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मेरे गुरुवर... आचार्य श्री विद्यासागर जी महाराज
  • पत्र क्रमांक - ६८ स्वाभिमानी ब्रह्मचारी विद्याधर

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    2९-०३-२०१६

    तलवाड़ा (बाँसवाड़ा राजः)

     

    अयाचक वृत्ति के धनी स्वाभिमानी गुरुवर श्री ज्ञानसागर जी महाराज के चरणों में नमस्कार-नमस्कार-नमस्कार,

    हे गुरुवर! ब्रह्मचारी विद्याधर जी आपको पूर्णत: समर्पित होकर, आपके समान बनने के लिए, आपकी हर क्रिया को अपने अन्दर आचरित करते जा रहे थे। सही मायने में वो आपकी पर्याय बन आप में मिलना चाह रहे थे। इस सम्बन्ध में नसीराबाद के आपके भक्त प्रवीणचन्द गदिया ने एक स्मृति सुनायी

     

    स्वाभिमानी ब्रह्मचारी विद्याधर

    "नसीराबाद प्रवास में हमारे घर पर चौका लगा करता था। जब-जब परमपूज्य ज्ञानसागर जी महाराज के आहार हमारे यहाँ होते तब-तब आहार देने एवं औषधि देने के लिए ब्रह्मचारी विद्याधर जी पीछे से आते थे और गुरुजी को औषधि एवं आहार देकर धीरे से चले जाते थे। जब तक उनको आहार स्वयं ग्रहण करने के लिए नहीं कहते, तब तक वे नहीं रुकते थे। हम लोग उनसे भोजन में उनकी रुचि पूछते थे, तो कुछ नहीं बोलते थे। चुपचाप जो परोसा जाता वही खा लेते थे और भोजन करते हुए इधर-उधर नहीं देखते थे। अपनी थाली में ही देखते थे। उस समय वो अन्तराय का पालन करते थे, जैसे मुनि महाराज करते हैं। गर्मी के बावजूद भी भोजन करते समय पंखा चलाने के लिए न तो कहते थे और कोई चला दे तो सिर हिलाकर मना करते थे। एक ही वक्त भोजन करते थे, शाम को सिर्फ पानी लेते थे। भोजन करने के बाद एक मिनट भी नहीं रुकते थे। सभी से जयजिनेन्द्र करके चले जाते थे।" इस तरह विद्याधर जी जैन साधुवत् चर्या करते थे। जैसा आप करते थे वैसा ही। शायद ही आपको कोई शिकायत मिली हो। ऐसे अद्वितीय समर्पण को नमन करता हुआ, मैं भी आज्ञाकारी शिष्य बना रहूँ, इस भावना के साथ...

    आपका

    शिष्यानुशिष्य

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