Jump to content
मेरे गुरुवर... आचार्य श्री विद्यासागर जी महाराज
  • सच्चा स्वाध्याय

       (0 reviews)

    साहित्य एवं चारित्र के बारे में उपदेश देते हुए आचार्य श्री जी ने कहा कि- जिसमें सभी का हित निहित हो उसी का नाम साहित्य हुआ करता है। जिससे स्वयं एवं दूसरों का कल्याण हो उस साहित्य को ही जिनवाणी कहा जाता है। हेय (त्यागने योग्य) एवं उपोदय (ग्रहण करने योग्य) का ज्ञान होने से ही आत्मा का कल्याण हो सकता है। हेयोपादेय का ज्ञान पर्याप्त नहीं है बल्कि आत्मकल्याण के लिए उस पर अमल करना भी जरूरी है। जैसे भोजन करने मात्र से स्वस्थ्य नहीं रह सकते बल्कि भोजन पचने से स्वस्थ्य रहा जा सकता है। पुराना पचता नहीं है और पुनः भोजन किया जाता है तो वह अजीर्ण हो जाता है। बीमार कर देता है ठीक उसी प्रकार साहित्य, ग्रंथ पढ़ने और लिखने मात्र से कल्याण नहीं होगा बल्कि पूर्वाचार्यों ने जो पहले ग्रंथ लिख कर हम पर उपकार किया है। उनका स्वाध्याय करके अमल में लाने से ही कल्याण होगा।

     

    आचार्य श्री जी ने उदाहरण देते हुए कहा कि- जैनियों के पास पूर्वाचार्यों द्वारा रचित इतना अधिक साहित्य है कि जीवन भर उसका स्वाध्याय किया जा सकता है, लेकिन नए-नए साहित्य की आवश्यकता पड़ती जा रही है जैसे पेट में भूख है ही नहीं फिर भी भोजन की थाली पर थाली परोसी जा रही हैं। स्वास्थ्य बिगड़ता जा रहा है। फिर भी लालसा बढ़ती जा रही है। यदि पढ़कर भी आचरण में नहीं ढाला तो समझना साहित्य का पढ़ना निरर्थक गया। ढाई अक्षर प्रेम का पढ़े सो पंडित हो, पर मैं कहता हूँ- ढाई अक्षर आत्मा का उसे पढ़े उसका अनुभव करे सो पंडित हो। एक मुनिराज अक्षर ज्ञान से शून्य होते हुए भी शुद्धाचरण के बल पर अपना एवं दूसरों का कल्याण कर जाते हैं यही सच्चा स्वाध्याय, धर्म एवं मोक्षमार्ग है।

     

    आलस्य का त्याग कर ज्ञान भावना होना ही तो स्वाध्याय कहलाता है। एक मुनिराज निरीह वृत्ति से साथ शांत बैठे हुए हैं शास्त्र उनके सामने नहीं है फिर भी उनका हमेशा परम स्वाध्याय चलता रहता है। यही सच्चा स्वाध्याय है जिसमें राग-द्वेष, कषाय, मोह एवं पाप का क्षय हो।

     

    आज के युग में सूत्र, साहित्य का उपयोग पंचेन्द्रिय के विषयों को प्राप्त करने में ही किया जा रहा है लेकिन यह घातक सिद्ध होगा।साहित्य दीपक की भांति है। ज्यादा तेल डालने मात्र से दीपक अधिक प्रकाश नहीं देता बल्कि दीपक की लौ के पास आने वाली कालिमा को बार-बार साफ करना पड़ता है तभी तेज प्रकाश आता है। साहित्य मात्र पढ़ने से ज्ञानी नहीं बनते जब तक कषायों, पापों की कालिमा दूर नहीं करते।

     Share


    User Feedback

    Create an account or sign in to leave a review

    You need to be a member in order to leave a review

    Create an account

    Sign up for a new account in our community. It's easy!

    Register a new account

    Sign in

    Already have an account? Sign in here.

    Sign In Now

    There are no reviews to display.


×
×
  • Create New...