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    स्वावलम्बी

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    स्वा का आलम्बन धर्म की प्रथम मंजिल की प्रतीति करता हुआ जगत् की रीति से भिन्नता का दर्शमान बिम्ब का रेखाचित्र खींचने वाला हृदयगत कला का जानकार ज्ञात होता है। अपने आश्रित कार्य की पद्धति याचक वृत्ति से दूर रख अन्तर्मुखी दृष्टि में बनाने की सहयोगी कारण हासिल होता है। ब्रह्मचारी भूरामल, पण्डित भूरामल इन्हें अपने ही हाथ से कमाना, अपने हाथ से पकाना, खाना, हितकारी सिद्ध कार्य जान पड़ता था। दूसरों के पैसों से ज्ञान के पुण्य को अर्जित करने में पुरुषार्थ हीनता का अनुभव जान पड़ता था। यदि मर्द हो तो हाथ-पैर को चलाकर श्रम की साधना से अर्थ को प्राप्त कर स्वाभिमानीपने का अनुभव ही स्वाश्रित जीवन का स्वावलम्बी कार्यपना प्रकट हुआ जान अपनी उस विशिष्ट माँ जैन भारती यही जैनत्व के संस्कार को जन्म देने वाली वास्तविक माँ, सच्ची और बहुत अच्छी जो जन्मदात्री माँ से आगे चलकर भव विनाशक माँ के रूप में। दर्शमान प्रकटमान होती हुई जान पड़ती है। इसी के कारण लोभ की वृत्ति छूटी, निर्लोभता का वृत भूरामल के रग-रग में समाहित होता हुआ निस्पृही जीवन जीने की साधना पद्धति का गम्यमान, अगम्यमान, रहस्यमान, छिपी हुई तस्वीर की तकदीर का एक प्रतिमान साबित होता है।

     

    वो अपने ही माँ से जन्मे बड़े भाई के भी आश्रित रहना पसन्द नहीं करते थे, न ही नाते-रिश्तेदारों के, न अपने पिता की सम्पत्ति। जो आनन्द अपने पसीने की कमाई के द्वारा प्राप्त होने वाला है वह पर की रोटी से, पर के कपड़े से नहीं मिलने वाला। वे ब्रह्मचारीजी रोटी, कपड़ा, मकान इन सबसे ऊपर उठकर कुछ करने के लिए कटिबद्ध थे। वे अपने आवश्यक भी स्व आश्रित ही किया करते थे। कण्ठ की विद्या ने उन्हें आलम्बन से दूर कर स्वालम्बन की ओर बढ़ने के लिए। प्रोत्साहित किया। उनके बड़े भाई भी पर के आश्रित नहीं थे। स्व केआश्रित ही थे। तब मैं पर के आश्रित कैसे हो सकता हूँ? व्रतों की पालना भी पर के नहीं, स्व के आश्रित ही चलती है। ऐसी धारणा के धनी पण्डित भूरामल थे।

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