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    शुद्धि विचार

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    वे पूज्य श्री जितने अंतरंग में उतरे थे उतने ही बाह्य क्रिया चर्या में गहरे उतरे थे। आभ्यन्तर तप का आधार बाह्य तप है ऐसा आगम वाक्य ग्रंथों में प्रतिपादित है। वे आगम की पटरी पर चलने वाले साधक थे। सोला-शुद्धि की ओर उनकी दृष्टि भी गहरी थी वे कागज को अशुद्ध मानते थे और उसे फाड़ने चीरने में हिंसा भी मानते थे जिसे आगम की भाषा में अजीवकृत असंयम कहा है।

    | इसलिए वे शुद्धि के समय कागज को छूते नहीं थे क्योंकि काया शुद्धि में दोष लगता था। वैसे तो वे किसी से नहीं डरते थे लेकिन दोषों से अवश्य डरते थे, वे निर्दोष व्रतों के पालन में बहुत चतुर थे। अल्प को पाने के लिए वे बहुत को नहीं खोते थे। आज कागज चौके में घुस गया अब सब प्रारम्भ हो गया। एक बार उन्होंने ऐसा भी कहा था कि वर्तमान में द्रव्य शुद्धि चतुर्थ काल जैसी है किन्तु भावशुद्धि छटे काल से भी आगे बढ़ गई है।

     

    ०२.०६.१९९९, बुधवार

    नेमावर (म.प्र.)

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