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मेरे गुरुवर... आचार्य श्री विद्यासागर जी महाराज
  • गुरुओं के प्रति भक्ति

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    अपने लक्ष्य तक पहुँचना आस्थावान व्यक्ति का कर्तव्य हुआ करता है। साधन साध्य तक पहुँचाने में सहायक सिद्ध होता है। रास्ता, रास्ता है मंजिल, मंजिल है। जिसे मंजिल पर विश्वास है लेकिन रास्ते पर नहीं उसके लिए मंजिल पाना मात्र एक स्वप्न के अलावा और कुछ नहीं रह जाता।

     

    रास्ते पर विश्वास किये बिना मंजिल की कल्पना करना आकाश के फूल की तरह है। जिन्होंने मंजिल के साथ-साथ रास्ते पर भी विश्वास किया है एवं उस रास्ते के अनुसार चले हैं उनके माध्यम से हमें बोध लेना अनिवार्य है। बात बचपन की है जब आचार्य श्री गृहस्थ जीवन में थे उनके पिता मल्लप्पा जी मंदिर निर्माण हेतु सागौन की लकड़ी लाये थे उनके साथ एक दो चंदन की लकड़ियाँ भी लाये थे जो अन्य लकड़ियों की अपेक्षा मोटी थीं। उसी समय आचार्य शांतिसागर जी की समाधि हुई थी तो आचार्य श्री (बालक विद्याधर) ने उस चंदन की लकड़ी को उनकी समाधि में लगा दी थीं। यह गुरु के प्रति भक्ति समर्पण की भावना उनके जीवन में बचपन से ही थी। (समर्पण भक्ति का मापदंड हुआ करता है)।

     

    (गुरूदेव का यह संस्मरण मुझे पू. मुनि श्री चंद्रसागर जी महाराज ने सुनाया था।)

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