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मेरे गुरुवर... आचार्य श्री विद्यासागर जी महाराज
  • धर्म ही सहायक है

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    देवगति का प्रकरण चल रहा था। आचार्य श्री जी ने कहा कि मरने और मारने के भाव मात्र से निधत्ति, निकाचित जैसे कर्म का बंध हो जाता है। नरकायु का बंध हो गया तो फिर वह फल दिए बिना छूटता नहीं है। इसमें देवी-देवता भी कुछ सहयोग नहीं कर सकते। तब किसी ने आचार्य श्री से शंका व्यक्त करते हुए कहा कि अग्नि परीक्षा के समय फूल वर्षा ने देवी-देवता आ गए थे लेकिन जब दण्डकारण्य में सीता अकेली भूखी, प्यासी थी लेकिन देव भी देखते रहे लेकिन कोई नहीं आये सहायता के लिए ऐसा क्यों ?

     

    आचार्य श्री जी ने शंका का समाधान करते हुए कहा कि जब तक भीतर जीव का, स्वयं का सातावेदनीय कर्म का उदय नहीं होगा तब तक सहायता करने कोई नहीं आयेगा। देव तो केवल शुभ-अशुभ घटना के साक्षी हैं। आपके पुण्य का प्रभाव होगा तो आपका भला कर सकते हैं और यदि आपका पाप का उदय होगा तो बुरा कर सकते हैं। आदिनाथ (मुनिराज) को इन्द्र ने वैराग्य दिलाने के लिए नीलांजना को प्रस्तुत कर दिया लेकिन जब मुनिराज आहारचर्या पर निकले तब देव किसी को विधि बताकर पड़गाहन नहीं करवा सके। क्योंकि उस समय मुनिराज के अन्तराय कर्म का उदय था। विधि मिलने के उपरांत जब आहार हो गये तो बाजे बजाने सभी देवतागण आ गये तो उसके पहले क्या सब बहरे हो गये थे या सो गए थे।

     

    शाप और अनुग्रह की शक्ति देवों के पास होती है, किन्तु वह आपके पुण्य और पाप के अनुरूप ही कार्य करते हैं। यदि प्रत्येक देव श्राप देने लग जाए तो फिर मुश्किल हो जाए लेकिन ऐसा नहीं होता और प्रत्येक देव यदि सहायता करने लग जाए तो सभी मालामाल हो जाए। चक्रवती भी देवों के पीछे पड़ जाए ऐसा नहीं होता और ऐसा देव कर भी नहीं सकते। इसलिए हमारे द्वारा दूसरों पर क्रुद्ध होना, रुष्ट होना यह हमारी ही आज्ञानता है, अपनी ही कमी है। अपने ही किए गए कर्म जीवन में बाधक एवं साधक सिद्ध होते हैं। इसलिए पाप को शत्रु एवं पुण्य, धर्म को ही अपना मित्र सहायक समझो अन्य किसी देवी-देवताओं को नहीं।

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