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मेरे गुरुवर... आचार्य श्री विद्यासागर जी महाराज
  • "आशीर्वाद"

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    चाहे वह साधक हो, या श्रावक हो, प्रत्येक की भावना यही रहती है कि जब हम अपने गुरूवर को नमोस्तु निवेदित करें तभी गुरू महाराज की दृष्टि हमारी ओर हो और उनका आशीर्वाद का हाथ उठा हुआ हो। जब तक आचार्य श्री की दृष्टि नहीं उठती और आशीर्वाद का हाथ नहीं उठता तब तक किसी भी शिष्य व भक्त को आत्मसंतुष्टि नहीं होती और यदि गुरूवर की दृष्टि आशीर्वाद का हाथ उठ जाता है तो वह गद्गद् हो उठता है एवं अपने को धन्य मानता है। कई भक्त तो तब तक नमोस्तु-नमोस्तु बोलते रहते हैं कि जब तक आचार्य श्री आशीर्वाद का हाथ न उठा दें।

     

    एक बार किसी भव्यात्मा को नमोस्तु करने के उपरान्त आचार्य श्री का आशीर्वाद नहीं मिला, तब उन्होंने आचार्य भगवंत से कहा कि - आचार्य श्री कई बार आपका आशीर्वाद नहीं मिलता तो आकुलता होती है। आचार्य श्री ने सहजता से उत्तर दिया कि नमोस्तु करते समय आप लोगों का सिर नीचे रहता है, इसलिए आशीर्वाद का हाथ उठता भी होगा तो आप लोगों को दिखता नहीं है। अपने श्रद्धान को मजबूत बनाईये, गुरु का आशीर्वाद तो चाहे प्रत्यक्ष या परोक्ष हो वह हमेशा रहता है। आचार्य श्री ने उदाहरण देते हुए समझाया कि जब आपकी अच्छी, जैसा आप चाहते थे वैसी फोटो खिंच गई हो तो आप अपने पास रख लेते हैं, वैसे ही आशीर्वाद की एक बार की मुद्रा को अपनी धारणा में रख लो और उसी को स्मृति में लाते रहें।

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