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मेरे गुरुवर... आचार्य श्री विद्यासागर जी महाराज
  • १०८. सन्तों के सिरमौर

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    जिनवरों में प्रधान कोई रहे तो वे आदिनाथ भगवान् हैं, जो देवेन्द्रों के भी इन्द्र देवेन्द्र के द्वारा या यूँ कहो इन्द्रों के समूह के द्वारा पूजित हैं, वंदित हैं हमेशा-हमेशा के लिए। इसी प्रकार इस युग में आचार्य विद्यासागर महाराज मुनियों के, श्रावकों के, श्राविकाओं के, जैनों के, जैनेत्तरों के द्वारा पूजित हैं, वंदित हैं। कोई ऐसे भी श्रावक होते हैं जो सभी मुनियों को नमस्कार न करे, माने ना लेकिन आचार्यश्री को जरूर मानेगा और नमस्कार करेगा। शास्त्र में एक बात आती है, यदि आचार्य परमेष्ठी से कोई गलती या अपराध बन बैठे तो प्रश्न खड़ा होता है वह अपने पापों का परिमार्जन कैसे करेगा या किससे प्रायश्चित लेगा तो समाधान में यही कहा गया है, जिस आचार्य परमेष्ठी की सम्पूर्ण समाज, देशभर में मान्यता, पूज्यता का क्रम चल रहा हो, वही प्रायश्चित देने का अधिकारी होगा, वही सामाजिक, राष्ट्रीय, समस्याओं का समाधान करने वाला होगा। व्यक्तिगत अन्य जैन दिगम्बर संघियों की समस्याओं का भी समाधान करने वाला होगा। अन्य संघ के साधुगण भी अन्तिम क्षणों को व्यतीत कर ऐसे ही आचार्य को निर्यापकाचार्य बनाकर समाधिमरण का भाव रखेगा, अन्य मतावलम्बी, वैष्णव साधु भी इन ५० वर्षों में आचार्यश्री से प्रभावित रहे। झोतेश्वर पीठाधीश के शंकाराचार्य स्वामी स्वरूपानन्द ने अमरकंटक के प्रथम प्रवास के समय कल्याणदास बाबा को पत्र लिखा, आचार्य विद्यासागर जैन समाज के, जैन जगत् के सुलझे हुए साधुओं में एक सिरमौर संत हैं। आप इनकी सेवा में अवश्य पधारें। तब सुनकर लगा आचार्य गुरुदेव इन ५० वर्षों में जैन जगत् के सिरमौर साधु बन गये।


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