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मेरे गुरुवर... आचार्य श्री विद्यासागर जी महाराज
  • अन्तर का भेद नहीं

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    जहाँ कलकल बहती रेवा नदी के तट पर एक ओर पक्षियों का मधुर कलरव सुनाई देता है, वहीं दूसरी और सूर्य का आगमन भक्तों के मन में प्रभु के प्रति आस्था को मजबूत करता है। बहता हुआ निर्मल जल भक्त के हृदय को निर्मल बनाने का संकेत देता है। वहाँ पर नदी के तट पर सिद्धोदय सिद्धक्षेत्र नेमावर है।

     

    इसी सिद्धोदय सिद्धक्षेत्र नेमावर में आचार्य श्री के सान्निध्य में समयसार की कक्षा चल रही थी तभी एक प्रसंगवश आचार्य श्री जी ने कहा - जगत्काय स्वभावौ वा संवेग वैराग्यार्थं (संवेग और वैराग्य के लिए जगत् और शरीर के स्वभाव का विचार करना चाहिए) यह एक ही सूत्र काफी है और यही कापी है। यह कापी कभी गीली नहीं होती है। तब एक महाराज जी ने कहा कि इसको रखने के लिए बस्ता की एवं फोटो कापी की आवश्यकता नहीं होती। इसी प्रसंग के समय वहाँ एक पंडित जी भी उपस्थित थे, उन्होंने कहा इतने बड़े संघ के दर्शन मिलना बड़े ही सौभाग्य की बात है, पुण्य की बात है, इसमें आचार्य श्री तो ओरीजनल हैं एवं सभी महाराज फोटोकापी हैं। तब आचार्य श्री जी की अन्तर्दृष्टि कह उठी - अन्तर का भेद नहीं - पं. जी ध्यान रखना ये सभी ओरिजनल कापी हैं। डुप्लीकेट नहीं समझना। एकदम असली कापी हैं। हमारे आचार्य महाराज इतने महान् होकर भी अपने शिष्यों को अपने समान समझते हैं। यही तो उनकी अन्तरदृष्टि का जीता जागता उदाहरण है।

    (नेमावर)


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