करेगी जब महाराज को आहार दे लेगी। उन्होंने मुझे आगे कर दिया। कहा- शुद्धिबोलो। मैंने ज्यों ही शुद्धि बोली, बड़े महाराज मुझे खुली आँखों से देखने लगे। में डरी हुई तो पहले से ही थी, लेकिन देखने से और डर गयी। डरते-डरते एक ग्रास आहार दिया। एक ग्रास आहार देने में मुझे इतनी खुशी हुई कि उसका वर्णन शब्दातीत है।

     

    कभी मैं बड़े महाराज (आचार्यश्री) की सारी क्रियायें देखती रहती। जब वे स्वयंभूस्तोत्र पढ़ते थे तब मैं दीवाल के पीछे लेठकर सुनती रहती। मैंने उनको परोक्ष रूप से गुरु स्वीकार लिया। घर में रहकर जब कभी कुछ अपने तन पर नये कपड़े डाले या कुछ श्रृंगार किया, सब कुछ निस्सारसा लगने लगता। यही अन्दर से भावना बनती कि महाराज से मुझे कुछ कहना है। बाद में कुण्डलपुर में आचार्य श्री बीमार हो गये। उनकी बीमारी सुनकर आँसुबह आये। उनके निकट किसी को जाने नहीं मिलता था। तभी से व्रत लेने सम्बन्धी विचार मेरे अन्दर ही अन्दर बनने लगे। इन महाराज जी को ही मुझे गुरु बनाना है। कुछ निमित्त नहीं मिल पा रहा था। कक्षा ग्यारहवीं में थी। सन् 1976 था। देवों द्वारा मुझे स्वप्न आया। बड़े बाबा की मूर्ति दिखती है, साथ में आवाज भी आ रही थी वह आवाज थी मेरे उपादान को जागृत करने की। जिसमें कहा जा रहा था- हे जीव, तुझे जीवन पर्यन्त बालब्रह्मचर्य व्रत लेना होगा। स्त्रीलिंग का छेद करना होगा।

     

    जो संत कुण्डलपुर में आये हैं, वह तुम्हारे गुरु बनेंगे। तुम्हारे घर से इस मार्ग पर चार सदस्य और निकलेंगे। बारह वर्ष में तेरी दीक्षा होगी। और भी कई बातें थी। मुझसे प्रश्न भी पूछा गया- गृहस्थी को तुम क्या मानती हो ? मेरा जबाव था- छोटा नरक । अच्छा, जो मैंने कहा- अभी किसी को जाहिर नहीं करना। 9 अगस्त को गुरु के पास जाकर ब्रह्मचर्य व्रत लेना। बारहव्रतों के पालन की प्रतिज्ञा भी लेना। स्वप्न बहुत लम्बा था। यहाँ संक्षिप्त में लिखा है। उस स्वप्न को मैंने अपनी कापी में उठते ही कमरे में जाकर लिख लिया था। लिखते वक्त इतनी खुशी हो रही थी कि जैसे आदमी को करोड़ों रूपये की सम्पति मिलने के उपरान्त होती होगी। मैं जब तब उस कापी को पढ़ती रहती। लेकिन किसी को न बताने व। प्रतिज्ञा थी। जब कार्य सफल हो जाये तभी बताना है। छिपाकर रख दिया। अन्दर-अन्दर मेरी तैयारी चल रही थी।

     

    ब्रह्मचर्यव्रत क्या होता है ? इसकी विस्तार से जानकारी चाहिये थी। व्रत आखिर क्या है ? मैंने जब भी किसी से पूछा तो इसका जबाव नहीं मिला। मैंने अपनी बड़ी माँ से पूछा, वे कहने लगी- अभी तुम छोटी हो, बड़े होने पर पता लग जायेगा। मेरी जिज्ञासा का समाधान किसी ने नहीं दिया। मैंने बहुत सारे शास्त्रों की सूची में ब्रह्मचर्यव्रत के विषय में खोजा। उससे भी मुझे यथेष्ट जानकारी नहीं मिली। यानी निराशा ही हाथ लगी।

     

    एक दिन उस जिज्ञासा का समाधान हुआ। जिस अलमारी में अपने इष्ट बड़े बाबा का काँच में जड़ा फोटो रखा था, जिनवाणी भी रखी थी। जिसमें समाधिमरण और बारहभावना लिखी थी। स्वाध्याय करने सम्बन्धी अन्य छोटी-बड़ी पुस्तकें भी रखीं थीं। मैंने बड़े बाबा की आरती करने के लिये जैसे ही अलमारी खोली, उसमें एक पुस्तक मुझे सामने ही रखी दिखी, जिसका नाम था 'ब्रह्मचर्य ही जीवन है" लेखक वामन। मैंने उस पुस्तक को हाथ में लिया। आगे-पीछे पलटकर देखा। उसमें मेरी ब्रह्मचर्य को जानने की जो जिज्ञासा थी उस सबका समाधान मिलने की गुंजाइस दिखी। उस पुस्तक को मैंने छिप-छिप कर पढ़ लिया। उसमें

    जीवन में वैराग्य को स्थिर करने सम्बन्धी बातें थी। उन सभी को मैंने अपनी कापी में लिख लिया। बड़े मनोयोग से मैंने वह पुस्तक पढ़ी। व्रत सम्बन्धी अब किसी से पूछने की जरूरत नहीं रह गयी। मेरा दिमाग वैराग्य से भर गया। किसी से बोलने में समय की बबादी जैसी लगने लगी। अन्दर ही अन्दर पुरुषार्थ जागने लगा मोक्षमार्ग पर कदम बढ़ाने का।

     

    एक दिन मैं मौन लेकर बैठी थी। मेरे मामा का बेटा यानी भाई ने कहा- पुष्पा तुम अब बोलती क्यों नहीं हो ? मैं कुछ दिन के लिए आया हूँ। मेरे मुख से निकल गया- मुझे ब्रह्मचर्यव्रत लेना है। इसलिए मैं मौन आदि की साधना कर रही हूँ। वह बोला- ब्रह्मचर्य व्रत क्या होता है ? मुझे बता दो मैं भी वह व्रत ले लूगा। मैंने कहा- मैं अपने मुँह से नहीं बता सकती। मैंने जो पुस्तक पढ़ी है, जिससे मैंने जानकारी प्राप्त की, उसको तुम भी पढ़कर जानकारी कर लो। वह बोला- अच्छा कहाँ है पुस्तक ? मैंने कहाअलमारी में रखी है। मैं लेकर आती हूँ। मैं अलमारी से पुस्तक निकालने गई, अलमारी खोली, किन्तु पुस्तक वहाँ नहीं मिली। सारी पुस्तकों को एक-एक करके देखा। इधर-उधर खोजा। लेकिन पुस्तक नहीं मिली। मैं खाली हाथ भाई के पास आकर कहती हूँ- पुस्तक नहीं है, पता नहीं कौन ले गया ? वह कहता-तुमने झूठ बोला। पुस्तक कौन ले जायेगा ? मैंने कहापुस्तक मैंने पढ़ी थी, उस पुस्तक से मैंने जो कापी में नोट किया था, उसको पढ़ा दिया। उसको विश्वास हो गया। लेकिन पुस्तक कहां गायब हो गयी, पता नहीं चला ? मुझे जानकारी दिलाने हेतु शायद किसी ने रखी हो। मुझे ऐसा आभास हुआ और जहाँ से लायी गई हो वहाँ पुन: रख दी गई हो।

     

    कापी में जो भी लिखा था, उसको मैं बार-बार पढ़ती थी। लेकिन छिपाकर पढ़ना होता था। समय आने वाला था, गुरुदर्शन का। लेकिन उसमें कुछ पुण्यक्षीण होगा। आचार्य श्री के पटेरा के प्रवचन से कुछ जागृति आयी, लेकिन कुछ सुनाई नहीं हो सकी, इस मार्ग पर आने की।

     

    पुन : सन् 1977 में मुझे गुरुदर्शन हुये। मैं वैराग्य बढ़ाती रही, पुण्य प्रबल हुआ। मुझे जीवनपर्यन्त व्रत मिला और दो प्रतिमा के व्रत भी। यही मेरा वैराग्य का क्रम रहा। मेरे व्रत लेने पर माँ बहुत दु:खी हुई। एक समय था जब माँ कहती थी कि तुझे इस मार्ग पर लगाऊँगी। लेकिन जब व्रत लिया तो मूर्चिछत हो गई। मुँह से झाग निकलने लगा। यह सभी ने देखा। मेरे व्रत लेते समय जितनी संख्या में लोग थे उन सभी ने देखा।

     

    कुछ दिन बाद मेरे माता-पिता ने आजीवन ब्रह्मचर्य व्रत ले लिया। जब उन्होंने व्रत लिया तो आचार्यश्री बोले- बच्चों से नम्बर शुरू होता है। वे फिर इसी मार्ग में लग गये। माँ ने चौका लगाने में मन लगाया। अन्त में भावना बनायी, कि मैं भी आर्यिका बनूँगी। मेरे छोटे भाई ने कहा कि-जो मेरी पुष्पा बहिन ने व्रत लिया, वही मैं भी लूगा। उसने अपनी लौकिक पढ़ाई में ध्यान देना बन्द कर दिया। मेरी जैसी धर्मध्यानमय स्थिति बना ली। छठवी कक्षा में ही आचार्य श्री से ब्रह्मचर्य व्रत ले लिया, कुछ वर्षों का ही। समय निकला, वह पवन भाई आत्मिक विकास हेतु कभी आचार्य श्री के सानिध्य में रहे, तो कभी माँ के चौका लगाने में सहयोगी बने, तो कभी आचार्य पुष्पदन्तसागर जी के संघ में रहे। जो भी साधु मिले, उनके संघ में कुछ-कुछ दिनों रहे। इसके बाद मासोपवासी आचार्य पूज्य सन्मतिसागर जी महाराज से दीक्षा ले ली। नाम सिद्धान्तसागर जी पाया। कुछ दिनों बाद आचार्य पद पर आ गये। माँ उनके साथ रहने लगीं। इसके बाद माँ ने आर्यिका दीक्षा की भावना रखी। लेकिन घर के मोही अन्य बेटा-बेटियों ने क्षुल्लिका दीक्षा हेतु ही अनुमोदना की। क्षुल्लिका पद पर रहीं। जब कभी चातुर्मास पूर्ण करके मेरे पास आती रहीं।

     

    जब मैंने आचार्य श्री से सन् 1989 में दीक्षा ली, दोनों जगह धर्मध्यान में मन लगाती रहीं। जो उन्होंने पूर्वावस्था में लक्ष्य बनाया था, मुझे भी संस्कारित किया। इस महाराज पद के योग्य बेटे को भी बनाया। जीवन में किये पापों का प्रक्षालन किया। मुझे इस पद पर जब भी देखा, यही कहा- बड़ी माता जी बन गई हो, कोई अगर तुम्हारा कहना न माने, संक्लेश नहीं करना। घर छोड़ा है। अपना कल्याण करना। यह वाक्यावली बोलकर मुझे क्रोध या संक्लेश करने की स्थिति-परिस्थिति से बचाव करती रहीं। जिससे मेरा हमेशा परिणाम शुभ में बना रहा। मेरी सहयोगी, संघ में आकर बनती रहीं। मुझे उन्होंने कभी अहंकारी नहीं बनने दिया। स्वयं मेरी वन्दामि तीन-तीन बार झुककर करती रहीं। मन्दिर में बैठना या किसी कमरे में तो पूँछकर जाती थी। जरा-सी बात में क्षमा माँगती रहती थीं। एक माँ जिन्होंने मुझे पाला-पोषा हो, साज-सँभाल की हो, वही मेरे आर्यिका बनने पर विनय करती रहीं। मुझसे पूर्ण भगवती-आराधना सुनी। पूछती थी- समाधि कैसे की जाती है ? में कहती- देखो, क्षुल्लिका जी, जब तुम अपनी समाधि करो, तब किसी अन्य से पद्य में गा-गाकर बारहभावना, समाधिमरणपाठ नहीं सुनना। शरीर शिथिल बन रहा है। क्या समझ पाओगी ? अत: गद्य में सुनना। अर्थ सुनना। वैराग्यवर्धक सम्बोधन सुनना। जब समाधि का समय आया तो भक्तों ने वैराग्य भावना, बारहभावना सुनाना शुरू की तो स्वयं भी कहती थी- हे जीव, ऐसा कहकर सम्बोधन कर, अर्थ सुनाओ। गाकर नहीं।

     

    उनको उस समय संस्कार ध्यान रहे। मैं ग्वालियर चातुर्मास में थी। वे दिल्ली में थीं। वहाँ से क्षमा माँगी, जब कभी संघ में आती रही, मैंने वहाँ जो भी गलती की हो, तुम्हारी अविनय की हो, क्षमा करना। शब्दों से लगा कि वास्तव में वह कोई विशेष आत्मा थी। संघ में सभी से कह दिया कि आप सभी आहार को आज जल्दी निकल जाओ। उनके कहने पर सभी संघस्थ मुनि, आहारचर्या को निकल गये। सभी आहार करके आ गये। पूँछ लिया- सबके आहार ठीक हो गये ? कुछ समय व्यतीत हुआ, देहस्थ आत्मा निकल गई। यह है मेरी माँ का संक्षिप्त चित्रण। जिन्होंने पूर्व में संकल्प लिया था कि जो मेरा बेटा या बेटी होगी उसे मोक्षमार्ग में लगाऊँगी। और स्वयं मैं लग जाऊँगी। यह सब उन्होंने करके दिखाया। में ऐसी माँ को पाकर धन्य हो गई। जिन्होंने मुझे जिनवाणी माँ की आवाज सुनने, पढ़ने तथा उसकी प्रभावना करने का मौका दिया। जो जिनवाणी बड़ी आनन्ददायी है, सदगति कराने वाली है। संसार की भूलभुलैयों से बचाने वाली है। ऐसी जिनवाणी माँ, एवं सच्चे गुरु विश्वविख्यात दिगम्बराचार्य को पाकर धन्य हो गई। जैसा मैंने माँ का सरल स्वभाव पाया और उनकी शिक्षायें पायीं, मन भी वैसा बन गया। क्या करना, किसी की गलतियों को देखकर, कौन होते हैं हम, किसी को समझाने के काबिल ? तीर्थकरों ने अपनी दिव्यदेशना से जीवों को नहीं सुधार पाया, जिसकी उपादान में योग्यता नहीं, उनका मैं क्या सुधार कर पाऊँगी ? योग्यता हो तो तीसरे नरक तक जाकर भी देव-नारकियों को सम्बोधन कर देते हैं। वे जीव अपने परिणामों में सरलता लाने लग जाते हैं। जिनका उपादान कठोर है, उनको इस मध्यलोक में रहकर, समझाकर, ठिकाने नहीं ला सकते। गुरु भी अपने शिष्यों को नहीं ला पाते। तो मैं फिर किस खेत की मूली हूँ? माँ ने जो भी मुझे समझाया, बड़े-बड़े आगम का सार संक्षेप सूत्र रूप था। उपकारी बड़े बाबा के भक्त देव, उपकारी मेरी माँ, उपकारी मेरे रत्नत्रय प्रदान करने वाले गुरु, उपकारी समाज, जो रत्नत्रय को पालन करने में सहयोगी बना। सभी कारण तभी पूर्ण होगा जब मैं अपनी समाधि शान्त परिणामों से करूंगी।

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