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मेरे गुरुवर... आचार्य श्री विद्यासागर जी महाराज
  • पूर्ण नहीं, पर्याप्त ज्ञान

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    आजकल कई स्थानों पर सम्यग्ज्ञान शिविर का आयोजन चलता रहता है, लेकिन चारित्र के सुधार के लिए कोई शिविर नहीं लगता। यदि कहीं पर्युषण पर्व के दौरान दस दिन का श्रावक-संस्कार शिविर का आयोजन मुनिराजों, त्यागी–व्रतियों के सान्निध्य में लगता भी है। तो कुछ एकांतवादी इसकी आलोचना करते रहते हैं कि इससे क्या होता है? दस दिन एकासन, उपवास कर लेने से आत्मा का भला नहीं हो जाता इत्यादि। ज्ञान प्राप्त करो जिससे आत्मा का भला हो। ऐसे लोग सम्यग्ज्ञान की प्रशंसा करते समय सम्यग्चारित्र की आलोचना कर जाते हैं, जो कि उन्हें ही घातक सिद्ध होगा। ज्ञान की प्रशंसा करना अच्छा है, लेकिन आचरण को गौण करना, चारित्र की क्रियाकाण्ड करकर निंदा करना अच्छी बात नहीं है।

     

    इसी विषय पर आचार्य श्री का उपदेश चल रहा था कि- संयत ज्ञान का नाम ही ध्यान है। यह ध्यान ही "स्वरूपाचरण चारित्र" है। शिवभूति मुनिराज को मंत्र तक का ज्ञान नहीं था मात्र गुरु पर श्रद्धान था। श्रद्धान को मजबूत बनाओ और चारित्र की ओर बढ़ जाओ, क्योंकि लगाम के बिना घोड़ा कितना भी समझदार हो उस पर सवारी करना खतरा मोल लेना है। मन रूपी घोड़े पर यदि संयम की लगाम लगाए बिना आप बैठ जाएँगे तो वह दौड़ने लगेगा आप बीच में उतर नहीं सकते। वह जहाँ ले जाएगा आपको वहाँ जाना पड़ेगा। एवं जहाँ गिराएगा वहाँ गिरना पड़ेगा।

     

    यह सुनकर किसी ने शंका व्यक्त करते हुए कहा कि- आचार्य श्री जी क्या संयम लेने के लिए पूर्णज्ञान आवश्यक है? आचार्य श्री जी ने शंका का समाधान करते हुए कहा कि- पूर्णज्ञान के बाद संयम धारण करूँगा ऐसा सोचने वालो पूर्णज्ञान तो केवलज्ञान है। केवलज्ञान के बाद क्या संयम लोगे बल्कि संयम लेने के बाद केवलज्ञान होता है। मोक्षमार्ग में पूर्णज्ञान की नहीं बल्कि पर्याप्त ज्ञान की आवश्यकता है। संयम लेने के बाद पूर्णज्ञान अपने आप प्राप्त हो जाएगा। यहाँ पर्याप्त ज्ञान से क्या तात्पर्य है ? यहाँ पर्याप्त ज्ञान का अर्थ है

     

    आचारवस्तु- अष्टप्रवचनमात का (तीन गुप्ति, पाँच समिति) का ज्ञान होना है। मति, श्रुत ज्ञान ही मोक्षमार्ग में पर्याप्त है। श्रुतज्ञान के माध्यम से हेयोपादेय का ज्ञान हो जाता है। मोक्षमार्ग में इतना ज्ञान ही पर्याप्त है। अधिक ज्ञान कभी-कभी बाधक सिद्ध हो जाता है। भरत चक्रवर्ती का अवधिज्ञान भी काम नहीं कर रहा था, मोह एवं असंयम के कारण तभी तो उन्होंने अपने भाई बाहुबलि पर चक्र चला दिया था। अंत में आचार्य श्री जी ने कहा कि- मोह, ज्ञान को विषयों की गंदगी की ओर ले जाता है। जैसे कुत्ते को साबुन से स्नान करा दो, इत्र भी लगा दो फिर उसे स्वतंत्र छोड़ दो तो वह गंदी नाली में ही जाता है। इसलिए श्रद्धान मजबूत रखो, निर्दोष चारित्र पालो, अक्षर ज्ञान कम भी हो तो भी कल्याण हो जाएगा।


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