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मेरे गुरुवर... आचार्य श्री विद्यासागर जी महाराज
  • वैय्यावृत्ति में विवेक

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    एक दिन वैय्यावृत्ति तप का वर्णन करते हुए आचार्य महाराज ने कहा कि- वैय्यावृत्ति करने वाले को विशेष सावधानी एवं विवेक रखने की आवश्यकता होती है। वैय्यावृत्ति करते समय डिढोरा नहीं पीटना चाहिए। इतना तक की दायें हाथ से औषधि दी जाए तो बायें हाथ को भी मालूम नहीं पड़ना चाहिए। वैय्यावृत्ति करने वाले को अन्य सब आकांक्षाओं से रहित होते हुए मात्र यह आकांक्षा होनी चाहिए। कि जिसकी वैय्यावृत्ति की जा रही है वह पूर्ण रूप ठीक हो जाये। सब कुछ करते हुए संसारी प्राणी विवेक के अभाव में सब कुछ भूल जाता है।

     

    साधक की साधना में सहयोग देना यही वैय्यावृत्ति है, शिक्षार्थी को, चिन्तन, मनन शील व्यक्ति को किसी भी प्रकार का सहयोग देना ही वैय्यावृत्ति है, साधु के पैर दबाना ही वैय्यावृत्ति नहीं है। साधक को यह नहीं सोचना चाहिए कि - मेरी साधना का मुझे क्या फल मिला है बल्कि यह देखते रहना चाहिए कि मेरे गुणों में कितनी वृद्धि हुई है। इतने ही गुणों की वृद्धि क्यों हुई इससे ज्यादा गुणों की वृद्धि होनी चाहिए थी। अब गुणों की वृद्धि की साधना करना है। जिस प्रकार माँ-छोटे से लेकर घर के सभी छोटे-बड़े सदस्यों का पात्र के अनुसार विवेक पूर्वक वैय्यावृत्ति करती है। उसी प्रकार हमें भी मोक्षमार्ग में विवेक पूर्वक देखकर सभी साधकों की वैय्यावृत्ति कर लेना चाहिए। विवेकशील व्यक्ति ही वैय्यावृत्ति करके कर्म निर्जरा कर सकता है।

     

    विवेक के अभाव में एक धर्मात्मा को अधर्मात्मा बनने में देर नहीं लगती। अतः धर्मात्मा को प्रत्येक समय प्रत्येक कार्य के लिए विवेक आवश्यकता है। शारीरिक शिथिलता में ही वैय्यावृत्ति की जाती है ऐसा नहीं है, किन्तु मानसिक शिथिलता को भी ठीक करने के लिए वैय्यावृत्ति की जाती है। वैय्यावृत्ति करने वाला बहुत सहनशील, समताशील, विवेकशील, मधुरभाषी होता है। वैय्यावृत्ति करने के लिए व्यापाक दृष्टि भी आवश्यक होती है। रोग परीषह को दूर करना और मिथ्यात्व आदि का प्रभाव होने पर उसको दूर करने का प्रयास करना वैय्यावृत्ति है। कभी स्वप्न में भी धर्मात्मा के प्रति ऐसे वचन नहीं बोलना चाहिए कि जिससे वह अपने मार्ग पर जो अपने आप चल रहा है उसको बाधा आ जाये। प्रत्येक धर्मात्मा में धर्म के मार्ग पर चलने के लिए वात्सल्य होना आवश्यक होता है। वैय्यावृत्ति तभी तक की जाती है जब तक पात्र अज्ञान है, नादान है।

     

    ज्ञानी की वैय्यावृत्ति नहीं की जाती, किन्तु ज्ञानी स्वयं वैय्यावृत्ति करता है। स्वयं स्वाश्रित हो जाने के उपरांत दूसरे को भी स्वाश्रित बनाने का प्रयास करना यह भी महान् वैय्यावृत्ति है। उसको मधुरता के साथ कहना चाहिए कि देखो में जिस उपाय से इस स्थिति में आया हूँ इस स्थिति पर यदि तुम्हें भी आना है तो मैं जैसे-जैसे उपाय बताऊँगा वैसे-वैसे करते जाना। वैय्यावृत्ति करते समय कषाय नहीं होना चाहिए। निकषाय भाव के साथ ही वैय्यावृत्ति हो सकती है। मन के द्वारा ही वस्तुतः वैय्यावृत्ति होती है, वचन और काय तो उसी प्रकार माध्यम बन जाते हैं जैसे कि रोगी को दवाई दी जाती है तो दवाई से रोग ठीक होता है, किन्तु दवाई चम्मच के माध्यम से जाती है। उसी प्रकार वैय्यावृत्ति उज्ज्वल मन के माध्यम से होती है। वचन और काय तो उसमें चम्मच के समान माध्यम बन जाते हैं।


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