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मेरे गुरुवर... आचार्य श्री विद्यासागर जी महाराज
  • पत्र क्रमांक - ८२ माँ श्रीमन्ती ने चौका लगाया अजमेर में, मित्र ने अलौकिक मित्र से लिया आजीवन ब्रह्मचर्य व्रत एवं मित्र मारुति ने सबके रोगटे खड़े कर रूला दिया

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    २५-०३-२०१६

    खान्दू कॉलोनी, बाँसवाड़ा (राजः)

     

    ममता को समता में ढालने वाले गुरुवर श्री ज्ञानसागर जी महाराज के चरणों में त्रिकाल नमोस्तु... ।

    हे गुरुवर! आपको पिछले पत्र में बताया था कि मल्लप्पा जी ने बड़े पुत्र को और परिवार को चौका लेकर अजमेर चलने की बात कहकर तैयारी करने की बात कही थी, आज मैं वह बात लिख रहा हूँ जब मल्लप्पा जी सपरिवार सदलगा से अजमेर आए थे और उन्होंने बड़ी ही नवधाभक्ति के साथ आहारदान दिया था। इस सम्बन्ध में अग्रज भाई महावीर जी ने बताया

     

    माँ श्रीमन्ती ने चौका लगाया अजमेर में

    "कई जन्मों के पुण्यार्जन के उदय से हम सभी १५ जुलाई १९६८ को सदलगा से अजमेर के लिए निकले। दादी का स्वास्थ्य ठीक न होने के कारण वो चाचा के पास रहीं। माता-पिता छोटे भाई अनन्तनाथ एवं शान्तिनाथ दोनों छोटी बहनें शान्ता-सुवर्णा और विद्याधर के मित्र मारुति के साथ मैं अजमेर पहुँचा। अजमेर में समाजजनों ने माणिकचन्द्र जी सोगानी (एडवोकेट) के ऑफिस के ऊपर खाली कक्ष में हम लोगों को रुकाया। वहीं पर शुद्ध भोजन बनाने की व्यवस्था बनाई। दोपहर में हम सभी ने सोनी जी की नसियाँ में विराजमान ज्ञानमूर्ति गुरुदेव ज्ञानसागर जी महाराज के दर्शन किए और निवेदन किया कि हम सभी कुछ दिन यहाँ रहेंगे, शुद्ध भोजन बनाकर करेंगे और साधुओं को आहार दान भी देंगे, आप सभी आशीर्वाद प्रदान करें। तब मुनि विद्यासागर जी बोले- ‘इतनी दूर क्यों आए ? आहार दान देने के लिए क्या वहाँ कोई साधु नहीं मिले?' तब माँ बोली- 'नये मुनि महाराज को भी तो आहार देना पड़ता है ना।' तब हँसते हुए मुनि श्री विद्यासागर जी बोले- ‘अरे इस शरीर को तो २० साल तक खिलाया है अभी तक मन संतुष्ट नहीं हुआ।' तब पिता जी बोले- ‘अभी तक तो बेटे के शरीर को खिलाया। अब मुनि महाराज को आहार दान देना है।

     

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    प्रथम दिन पड़गाहन में सौभाग्य जागा और परमपूज्य गुरुदेव श्री ज्ञानसागर जी मुनि महाराज का पड़गाहन किया, नवधाभक्ति से आहार कराया। ज्ञानसागर मुनि महाराज ने हमारे दक्षिण का भोजन हँसते हँसते ग्रहण किया। आहार के पश्चात् पिच्छिका भेंट की तब माता-पिता दोनों ने गुरु महाराज से पूर्ण ब्रह्मचर्य व्रत ले लिया। दूसरे दिन पड़गाहन में क्षुल्लक सन्मतिसागर जी महाराज आए, तीसरे दिन क्षुल्लक सुखसागर जी महाराज आए, चौथे दिन ब्रह्मचारी भैया जी जमुनालाल जी आए। पाँचवाँ-छटवाँ दिन खाली गया। सातवें दिन पुनः सौभाग्य जागा और नये मुनिराज श्री विद्यासागर जी मुनि महाराज का पड़गाहन हुआ और नवधाभक्ति से आहार कराया। आहारदान की अनुमोदना करने हजारों लोगों की भीड़ एकत्रित हो गयी।

     

    आहार में माँ और बहिनों ने दक्षिण के विशेष व्यंजन बनाये थे जैसे-पूरणपोली, ज्वार की सूजी का हलवा, ज्वार की रोटी, इडली-डोसा, रागी, मट्टा दही आदि तब माँ ने बहुत वात्सल्य एवं आग्रह पूर्वक देने की कोशिश की मगर महाराज ने हँसते हुए अँजुली को बन्द रखा, नहीं लिया। दोनों छोटी बहिनों ने भी प्रयास किया, तब भी नहीं लिया। तब पिताजी एवं हमने और अधिक प्रयास नहीं किया। विद्यासागर जी ने कठोरता से अपने मोह को नष्ट किया।

     

    मित्र ने अलौकिक मित्र से लिया आजीवन ब्रह्मचर्य व्रत 

    आहार के पश्चात् मुनि श्री विद्यासागर जी ने हम लोगों से बात नहीं की, मारुति से बात की। मित्र मारुति बोला-आपने मुझे दीक्षा के लिए बुलाया था। उस वक्त मैं किसी कारण से नहीं आ सका, किन्तु अब मैं तैयार हूँ। तब मुनिराज विद्यासागर जी बोले- ‘अभी विवाह के उलझन में मत पड़ना, फिर देखेंगे। दूसरे दिन प्रवचन के बाद मारुति ने विवाह न करने का व्रत ले लिया। तब से आज तक ब्रह्मचर्य व्रत का पालन कर रहा है। आहार के बाद एवं अन्य समय में मुनि श्री विद्यासागर जी के पास जब भी बैठते तब इशारा करके बोलते-‘वहाँ जाओ गुरुमहाराज के पास बैठो।' गुरुदेव ज्ञानसागर जी महाराज हम लोगों को धर्म का उपदेश देते।

     

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    मित्र मारुति ने सबके रोगटे खड़े कर रूला दिया

    मारुति मुनि विद्यासागर जी के पास ही ज्यादा समय रहता था और कई बातें करता रहता था। एक दिन मारुति ने बताया-जब विद्याधर जी आचार्य देशभूषण जी महाराज के संघ में थे और गोम्मटेश्वर जा रहे थे तब बीजापुर कर्नाटक के पास डोली को उठाकर चले थे। थोड़ा चलने के बाद रास्ते में विश्राम के लिए बैठे तब विद्याधर जी को पृष्ठ भाग में बिच्छूने काट लिया किन्तु पास में कोई दवा वगैरह नहीं थी और किसी को बताएगें तो मुझे सेवा का अवसर नहीं मिलेगा अतः किसी को नहीं बताया। रातभर पीड़ा को सहन करते रहे। सुबह वह ठीक हो गया। यह घटना सुनकर माँ, दोनों बहिनें और हम तीनों भाईयों के रोगटे खड़े हो गए और आँसू आ गए।

     

    इस तरह मारुति से हम लोगों को कई बातें पता चलती रहती थीं। कारण कि घर वालों से तो मुनि विद्यासागर जी बात करते नहीं थे। हम लोग अजमेर में करीब १५ दिन रुके थे और गुरु महाराज ज्ञानसागर जी मुनि महाराज को दो बार आहार कराने का सौभाग्य मिला एवं क्षुल्लक ऐलक महाराजों को भी दो-दो बार आहार कराये, किन्तु मुनि श्री विद्यासागर जी महाराज की विधि हम लोगों के हीन पुण्य के कारण एक ही बार मिली। फिर भी हम सभी अपने भाग्य को सराहते हुए खुश हुए थे, कि हमें ऐसे मुनिमहाराजों को आहारदान देने का

    अवसर मिला जो पंचमकाल में भी चतुर्थकाल जैसी साधना कर रहे हैं।

     

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    प्रतिदिन अजमेर समाज के लोग आ करके हम लोगों से विद्याधर के बारे में उसके बचपन के बारे में। पूछते थे और सुन सुनकर बहुत खुश होते थे। अजमेर समाज ने बहुत स्नेह और सम्मान दिया। हम लोगों को अपने घर में भोजन कराने के लिए निमंत्रण देने आते थे और हम लोगों से पूछते थे आप लोगों को कौन-सी चीज पसंद है। जब हम लोग लौटने लगे तो बहुत से लोग स्टेशन पर छोड़ने आए और विदाई देते समय आँखों में आँसू लिए हुए थे। इस तरह विद्याधर के परिवार ने ससंघ को यथायोग्य भक्ति के साथ आहारदान देकर गृहस्थोचित गृहस्थधर्म की पालना की और अजमेर की जनता में व्याप्त भ्रान्ति को समाधित कर दिया। ऐसे शुभ और विशुद्ध भावों से सुसज्जित श्रेष्ठ कर्म की अनुशंसा करता हुआ... ।

    आपका

    शिष्यानुशिष्य

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