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मेरे गुरुवर... आचार्य श्री विद्यासागर जी महाराज
  • परीषह-विजय

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    आचार्य महाराज का उन दिनों बुन्देलखण्ड में प्रवेश हुआ था। उनकी निर्दोष मुनि-चर्या और अध्यात्म का सुलझा हुआ ज्ञान देखकर सभी प्रभावित हुए। कटनी में आए कुछ दिन ही हुए थे कि महाराज को तीव्र ज्वर हो गया। पं० जगन्मोहनलाल जी की देखरेख में उपचार होने लगा। सतना से आकर नीरज जी भी सेवा में संलग्न थे। एक दिन मच्छरों की बहुलता देखकर पंडित जी ने रात्रि के समय महाराज के चारों ओर पूरे कमरे में मच्छरदानी लगवा दी।

     

    सुबह जब महाराज ने मौन खोला तो कहा कि यह सब क्या किया ? पंडित जी! संसारी प्राणी अपने शरीर के प्रति अनुरागवश ऐसे ही तर्क देकर उसकी सुरक्षा में लगा है और निरन्तर दुखी है। मोक्षार्थी के लिए ऐसी शिथिलता से बचना चाहिए और परीषह-जय के लिए तत्पर रहना चाहिए। कर्म-निर्जरा तभी संभव होगी।' पंडित जी क्या कहते ? विनत भाव से आगम के अनुरूप आचरण करने वाले, परीषहविजयी, शिथिलताओं से दूर और कर्म-निर्जरा में तत्पर आचार्य महाराज के चरणों में झुक गए और सदा के लिए उनके भक्त हो गए।

    कटनी (१९७६)


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