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मेरे गुरुवर... आचार्य श्री विद्यासागर जी महाराज
  • निर्दोष - चर्या

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    आचार्य-महाराज आहार-चर्या के लिए निकले थे। चलते-चलते निमिषमात्र में मानो उन्होंने सारे परिवेश को देख लिया और धीमे, सधे हुए कदमों से, वे आगे बढ़ रहे थे। मैं उनकी इस सहज सजगता को देखकर चकित था। सब ओर से एक ही आवाज आ रही थी कि, ‘‘भी स्वामिन! यहाँ पधारे, यहीं ठहरें। आहार-जल शुद्ध है।” सोच रहा था कि यह श्रद्धा और प्रेम से दी जाने वाली भिक्षा अनूठी है। देने वाला अपना सर्वस्व देने के लिए उत्सुक है, पर पाने वाला इतना निश्चिंत है कि पाने योग्य जो है, वह उसके पास हमेशा से है। उसे अन्यत्र कहीं और कुछ और नहीं पाना। मात्र इस देह के निर्वाह और तप की वृद्धि के लिए जो मिलना है वह मिलेगा, उसे मिलना नहीं है। प्रासुक आहार की मात्र गवेषणा है, आतुरता नहीं है।

     

    देखते-देखते एक अतिथि की तरह, घर के द्वार पर द्वारापेक्षण के लिए खड़े श्रावकों के समीप, उनका ठहर जाना और आनन्द-विभोर होकर लोगों का उन्हें श्रद्धा भक्ति से प्रतिग्रहण कर भीतर ले जाना, उच्च स्थान पर बिठाना, पाद-प्रक्षालन करके चरणोदक सिर-माथे चढ़ाना, पूजा करना और मन, वचन, काय तथा आहार-जल की शुद्धि कहकर उन्हें विश्वस्त करना; झुककर नमोऽस्तु निवेदित करके आहार-जल ग्रहण करने की प्रार्थना करना; यह सब इतने सहज व्यवस्थित ढंग से होता रहा कि मैं मंत्र-मुग्ध सा एक ओर खड़े-खड़े देखता ही रह गया।

     

    सुना था कि आहार में वे रस बहुत कम लेते हैं। सो देख रहा था कि ऐसा कौन-सा रस उनके भीतर झर रहा है, जो बाहर के रस को गैरजरूरी किए दे रहा है। एक गहरी आत्म-तृप्ति जो उनके चेहरे पर बरस रही है वही भीतरी-रस की खबर दे रही थी और मैं जान गया कि रस सब भीतर है। ये भ्रम है कि रस बाहर है। तभी तो बाहर से लवण का त्याग होते हुए भी उनका लावण्य अद्भुत है। मधुर रस से विरक्त होते हुए भी उनमें असीम माधुर्य है। देह के दीप में तेल (स्नेह) न पहुँचने पर भी उनमें आत्मस्नेह की ज्योति अमंद है। सारे फल छोड़ देने के बाद भी हम सभी लोगों के लिए, वे सचमुच, बहुत फलदायी हो गए हैं।

     

    उनकी संतुलित आहार-चर्या देखकर लगा कि शरीर के प्रति उनके मन में कोई गहन अनुराग नहीं है। वे उसे मात्र सीढ़ी मानकर आत्मा की ऊँचाइयाँ छूना चाहते हैं। शरीर धर्म का साधन है। उनकी कोशिश उसे समर्थ बनाए रखकर शान्तभाव से आत्म-साधना करने की है। सोच रहा था कि शरीर को इस तरह आत्मा से अलग मानकर उसका सम्यक्र उपयोग करना कितना सार्थक, किन्तु कितना दुर्लभ है।

     

    मैने देखा कि एक सच्चे साधक की तरह वे आहार ग्रहण के समस्त विधि-विधान का पालन सहज ही कर लेते हैं। गर्तपूरण की तरह जैसे गड्ढे को भरने के लिए किसी विशिष्ट पदार्थ का आग्रह नहीं होता, ऐसे ही शरीर की जरूरत पूरी करने के लिए किसी विशिष्ट/स्वादिष्ट भोज्य पदार्थ का आग्रह उनके मन में नहीं है। अक्षमृक्षण की तरह जैसे गाड़ी चलते समय आवाज न करे और धुरी ठीक से काम करती रहे, इसलिए कोई चिकना पदार्थ उस पर लगा दिया जाता है, ऐसे ही जीवन की यात्रा निबंध चलती रहे और ठीक काम करती रहे, इसलिए योग्य आहार वे ग्रहण करते हैं।

     

    अग्निशमन के लिए जैसा खारा व मीठा कोई भी जल पर्याप्त है, ऐसे ही क्षुधा-तृषा की तपन को शान्त करने के लिए सरस-नीरस जो भी उपलब्ध निर्दोष आहार मिलता है, उसे शान्त भाव से ग्रहण कर लेते हैं। एक गाय की तरह जो बगीचे में जाकर भी विविध फूलों के सौन्दर्य या अपने लिए दाना डालने वाले के रूप-लावण्य को नहीं देखती और चुपचाप घास खाकर लौट जाती है, ऐसे ही वे भी श्रावक के बाह्य वैभव से अप्रभावित रहकर चुपचाप पाणिपात्र में दिए गए प्रासुक आहार का शोधन करके दिन में एक बार खड़े होकर उसे ग्रहण करते हैं। यह गोचरी वृत्ति है।

     

    आहार पूरा होने पर लोगों का आनंदित होना और जय-जयकार के बीच उनका इस सबसे निलिप्त रहकर मुस्कराते हुए लौटना, अनायास ही साधु की भ्रामरी वृत्ति का स्मरण करा देता है। भ्रमर जिस तरह गुनगुनाता हुआ आता है और फूल से पराग लेकर जैसे उसे हर्षित करके लौट जाता है, ऐसे ही वे आत्मसंगीत में निमग्न होकर अत्यन्त निलिप्त भाव से आहार ग्रहण करते हैं और श्रावक को हर्षित करके लौट आते हैं।

     

    उनके आहार ग्रहण करके लौटने के बाद जाने कितनी देर तक मैं वही सिर झुकाए खड़ा रहा, जब ख्याल आया तो देखा कि वे बहुत आगे/बहुत दूर निकल गए हैं। इतने आगे कि उन तक पहुँचने के लिए मुझे पूरी जिन्दगी उनके पीछे चलना होगा।

    कुण्डलपुर(१९७६)


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