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मेरे गुरुवर... आचार्य श्री विद्यासागर जी महाराज
  • भेंट और दान में अंतर

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    सन् 2005 में बीना बारहा अतिशय क्षेत्र पर चातुर्मास चल रहा था। रविवारीय प्रवचन के दिन गुरुवर के साथ सारा मुनि संघ विराजमान था। जब शास्त्र दान का समय आया तब मंच संचालक ने एक श्रावक श्रेष्ठी को आमंत्रित करते हुए कहा कि- आप आयें और आचार्य श्री जी के कर कमलों में शास्त्र भेंट करें। तब आचार्य श्री जी ने हम सभी मुनिराजों की ओर हाथ का इशारा करते हुए कहा- आप लोग इन श्रावकों को बता दिया करो कि शास्त्र भेंट नहीं किया जाता, बल्कि दान किया जाता है। मुनिराजों को श्रीफल भी भेंट नहीं किया जाता बल्कि चढ़ाया जाता है, अर्घ की भांति अर्पित-समर्पित किया जाता है। तब मैंने गुरुवर से शंका व्यक्त करते हुए कहा- हे गुरुवर! भेंट और दान में क्या अंतर होता है? स्पष्ट करने की कृपा करें। तब गुरुवर ने शंका का समाधान करते हुए कहा कि- जो लेते हैं उनके लिए देना भेंट कहलाता है जैसे- राजा, मेहमान, मित्र आदि को वस्तु देना।

     

    ज़ो कुछ लेते नहीं हैं, उन्हें देना दान कहलाता हैं। जैसे मुनिराज आदि को आहारादि दान देना। मुनिराजों को श्रीफल आदि भेंट नहीं किया जाता बल्कि उनके श्री चरणों में चढ़ाया/समर्पित किया जाता है। शास्त्र भी उन्हें भेंट नहीं करते बल्कि शास्त्र का दान या शास्त्र प्रदान किया जाता है।


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