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मेरे गुरुवर... आचार्य श्री विद्यासागर जी महाराज
  • दीक्षा के कुछ दिन उपरान्त हम कुछ महाराज गुरूदेव के पास बैठे हुए थे, ऐसा लग रहा था मानो हमें गुरु नहीं बल्कि साक्षात् प्रभु मिल गये हों, उनके करीब रहने का आनंद अलग ही होता है। यह बताया नहीं जा सकता मात्र अनुभूत किया जा सकता है। आचार्य महाराज जी ने पूछा - क्यों दीक्षित होने के उपरान्त कैसा लग रहा है? हम सभी महाराजों ने कहा - बहुत अच्छा, बिल्कुल निराकुल जीवन हो गया है, ये सब आपकी महिमा है। आपने हम सब पर बड़ा उपकार कर दिया। आचार्य श्री बोल उठो - नहीं भैया मैंने कुछ नहीं किया आपने पुरूषार्थ किया उपादान जागृत किया, जो चाहा मिल गया मैं निमित्त मात्र हूँ। वास्तव में आचार्य भगवन् जन-जन का उद्धार कर रहे हैं लेकिन कर्तृत्व, भोगतृत्व और स्वामित्व से परे रहते हैं। वे हमेशा अपने कर्त्तापन के बोझ से रहित हैं। वे कर्तव्य समझकर अपने पथ पर निरंतर बढ़ते रहते हैं, धन्य हैं यह उनकी निरीह वृत्ति वे मात्र शब्दों से नहीं बल्कि अपनी चर्या के माध्यम से उपदेश देते हैं कि प्रत्येक साधक को हमेशा कर्त्तापन भोक्तापन और स्वामीपन से दूर रहना चाहिए।

     

    • जीवन की परवाह न करते हुये धर्म की रक्षा में समर्पित हो जाना ही सही समर्पण है।
    • सौंदर्य आँखों से दिखता है, और पवित्रता मन से दिखती है।
    • आचरण नकल से नहीं बल्कि हृदय के साथ विश्वास के साथ ग्रहण किया जाता है।

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