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मेरे गुरुवर... आचार्य श्री विद्यासागर जी महाराज
  • शुद्धोपयोग की चर्चा चल रही थी। आचार्य श्री जी हम सभी को उपदेश दे रहे थे कि साधु जीवन की सार्थकता शुद्धोपयोग प्राप्त करने में है। पाप का त्याग एवं व्रतों का ग्रहण यह सब शुभोपयोग है इससे ऊपर की भी प्रक्रिया होती है जब साधु सब विकल्पों से मुक्त होकर निर्विकल्प समाधि में लीन होता है। यह अवस्था सप्तम गुणस्थान से प्रारंभ होती है। जिनवाणी में शुद्धोपयोग सातवें गुणस्थान से लेकर बारहवें गुणस्थान तक बताया है।

     

    एक दिन मैंने आचार्य गुरुवर से पूछा कि-हे गुरुवर! आज कल कुछ लोग अपने आप को सम्यग्दृष्टि एवं चतुर्थ गुणस्थानवर्ती मानते हैं। चतुर्थ गुणस्थानवर्ती को शुद्धोपयोग होता है ऐसा भी मानते हैं। यह क्या उचित है? तब आचार्य श्री जी ने हँसते हुए कहा कि यह तो आगम विरुद्ध बात हुई ऐसे लोगों को चतुर्थ गुणस्थानवर्ती नहीं बल्कि चतुर गुणस्थानवर्ती मानो। यह है आचार्य महाराज का दृष्टिकोण सामने वाले की चतुराई भी समझ गए और उसे बता भी दिया, लेकिन उसकी निंदा नहीं की बस यही दृष्टिकोण हम सभी धर्मात्माओं का होना चाहिए।


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