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मेरे गुरुवर... आचार्य श्री विद्यासागर जी महाराज
  • प्रथमानुयोग

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    आजकल कुछ स्वाध्याय प्रेमी लोग प्रथमानुयोग के ग्रंथों को महत्त्व नहीं देते। वे यह कहकर टाल देते हैं कि किस्सा-कहानी मे क्या रखा है, अध्यात्म ग्रंथ ही पढ़ना चाहिए जिसमें आत्मा की चर्चा हो। लेकिन पूर्वाचार्यों के अनुसार सबसे पहले चारों अनुयोगों में प्रथमानुयोग को ही रखा है। इसी बात को लेकर किसी साधक ने आचार्य श्री जी से शंका व्यक्त करते हुए कहा कि- प्रथमानुयोग किसे कहते हैं एवं इसे सबसे पहले क्यों रखा? तब आचार्य श्री जी ने समाधान देते हुए कहा कि- जिसमें धर्म, अर्थ, काम और मोक्ष का वर्णन, आख्यान हो उसे प्रथमानुयोग कहते हैं। अनुयोग का अर्थ द्वार होता है, द्वार का अर्थ होता है खोजने का/जानने का माध्यम प्रथम का अर्थ प्रधान होता है, जो व्यापक हुआ करता है, उसे प्रधान कहते है। आत्मकल्याण का उद्देश्य रखकर प्रथमानुयोग पढ़ना-पढ़ाना सुनना -सुनाना चाहिए। संवेगनी और निर्वेदनी कथा प्रयोजन भूत है उसे हमेशा याद रखना।


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