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मेरे गुरुवर... आचार्य श्री विद्यासागर जी महाराज
  • विदिशा में गर्मी के समय प्रवास चल रहा था, गर्मी बहुत थी। 8 अप्रैल को गुरूदेव ने केशलुंच किया था। उसी रात पानी गिरा एवं मौसम ठंडा हो गया। सुबह आचार्य श्री जी से कहा - आपके केशलुंच होने के कारण देवताओं ने वर्षा कर दी ओर मौसम ठंडा हो गया। यह सुनकर आचार्य महाराज जी ने कहा - आप लोगों ने ऐसी भावना भायी होगी। आप लोगों की भावना से ऐसा हुआ है, हमने कहा नहीं आचार्य श्री जी यह सब आपका ही प्रताप है। आचार्य भगवन् हमेशा जब कभी अपनी प्रशंसा सुनते हैं तो मौन हो जाते हैं या यों कह देते हैं कि सब गुरु महाराज की कृपा है, या यह सब आप लोगों की भावना से हुआ। ऐसा कह देते हैं। स्वयं अपने को इससे अछूता रखते हैं। मान से हमेशा दूर रहते हैं यह उनकी महानता है।

     

    • कर्तव्य के समय यदि हमारी दृष्टि प्रलोभन की और चली जाती है तो हमारी दिशा विपरीत हो जाती है।
    • कर्तव्य सामान्य होकर किया जाता है और कर्त्तव्य विशेष स्वामी बनकर किया जाता है।
    • कर्तव्य को दिशाबोध तत्वज्ञान से प्राप्त होता है।

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