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मेरे गुरुवर... आचार्य श्री विद्यासागर जी महाराज
  • पत्र क्रमांक - ६१ भजन गायक ब्रह्मचारी विद्याधर

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    ०२-०३–२०१६

    घाटोल (बासवाड़ा-राजः)

    ध्वजारोहण (पंचकल्याणक महोत्सव)

     

    वेदपुरुष के वास्तविक प्राकृतिक स्वरूप के सच्चे दिग्दर्शक गुरुवर श्री ज्ञानसागर जी महाराज को त्रिकाल नमोस्तु-नमोस्तु-नमोस्तु...

    हे गुरुवर! जब आप दादिया ग्राम में विराजमान थे। तब विद्याधर जी ग्राम के नवयुवकों के आँखों के तारे बन गए थे। इसका कारण दादिया के पारस झाँझरी सुपुत्र हरकचंद जी झाँझरी ने बताया। वह मैं आपको लिख रहा हूँ।

     

    भजन गायक ब्रह्मचारी विद्याधर

    “जब गुरु ज्ञानसागर जी महाराज हमारे यहाँ दादिया ग्राम में प्रवास पर थे तब ज्ञानसागर जी महाराज आहार के पश्चात् धूप में थोड़ी देर बैठते थे। उस वक्त समाज के लोग ब्रह्मचारी विद्याधर जी से भजन बोलने के लिए कहते थे किन्तु विद्याधर जी मौन बैठे रहते थे। फिर गुरुवर ज्ञानसागर जी महाराज की स्वीकृति पाकर भजन बोलते थे। बड़ी ही मीठी आवाज में वे भजन गाते थे। रोज नया भजन सुनाते थे इस कारण बालक युवा - महिलाएँ सब लोग गुरुवर ज्ञानसागर जी महाराज के आहार के पश्चात् मंदिर जी में एकत्रित हो जाते थे और भजन सुनते थे। एक दिन उन्होंने बड़ा ही सुन्दर भजन सुनाया। मैंने सुना तो उसे याद कर लिया और आज तक अपनी डायरी में सुरक्षित रखा हुआ हूँ, वह भजन निम्न प्रकार है

     

    गुरु दर्शन महिमा

    (तर्ज-सावन का महीना पवन करे शोर...)

     

    पावन हुए नयना दरश कर तोर।

    हियरा रे हरसे ऐसे जैसे लख के चन्द्र-चकोर॥

     

    कुगुरु कुदेव ध्याके बहुत दुःख उठाया।

    छवि वीतराग ने तो शान्त रस पिलाया॥

     

    शान्त सुधारस प्याला लगा के एक ठौर।

    मनुआ रे झूम उठा रे होकर आनंद विभोर॥ पावन हुए...॥

     

    सकल परिग्रह तज के बने हो विरागी। 

    ममता को त्याग हुए आतम अनुरागी॥

     

    धार दिगम्बर बाना चले हो शिव की ओर।

    धन्य हुआ रे तुमको प्रभु शीश नवा कर जोर॥ पावन हुए...॥

     

    कर केशलोंच तन से ममत्व हटाते।

    वैराग्यता के भाव उर में जगाते॥

     

    अस्थिर है जग जाना देखा है कर गोर।

    दु:ख का रे यो सागर जिसका है न कोई छोर॥ पावन हुए...॥

     

    महिमा को सुनकर तेरी शरण अब आया।

    पुण्य उदय जब आया तब है दर्श पाया॥

     

    पाकर तेरा शरणा जंचे ना कोई और। 

    बाँधी रे मैंने तुमसे अब अपनी जीवन डोर॥ पावन हुए...॥

     

    कर्म लुटेरे नाना नाच हैं नचाते।

    भव वन में निशदिन हैं ये भटकाते॥

     

    कर्मों के आगे हाँ चलता है जब जोर।

    हटती रे तव कृपा से मिथ्यात्व घटा घनघोर॥ पावन हुए...॥

     

    लागी लगन मोरी तुमसे मुनीश्वर।

    लगाओगे निश्चय तुम्ही मुक्ति के पथ पर॥

     

    गायन कर में महिमा हे गुरु-वर तोर।

    बाज उठी रे वीणा प्रभु नाच उठा मन मोर॥ पावन हुए...॥

     

    इस तरह सुस्वर नामकर्मोदयी ब्रह्मचारी विद्याधर जी की वाणी आबालवृद्ध सभी जन को कर्णप्रिय लगती थी। पूर्व का देव शास्त्र-गुरु उपासक, भजन गायककार, गीतकार, आज ऐसा साहित्यकार, महामनीषी, महाकवि बन बैठा है कि अनेकों गीतकार भजन गायककार, साहित्य मनीषीयों की रचना का आधार बन पड़ा है। ऐसे महानायक को कोटि-कोटि प्रणाम करता हुआ...

    आपका

    शिष्यानुशिष्य

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