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मेरे गुरुवर... आचार्य श्री विद्यासागर जी महाराज
  • श्रेष्ठ-साधना

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    मुक्तागिरि का चातुर्मास पूरा हुआ। संघ-सहित आचार्य महाराज ने रामटेक की ओर विहार किया। रास्ते में एक दिन अम्बाड़ा गाँव पहुँचते-पहुँचते अँधेरा घिर गया। सारा संघ गाँव के समीप एक खेत में ठहर गया। खेत में ज्वार के डंठलों से बना एक स्थान था। रात्रि विश्राम यहीं करेंगे, ऐसा सोचकर सभी ने प्रतिक्रमण किया और सामायिक में बैठ गए।

     

    दिसम्बर के दिन थे। ठंड बढ़ने लगी। रात में नौ बजे जब श्रावकों को मालूम पड़ा कि आचार्य महाराज खेत में ठहरे हैं तो बेचारे सभी वहाँ खोजते-खोजते पहुँचे। जो बनी सो सेवा की। स्थान एकदम खुला था, नीचे बिछे डंठल कठोर थे। इस सबके बावजूद भी आचार्य महाराज अपने आसन पर अडिग रहे। किसी भी तरह से प्रतिकार के लिए उत्सुकता प्रकट नहीं की। लगभग आधी रात गुजर गई। फिर दिन भर के थके शरीर को विश्राम देने के लिए वे एक करवट से लेट गए। उनके लेटने के बाद ही सारा संघ विश्राम करेगा, ऐसा नियम हम सभी संघस्थ साधुओं ने स्वतः बना लिया था, सो उनके उपरान्त हम सभी लोग लेट गए।

     

    ठंड बढ़ती देखकर श्रावकों ने समीप में रखे सूखे ज्वार के डंठल सभी के ऊपर डाल दिए। सब चुपचाप देखते रहे, किसी ने कोई प्रतिक्रिया व्यक्त नहीं की। लोग यह सोचकर निश्चिन्त हो गए कि अब ठंड कम लगेगी, पर ठंड तो उतनी ही रही, डंठल का बोझ और चुभन अवश्य बढ़ गई।

     

    उपसर्ग व परीषह के बीच शान्त-भाव से आत्म-ध्यान में लीन रहना ही, सच्ची साधुता है, सो सभी साधुजन चुपचाप सब सहते रहे। सुबह हुई। लोग आए। डंठल अलग किए। हमारे मन में आया कि श्रावकों को उनकी इस अज्ञानता से अवगत कराना चाहिए, पर आचार्य महाराज की स्नेहिल व निर्विकार मुस्कुराहट देखकर हमने कुछ नहीं कहा। मार्ग में आगे कुछ दूर विहार करने के बाद आचार्य महाराज बोले कि-‘देखो, कल सारी रात कैसा कर्म-निर्जरा करने का अवसर मिला, ऐसे अवसर का लाभ उठाना चाहिए।' हम सभी यह सुनकर दंग रह गए। मन ही मन अत्यन्त श्रद्धा और विनय से भरकर उनके चरणों में झुक गए। आज कर्म-निर्जरा के लिए तत्पर ऐसे रत्नत्रयधारी साधक का चरण सानिध्य पाना दुर्लभ ही है।

    अम्बाड़ा (१९८o)


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