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    अव्रती और व्रती

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    एक बार हम सभी बहिनों को आश्रम की संचालिका बाई जी तीर्थयात्रा पर ले गई। बीच में सोनगढ़ पड़ा। हम सभी बहिनों की भावना हुई कि सोनगढ़ के मन्दिरों के दर्शन भी करें। फिर पालीताना आदि के लिये जायेंगे। वहाँ दर्शन की भावना के साथ चम्पावेन के पास भी जाने की भावना बनीं, क्योंकि वे अष्टमी-चतुर्दशी के दिन अपने कमरे से निकल कर दर्शन के लिये जाती थीं। बाकी के समय भगवान के दर्शन दूरबीन से करती थीं। उस दिन अष्टमी का दिन था। सी-डेढ़ सौ वाहन आँगन में खड़े थे, दर्शनार्थियों के। उसमें एक वाहन जिस पर बैठकर हम लोग तीर्थयात्रा को जा रहे थे, वह भी खड़ा था। गेट खुलने का समय डेढ़ बजे का था। गेट जैसे ही खुला कि पहले उस कक्ष में कचनबाई जी को लेकर हम बहिनें वहाँ पहुँच गये। जाकर नीचे जमीन पर बैठ गये। वे अपने पलग पर लेटीं-लेटीं किसी आदमी से तत्वचर्चा करती रहीं। हम लोगों की तरफ देखकर कुछ क्रिया नहीं की। "कहाँ से आयी हो' आदि जो लौकिक व्यवहार किया जाता है वह कुछ भी नहीं किया। कुछ देर इंत-ए-जार किया। जब कुछ भी चेष्टायें उनकी तरफ से नहीं हुई तो कचनबाई जी कहती हैं- उठो छोरियो, चलो, गाड़ी का समय हो गया। हम सभी माँजी की आवाज सुनते ही उठ गये। वाहन में आकर बैठे और चल दिये। सभी को भय लग रहा था कि आचार्यश्री अगर सुनेंगे तो क्या कहेंगे ? "यहाँ की घटित घटना आचार्य श्री को नहीं सुनायेंगे' सभी ने संकल्प किया।

     

    लेकिन आचार्य श्री के पास यह सारी चर्चा पहले से पहुँच गयी थी। जब यात्रा करके आये और गुरु के दर्शन के लिये गये तो आचार्य श्री बोले- क्यों तुम सभी सोनगढ़ गई थीं ? हम लोगों ने मिलकर कहा- जी आचार्य श्री गये थे। उसके पास भी गयी थीं ? सुनकर आश्चर्य हुआ कि आचार्यश्री को किसने बता दिया- सभी चुप हो गये थे।

     

    आचार्य श्री बोले- क्यों ? तुम लोग बोल क्यों नहीं रहीं हों ? समस्या यह थी कि अब इस विषय को कौन आचार्य श्री को बतायेगा ? जो भी बतायेगा, उसके निमित्त से आचार्य श्री की डाट पड़े बिना रहेगी नहीं। लेकिन आचार्य श्री से छिपाना भी अब संभव नहीं। किसी ने आचार्य श्री से कुछ भी नहीं कहा, क्योंकि आचार्य श्री के चेहरे पर मुस्कुराहट नहीं थी। जैसे कभी आदमी मीठा खाते-खाते नमकीन खाने लगता है, पिताजी बेटे से मधुर-मीठा कब तक बोलता है जब बेटा अच्छा कार्य करता है। गलत कार्य करने पर तीखा भी बोलता है। सही रास्ते पर लाने के लिये। वैसे ही यहाँ की स्थिति बन रही थी।

     

    आखिर कचनबाईजी बोली-गुरु महाराज, क्या करें, ये छोरियाँ मानी नहीं, कहती थीं कि अब यहाँ तक आये हैं, तो उनको देख लें। इन सबकी भावना बन गयी तो मैं इन सबको उनके पास ले गई। आचार्य श्री ने क्रोध भरी निगाह हम सबके ऊपर डाली, यह जीवन का प्रथम क्षण था कि आचार्य श्री हम लोगों के निमित्त कुपित हुये थे। आचार्य श्री बोले- उसके पास गई थी, वह तुम लोगों से क्या बोल्नी थी ? हम लोगों ने कहा कुछ नहीं बोली थी। इसके बाद सारी घटना बता दी।

     

    आचार्य श्री बोले- तुम सबकी कितनी-कितनी प्रतिमायें हैं ? एक अव्रती के पास जाकर नीचे बैठ गयीं, अपने व्रतों का गौरव नहीं ? किसकी शिष्या हो ? इतना भी ख्याल नहीं ? भविष्य में ऐसा न करने सम्बन्धी और गलती को सुधारने वाला यह आचार्य श्री संक्षिप्त प्रवचन जैसा ही हो गया। अन्त में कहने लगे- सब तो दर्शन करने जाते ही हैं। उसमें तुम लोग भी शामिल हो गई। ऐसा सुनकर हम सभी बहिनों को गलती का अहसास हुआ। फिरसभी की आँखों में ऑसू की धारा बहने लगी। सभी ने साहस बटोर कर कहा- आचार्यश्री इसका कुछ प्रायश्चित दे दीजिये।

     

    आचार्य श्री बोले- क्या प्रायश्चित ? तेजी के साथ। फिर संवेदना से भरकर हम लोगों को रोता देख कहते हैं- चार उपवास कर लेना। दो आहार के बाद एक उपवास। सुन लियान ? उठो, चलो यहाँ से। यहाँ आचार्य श्री को ऊपर से क्रोधित मुद्रा बनाकर डाटना जरूरी भी था। नीति भी है- जवानी के पौधे पर अनुभव के फूल जल्दी नहीं आते और जब आते हैं तब तक नुकसान हो चुका होता है। वैसी ही स्थिति हम बहिनों की हुई थी। आचार्य श्री के सम्बोधन से सबक मिला कि प्रतिमाधारी होकर अव्रती के पास जाकर व्रतों की कीमत कम करना जैसा ही होता है। फिर तो वहाँ सोच-समझ कर ही गये थे।

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