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मेरे गुरुवर... आचार्य श्री विद्यासागर जी महाराज
  • युग का बदलाव

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    धर्म की प्रभावना के बारे में आचार्य श्री जी बतला रहे थे कि धर्म की प्रभावना करना नहीं पड़ती, बल्कि निरीहता के साथ त्यागी–व्रती समाज में रहते हैं तो उनकी सादगीपूर्ण चर्या को देखकर लोग अपने आप प्रभावित हो जाते हैं। शुभ भावना पूर्वक प्रभावना होती है। धर्म एवं गुरु की प्रभावना हो बस अपनी यही भावना हो। यदि सादगी एवं निरीहता नहीं है तो समाज में एक आचार्य का प्रभाव भी नहीं पड़ सकता। आत्मा की साधना करने वाला साधु होता है ऐसे साधक का प्रभाव पड़ता है। बहुत शास्त्रों का ज्ञान करने एवं प्रवचन करने मात्र से प्रभावना नहीं होती।

     

    किसी ने शंका व्यक्त करते हुए कहा कि- आचार्य श्री जी आज के युग में प्रवचन के बिना प्रभाव नहीं पड़ता। जो अच्छे प्रवचन कर लेते हों एवं समाज में पैसा इकट्ठा करवा देते हों, उन्हीं साधुओं को लोग चातुर्मास के लिए श्रीफल भेंट करते है। तब आचार्य श्री ने कहा- ऐसा नहीं है। वर्धमान को देखो वर्तमान को नहीं। बहुत पहले जब मैंने नैनागिर में चातुर्मास किया था तब वहाँ प्रवचन के लिए कोई मंच वगैरह नहीं थी एक टपरियाँ थी उसी में प्रवचन हो जाते थे और सो–पचास लोग आ जाते थे। आज तो साधु लोग पहले से ही इतनी बड़ी मंच, इतना बड़ा पाण्डाल होना चाहिए यह पहले से ही फिक्स कर लेते है, जो मोक्षमार्ग के लिए ठीक नहीं है। जितनी सुविधाएँ बढ़ी हैं उतनी दुविधाएँ भी बढ़ने लगी हैं और रही बात चातुर्मास की तो चाहे कोई श्रीफल भेंट करे या न करे साधु तो कहीं भी चातुर्मास कर सकता है। आज लोगों को आयोजन के लिए बड़ी धर्मशाला चाहिए। चाहे उसमें धर्म रहे या न रहे। यह बहुत बढ़ी बिडम्बना है।सद्भावना ही प्रभावना का कारण बनती है सद्भावना आने से प्रभावना को चाहने की कोई आवश्यकता ही नहीं पड़ती। वह तो अपने आप ही हो जाती है।

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