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मेरे गुरुवर... आचार्य श्री विद्यासागर जी महाराज
  • मेरी दो शंकाएँ हैं, पहली कि हम जो उन्हें रात में खाना खाने के लिए जिद करते हैं, क्या उससे हमें कोई पाप लगता है? और दूसरी कि हम और वे ऐसा क्या करें कि जिससे उनका धर्म भी चलता रहे और वह स्वस्थ भी रहें?

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    शंका - महाराजश्री! मेरा नाम नन्दिनी जैन है, मैं फरीदाबाद से आई हूँ। मैं अपने दादाजी श्री स्वराज जैन एवं उनके पूरे परिवार की तरफ से आपको नमोऽस्तु करती हूँ। महाराजश्री! मेरे दादाजी बहुत धार्मिक हैं और उन्होंने नियम ले रखा है कि वह एक दिन में तीन बार से ज्यादा अन्न नहीं लेंगे और उन्होंने रात्रिभोजन का भी त्याग कर रखा है। परन्तु डायबिटिक पेशेंट होने के कारण डॉक्टर उनके हर चेकअप में उन्हें कहते हैं कि आपको रेगुलर इण्टरवेल्स में कुछ न कुछ खाना है और रात्रि भोजन भी करना है, पर वह नहीं सुनते। अगर हम उनके साथ जबरदस्ती करते हैं तो वह हमसे गुस्सा हो जाते हैं, नाराज हो जाते हैं। मेरी दो शंकाएँ हैं, पहली कि हम जो उन्हें रात में खाना खाने के लिए जिद करते हैं, क्या उससे हमें कोई पाप लगता है? और दूसरी कि हम और वे ऐसा क्या करें कि जिससे उनका धर्म भी चलता रहे और वह स्वस्थ भी रहें?

    - कु. नन्दिनी जैन, फरीदाबाद

     

    समाधान - बहुत अच्छा सवाल किया है। मैं आपसे कहूँगा कि डॉक्टरों से पूछो कि जो डायबिटीज के पेशेण्ट हैं, वह डॉक्टरों की सलाह के अनुसार दिनभर खाते रहते हैं, दवाइयाँ भी खाते हैं, वे ज्यादा स्वस्थ हैं या नियम से खाने वाले तुम्हारे दादाजी ज्यादा स्वस्थ हैं। समझ गई? खाने से ही व्यक्ति ज्यादा स्वस्थ नहीं होता, उसमें हमारा अपना पुण्य और पाप भी है। अगर तुम्हारे दादाजी ने अपने जीवन को इस तरह से सन्तुलित कर रखा है, तो बहुत अच्छा है, क्योंकि रात में नहीं खाने से उनकी कभी तबीयत तो नहीं बिगड़ी न? इसलिए तुम्हारे दादा की उम्र खाने की नहीं है, छोड़ने की है। उनको निभाने दो और उनके लिए अनुमोदना करो, रोको मत। किसी के नियम को निभाओगे तो लाभ मिलेगा और किसी का नियम तोड़ने में निमित्त बनोगे तो पाप के भागीदार बनोगे। इसलिए एक तो उनके नियम को निभाने में सहायक बनो और अपने लिए एक सीख लो कि अपने जीवन में जब भी नियम में आगे बढ़ोगी तो किसी प्रकार का कम्प्रोमाइज नहीं करोगी।

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