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मेरे गुरुवर... आचार्य श्री विद्यासागर जी महाराज
  • पत्र क्रमांक - ६७

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    ०८-०३-२०१६

    सेनावासा (बासवाड़ा-राजः)

     

    आत्मानुशासित चर्या में केन्द्रित गुरुवर श्री ज्ञानसागर जी महाराज के चरणों में नमोस्तु-नमोस्तु-नमोस्तु..

    हे गुरुवर! ब्रह्मचारी विद्याधर आपकी हर आज्ञा को पूर्ण श्रद्धा भक्ति के साथ पालन करते थे, इसमें किसी भी प्रकार का प्रमाद नहीं करते थे, गुरु आज्ञा को दृढ़ता से पालन करने का यह संस्कार बचपन से ही आ गया था। बचपन में यह संस्कार कहाँ से मिला ? इसका समाधान चिन्तन में यह आता है कि पूर्व जन्म के संस्कार जागृत हुए हैं। आज्ञाकारिता के बारे में नसीराबाद के आपके परम भक्त श्री शान्तिलाल जी पाटनी ने ब्रह्मचारी विद्याधर जी का गुरु समर्पण का संस्मरण सुनाया। वह मैं आपको लिख रहा हूँ-

     

    आज्ञाकारी ब्रह्मचारी

    "एक दिन नसीराबाद में हमने ब्रह्मचारी विद्याधर जी को कहा-आप धोती-दुपट्टा धोते हैं तो आपका समय खराब होता है। आप मुझे दे दिया करें मैं उनको धो दिया करूंगा। तो मना करते हुए बोले- 'गुरु जी की आज्ञा है खुद के कपड़े स्वयं धोना इसलिए मैं नहीं दे सकता।' तो मैंने कहा - मैं चुपचाप धो दिया करूँगा गुरु महाराज को पता नहीं चलेगा। तो ब्रह्मचारी जी बोले - "मुझे तो पता है ना आज्ञा क्या है?" यह सुनकर मेरे हर्षाश्रु आ गए हमने कहा-भैया जी आप धन्य हैं, गुरु आज्ञा को सदा ध्यान रखते हैं, तो ब्रह्मचारी विद्याधर जी बोले-धन्य तो आप हैं, आपने मुझे गुरु आज्ञा याद कराई..." इस तरह उन्होंने गुरु आज्ञा में पूर्ण आस्था रखते हुए। असंयमी श्रावक की बात नहीं मानी। ऐसी आस्था को नमन करता हुआ...

    आपका

    शिष्यानुशिष्य

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