Jump to content
मेरे गुरुवर... आचार्य श्री विद्यासागर जी महाराज
  • वचन नहीं प्रवचन

       (0 reviews)

    आगम में लिखा है कि साधुओं को अनुभय वचन बोलने चाहिए। इसका अर्थ होता है हाँ भी न हो और न भी न हो। यदि साधु से किसी ने निवेदन किया कि आप हमारे नगर पधारिए तब साधु को न तो हाँ कहना चाहिए और न ही न कहना चाहिए। यदि आपने हाँ कह दिया तो और यदि किसी कारण वश नहीं जा पाए तो झूठ हो जाएगा और यदि न कह दिया और पहुँच गए तो भी ठीक नहीं इन दोनों के बीच में सामंजस्य बनाए रखने के लिए अनुभय वचन का उपयोग किया जाता है।

     

    जब कभी भी आचार्य श्री से कोई नगर आगमन या चातुर्मास का निवेदन करने जाते हैं तब आचार्य श्री उन्हें न भी नहीं कहते और हाँ भी नहीं कहते, बल्कि 'देखो' इस शब्द का उपयोग करते हैं। और हम सभी से कहते भी हैं कि किसी बात में हाँ या न में जवाब देना उसके प्रति लगाव रखना है। जवाब न देना भी तो एक लाजवाब जवाब है एवं उन्होंने लिखा भी है- शब्द पंगु हैं, जवाब न देना भी लाजवाब है।हम सभी साधकों को आचार्य श्री कहा करते है क साधुओं को कभी श्रावकों के लिए वचन नहीं देना चाहिए बल्कि प्रवचन देना चाहिए।

     Share


    User Feedback

    Create an account or sign in to leave a review

    You need to be a member in order to leave a review

    Create an account

    Sign up for a new account in our community. It's easy!

    Register a new account

    Sign in

    Already have an account? Sign in here.

    Sign In Now

    There are no reviews to display.


×
×
  • Create New...