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मेरे गुरुवर... आचार्य श्री विद्यासागर जी महाराज
  • क्रेन के साथ ब्रेन भी

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    यह बात उस समय की है जब सर्वोदय तीर्थ अमरकण्टक में 4 नवम्बर 2003 के दिन श्री आदिनाथ जी की प्रतिमा को नये निर्माणाधीन मंदिर की वेदी पर विराजमान करने के लिए यथा स्थान पर लाया जा रहा था। चूंकि प्रतिमाजी अष्टधातु से निर्मित होने से उसका वजन 24 टन था इसलिए उसे उठाने के लिए बहुत बड़ी क्रेन लायी गई थी। तीन मोटी लौह रस्सियों में जकड़कर प्रतिमा को उठाने का प्रयास किया जा रहा था, तीनों रस्सियों के माध्यम से संतुलन बनाया जा रहा है। इस दृश्य को आचार्य श्री सहित सारा संघ देख रहा था। आचार्य महाराज ने कहा देखो पहले भी इतनी बड़ी-बड़ी प्रतिमायें स्थापित की जाती थीं, पहले के लोग कैसे इतनी बड़ी प्रतिमायें उठाकर रखते होंगे। शिष्य ने कहा जी आचार्य श्री पहले क्रेन तो थी ही नहीं। आचार्य गुरूदेव ने कहा - हाँ क्रेन नहीं थी लेकिन उस समय ब्रेन (दिमाग) तो था। शिष्य - हाँ आचार्य श्री ब्रेन से ही क्रेन बनी है। आचार्य श्री ने कहा - भैया क्रेन से काम लेने के लिए भी ब्रेन की आवश्यकता होती है, प्रत्येक कार्य को सफल करने के लिए। बाह्य साधन के साथ-साथ बुद्धि की भी आवश्यकता होती है।

     

    जब प्रतिमा जी को उठाया गया तब तीनों लौह रस्सियों को पूर्ण संतुलित करके उठाया गया, आचार्य श्री बोले - केवली भगवान भी जब अन्त में ऊर्ध्वगमन करते हैं तो तीनों योगों को संतुलित करना पड़ता है। ऊर्ध्वगमन तो एक समय में होना है, लेकिन उससे पहले योग–निरोध रूप आयाम करना पड़ता है।

     

    शुद्धोपयोग, साधु बने बिना नहीं हो सकता ।

    योग और उपयोग के कारण ही गुणस्थान बनते हैं ।।

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