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मेरे गुरुवर... आचार्य श्री विद्यासागर जी महाराज
  • निग्रन्थ

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    आचार्य महाराज अपने संघ सहित द्रोणागिरि में विराजे थे। बड़ी मनोरम जगह है। सिद्ध क्षेत्र है। पर्वत पर प्राचीन जिनालय है। नीचे तलहटी में व्रती आश्रम व चौबीसी मन्दिर है। वणजी ने कभी इसे 'छोटा सम्मेदशिखर' कहा था। आचार्य महाराज सहित सारा संघ पर्वत पर ही आत्म-साधना में लीन रहता था। आहार-चर्या के लिए नीचे आना और चर्या के उपरान्त वापस पर्वत पर लौट जाना, रोज का क्रम था। आचार्य महाराज ने यहाँ रहकर प्रतिदिन तपती-दुपहरी में तीन-तीन घंटे शिलातल पर सूर्य की प्रखर किरणों के नीचे बैठकर ध्यान किया और सारे संघ को साधना के साथ-साथ अध्यात्म की शिक्षा भी दी।

     

    उन दिनों संघ में आचार्य महाराज के शिष्यों में हम सभी ऐलक क्षुल्लक ही थे। अभी मुनि-दीक्षा किसी को नहीं मिली थी। एक दिन सुबह अचानक मालूम पड़ा कि ऐलक श्री समयसागरजी केशलुचन कर रहे हैं। हम सब सोच में पड़ गए कि क्या बात है ?अभी केशलुचन करके दो माह भी पूरे नहीं हुए। पर अगले ही क्षण हम निश्चिन्त होकर अपने ध्यान-अध्ययन में लग गए और सोचा कि जो भी होगा सामने आएगा। असल में, आचार्य महाराज के साथ यही तो मजा है कि भविष्य में क्या होगा, इस चिन्ता से मुक्त रहकर वर्तमान में जीने की शिक्षा मिलती है। तब जो भी होता है, सुखद होता है।

     

    लगभग नौ बजे अत्यन्त सादगी से, बिना किसी आडम्बर व प्रदर्शन के, आचार्य श्री के द्वारा प्रथम मुनि दीक्षा सम्पन्न हुई। हम सभी ने आचार्य महाराज द्वारा दीक्षित प्रथम निग्रन्थ श्रमण मुनि समयसागर जी की चरण वंदना की और अत्यन्त आत्म-विभोर हो उठे। इतने में आचार्य महाराज स्वयं आकर हमारे बीच खड़े हो गए और बोले-‘क्या बात है ? सभी बहुत खुश हो।' हमने कहा कि-‘‘ आज बहुत अच्छा लग रहा है। निग्रन्थ होना अत्यन्त आनन्द की बात है।” वे मुस्करा कर बोले-‘आत्मविकास के लिए यही उत्साह कल्याणकारी है।' हम सभी उनकी इस आश्वस्ति और प्रसाद से अभिभूत हो गए। आज जब कभी यह घटना याद आती है तो सोचता हूँ कि दूसरे जीवों के हित का मुख्य रूप से प्रतिपादन करने वाले, आर्य पुरुषों के द्वारा सेवनीय प्रधान निग्रन्थ आचार्य ऐसे ही होते होंगे। वर्षों पूर्व पूज्यपाद स्वामी के मन में ऐसे ही आचार्य की छवि बनी होगी, तभी तो उन्होंने लिखा होगा -

    'परहित-प्रतिपादनैक-कार्यमार्य-निषेव्यं निग्रीन्थाचार्यवर्यम्।।'

    द्रोणगिरि (मार्च, १९८o)

     


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