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मेरे गुरुवर... आचार्य श्री विद्यासागर जी महाराज
  • दहेज का केंसर

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    एक दिन आचार्य श्री जी ने श्रावकों को दहेज जैसी कुरुतियों को दूर करने का उपदेश देते हुए कहा कि- कन्या पक्ष वाले भी मजबूती से रहें क्योंकि आज लड़के वाले दहेज लेकर एक, दो, तीन कहकर बोली की तरह लड़की को छोड़ देते है। दहेज लेने के बाद भी लोग कहते हैं और लाओ और लाओ नहीं तो घर नहीं आओ। अब यह व्यवसाय हो गया है पर जैन समाज को कम कर देना चाहिए। विवाह के साथ दाम्पत्य जीवन का अर्थ है दोनों एक हो जाना वह दो नहीं रहे एक हो गये हैं। बंध जैसा हो जावें इस प्रकार से सम्बंध होता है। ऊपर से नहीं/ऊपर से पल्ले की गांठ बांधना विवाह नहीं होता है। आज अर्थ की ओर दृष्टि है धर्म की ओर नहीं यह कन्या दोनों कुल को यशवर्धिनी हो यह नहीं देखा जाता। आर्यिका बन जाती है तो वह त्रिलोकवर्धिनी बन जाती है पुराण-कथायें पढ़ ले तो रोमटे खड़े हो जाते हैं। कितना संघर्ष मय जीवन रहा फिर भी नारियाँ दृढ़ संकल्पी बनी रही। आज लेना देना व्यवसाय का रूप हो गया।

     

    आचार्य श्री जी ने आगे कहा कि- आज विवाह सम्बंध नहीं बल्कि व्यापार और सौदा होने लगा है। पिता-पुत्र आपस में सलाह करके कन्या पक्ष वालों को धन के लालाच में बातों ही बातों में घुमाते रहते हैं। पिता कहता है- बेटा से बात कर लो और स्वयं ने बेटे से कह दिया कि- कह देना पिता से बात कर लो। बोलियों की तरह धन की मांग बढ़ती ही चली जाती है। कभी-कभी अखबारों में पढ़ने को मिलता है कि- कई कन्याएँ जल कर मर जाती हैं। तब लगता है कि राम, महावीर के अनुयायी ऐसा क्यों कर रहे हैं? ऐसा करने वालों की धन-सम्पत्ति आगे चलकर उन्हीं को अभिशाप बन जावेगी। आज दोनों पार्टियाँ 5 स्टार होटल में जाने लगी हैं। अपना बेटा एवं कन्या दोनों सुखी रहें ऐसा कुछ करना चाहिए। जब दोनों सुखी रहेंगे तब दहेज की आवश्यकता ही नहीं पड़ेगी।

     

    आचार्य श्री जी ने कहा कि- शादी-विवाह में जो व्यर्थ का धन लुटाते रहते हैं उस धन का यदि गरीबों के विवाह कराने में सदुपयोग करें तो बहुत अच्छा होगा। इससे सधर्मी जनों के प्रति सहयोग एवं वात्सल्य की भावना बनेगी। दान का प्रारूप बनेगा और कहीं कुरीतियाँ नष्ट हो जावेगी। यदि इस धन से एक अस्पताल खुलवाते हैं तो आपका नगर में अच्छा प्रभाव पड़ सकता है एवं कई लोगों का भला भी हो सकता है। यदि दहेज आदि से प्राप्त धन को घर में ही रखें रहोगे तो कोई बहुत बड़े धनवान नहीं बन जाओगे। यदि इस भावना को अच्छा समझते हो तो धन का सदुपयोग करना चाहिए। अंत में आचार्य श्री जी ने कहा कि- दहेज लेने का अर्थ है दूसरे के हाथों का मैल खाना आप ही लोग कहते हैं कि- धन तो हाथों का मैल है, लेकिन जब तक मन का मैल (लोभ) नहीं छोड़ोगे तब तक हाथों का मैल (दहेज) धन लेना नहीं छूट सकता। एक बात हमेशा याद रखो दहेज कैंसर से भी भयानक रोग है।


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