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मेरे गुरुवर... आचार्य श्री विद्यासागर जी महाराज
  • हमारी सुरक्षा

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    सर्वोदय तीर्थ अमरकंटक की ओर विहार चल रहा था। जहाँ पर कुल घना जंगल पड़ता है वहाँ नक्सली लोग रहा करते हैं, विहार में पुलिस की एक गाड़ी आ गयी जिसमें 8-10 जवान बंदूक लिए साथ में सुरक्षा की दृष्टि से चलने लगे। आचार्य श्री जी ने कहा - हमें सुरक्षा की आवश्यकता नहीं, तब पुलिस के जवान बोले महाराज हमारी तो ड्यूटी है सरकार का कर्तव्य है यदि हम लोगों को आप साथ नहीं चलने देगें तो हमारी तो नौकरी ही चली जाएगी। आचार्य श्री मौन रहे कुछ नहीं बोले क्योंकि किसी की आजीविका का सवाल था और श्रावकों ने भी कहा - हे गुरूवर! ये आपकी व्यवस्था में नहीं बल्कि हम श्रावकों की व्यवस्था में हैं।

     

    जब एक जिले से दूसरे जिले में प्रवेश होने लगा तो पहले ड्यूटी वाले पुलिस के जवान जाने लगे तब वे गुरूदेव के श्री चरणों में नमन करके कहने लगे अभी तक हम आपकी रक्षा व्यवस्था में थे अब हमारी सीमा समाप्त हो गयी, अब हम जा रहे हैं, ऐसा आशीर्वाद प्रदान कीजिए ताकि हमारा जीवन सफल हो सके। तब आचार्य श्री जी ने कहा आप लोगों ने यहां कुछ समय के लिए रक्षा व्यवस्था की पर हम ऐसी बात बताते हैं जिससे तुम्हारे इस भव और भव-भव तक की रक्षा व्यवस्था हो जावेगी, वह यह है कि आप लोग सप्त व्यसन का त्याग कर दो, कभी माँस नहीं खाना, जुआ नहीं खेलना, शराब नहीं पीना फिर आप लोगों की हमेशा व्यवस्था होती रहेगी और परभव में जहाँ भी जाओगे वहाँ भी सुखी रहोगे। यह सुनकर सभी लोगों ने नियम लिये और अपने को धन्य मानते हुए चले गये। इस प्रसंग से हमें यह शिक्षा मिलती है कि हम लोग गुरु की सेवा नहीं करते बल्कि उनके माध्यम से हम अपने जीवन को पवित्र बना लेते हैं। अपना भी भला होता है। गुरु से हमें ऐसी शिक्षा मिलती है एवं उनकी सेवा से ऐसा पुण्य बंध होता है कि हमारे भव-भव सुधर जाते हैं और अंत में भवसागर से पार हो जाते हैं। (यह संस्मरण चाँदखेड़ी प्रवास के दौरान मुनि श्री सुब्रतसागर ही महाराज जी ने सुनाया था)।


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