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मेरे गुरुवर... आचार्य श्री विद्यासागर जी महाराज
  • स्वर्ग के देवी-देवताओं का प्रकरण चल रहा था। किसी सज्जन ने आचार्य श्री से शंका व्यक्त करते हुए कहा कि - आचार्य श्री जी आप देवी देवताओं को मानते हैं या नहीं ? आचार्य श्री जी ने कहा - हाँ, मैं मानता हूँ, क्यों नहीं मानूगां। जैसा उनका स्वरूप आगम ग्रंथों में कहा है, उस रूप में मानता हूँ। देव चार प्रकार के होते हैं, असयंमी होते हैं। इसी रूप में मानते हैं। वे तो असंयमी हैं उनका क्या आदर करना, उनका आदर करना महान भूल है। आगम में जिसका जो स्वरूप कहा गया है उसे उसी रूप में स्वीकारना चाहिए। वरना सच्चे देव देवाधिदेव की आसादना हो जावेगी। संयमी ही पूज्यनीय होते हैं। असयंमी देव पूजने के योग्य नहीं हैं।


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