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मेरे गुरुवर... आचार्य श्री विद्यासागर जी महाराज
  • शान्ति का उपाय

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    आचार्य श्री जी ने एक बार कहा कि- आत्मस्थ होने के लिए निर्ममत्व होना बहुत आवश्यक है। मेरे मन का भाव छोड़ने एवं पर वस्तु के प्रति जो लगाव है उसके त्याग का नाम निर्ममत्व है। तब किसी ने कहा कि मुझे किसी से ममत्व नहीं है फिर भी मन में शान्ति क्यों नहीं रहती है। आचार्य श्री जी ने कहा- ऐसा हो ही नहीं सकता, ममता रहित होने पर अशान्ति रह ही नहीं सकती अभी आपके अन्दर परिग्रह एवं ममताभाव विद्यमान है तभी तो मन अशान्त रहता है आचार्य श्री ने उदाहरण देते हुए कहा कि- दूध तभी उबलता है जब नीचे आग जल रही हो नीचे से आग निकाल दो तो जो दूध उबल रहा है, वह धीरे-धीरे शान्त हो जाता है। वैसे ही परिग्रह छोड़ने पर कषायों का उबाल ठीक हो जाता है एवं धीरे-धीरे मन शान्त होने लगता है। यदि छोड़े हुए पदार्थ के प्रति भी ममत्व भाव आ जाता है तो पुनः आकुलता पैदा होने लगती है। जैसे गर्म घी में एक बूंद पानी की डाल देने से चटपट की आवाज आने लगती है।

     

    तब मैंने कहा- आचार्य श्री जी कई लोग कहते हैं कि ये वस्त्र, धन, घर आदि मेरी आत्मा से पृथक् हैं। आत्मा-आत्मा में है, राग-राग में है। बाह्य में मेरा कुछ भी नहीं है ऐसे व्यक्तियों के लिए क्या कहा जाए? तब आचार्य श्री जी ने उदाहरण देते हुए कहा कि- एक विद्धान प्रवचन दे रहे थे। वह भी यही कह रहे थे कि- पर वस्तु मेरी नहीं हो सकती मैं पर वस्तु का नहीं हो सकता संसार में जो कुछ दिख रहा है वह सब मेरा नहीं है इतने में किसी श्रोता ने उनके सामने रखी हुई घड़ी को उठा लिया तब पंडित जी तत्काल बोल पड़े यह घड़ी मेरी है। यहीं रख दो कहाँ ले जा रहे हो। (सभी लोग हँसने लगे।) 

     

    ऐसे लोगों के लिए आचार्य ज्ञानसागर जी कहा करते थे कि जब पर वस्तु अपनी नहीं है तब कोई व्यक्ति यदि आपके सामने से आपकी वस्तु उठा ले जाए तो आपको विकल्प नहीं होना चाहिए। जो संसार में उलझ रहा है वह परिग्रह का त्याग कर ही नहीं सकता। परिग्रह को चाहने वाला कभी भी आत्मस्थ नहीं हो सकता।

    Edited by संयम स्वर्ण महोत्सव

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